खुफिया निगरानी के जमाने में नसीहतों की क्लास की जरूरत

संपादकीय
03 मई 2017


दिल्ली में इन दिनों एक चटपटा केस खबरों में हैं कि गुजरात से आए हुए एक भाजपा सांसद ने एक महिला के साथ बलात्कार किया, या कि उस महिला ने इस सांसद को अपने सेक्स-जाल में फांसकर उसका वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल किया। दोनों तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई है, और मामला जांच के बाद साफ हो पाएगा। सांसद और महिला, दोनों ही वयस्क हैं, और दोनों ही अनुभवी लोग दिखते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अपने आपको किस हिसाब से बचाकर रखना चाहिए ताकि उनका राजनीतिक या सामाजिक जीवन किसी एक स्कैंडल के साथ खत्म न हो जाए।
यह बात सिर्फ राजनीति के लोगों को समझने की जरूरत नहीं है, बल्कि घर से लेकर कारोबार तक, और सरकारी दफ्तरों से लेकर खेल के मैदान तक, सभी जगहों पर लोगों को सावधान रहना चाहिए। अब चौथाई सदी पहले जैसा माहौल नहीं रहा, जब लोग अपने घर या दफ्तर की महिला कर्मचारी का देह शोषण करके भी बच निकलते थे, क्योंकि ऐसे मामलों की शिकायत ही आमतौर पर नहीं होती थी। लेकिन आज कानून की जागरूकता भी बढ़ गई है, और कानून तक लोगों की पहुंच भी बढ़ गई है। ऐसे में लोगों को अपना चाल-चलन साफ-सुथरा रखने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। सार्वजनिक जीवन से परे भी निजी जिंदगी के बहुत से मामले आज अदालतों तक पहुंच रहे हैं जिनमें आमतौर पर एक लड़की या महिला की शिकायत रहती है कि किसी आदमी ने उनसे शादी का वायदा करके उनका देह शोषण किया और उसके बाद शादी से इंकार कर दिया। ऐसी वायदाखिलाफी और सेक्स-संबंध को लेकर अदालतों का एक नया रूख सामने आ रहा है जिसमें अदालतें यह मान रही हैं कि हर वायदाखिलाफी को बलात्कार करार नहीं दिया जा सकता, और एक वयस्क लड़की को संबंध बनाने के पहले यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे हर संबंध शादी में बदलें यह जरूरी भी नहीं है। हमने भी पहले कई बार इस बात को लिखा था कि शादी का वायदा करने के बाद आपसी सहमति से बने देह संबंधों को वायदाखिलाफी की नौबत आने पर बलात्कार कहना सही बात नहीं होगी। कई बरस पहले हमने इसी जगह यह बात लिखी थी और पिछले साल-छह महीने में कई प्रदेशों के हाईकोर्ट इस तरह की बात लिख चुके हैं।
आज जब चारों तरफ खुफिया कैमरों और मोबाइल फोन से होने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग का जमाना है, तब लोगों को अपनी पतलून के बेल्ट, और पजामों के नाड़े मजबूती से बांधकर रखना चाहिए। पुराने जमाने में किसी की तारीफ करते हुए कहा जाता था कि वह लंगोट का पक्का आदमी है। इसका मतलब होता था कि वह आदमी राह चलते देह संबंधों में नहीं उलझता है। आज हर किसी को यह सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि एक महिला के अधिकार ऐसे मामलों में आदमी के मुकाबले अधिक वजन रखते हैं, और उसकी बात पर अदालत भी अधिक गौर करती है। लोगों को यह समझना चाहिए कि कानूनी या सेहत के खतरे उठाते हुए ऐसे संबंध न सिर्फ लोगों की निजी साख को खत्म करते हैं, बल्कि उनके परिवार की साख भी ऐसे विवादों के बाद आंच झेलती है। यह दौर टेक्नालॉजी के अंतहीन खुफिया इस्तेमाल का है, और लोग तो आज किसी को एक तस्वीर भेजकर, या कुछ शब्द भेजकर भी इतने सुबूत खड़े कर देते हैं कि किसी शिकायत की नौबत आने पर वे जेल भेजे जा सकें। हमारा ख्याल है कि सरकार, समाज, परिवार, और राजनीतिक दल, इन तमाम जगहों पर लोगों को अब हमेशा के लिए खड़े हो चुके ऐसे कानूनी खतरे पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, और लोगों में समझ पैदा करनी चाहिए कि कुछ मिनटों के देह सुख के लिए वे न तो बीमारियों के खतरे में पड़ें, और न ही कानूनी खतरे में पड़ें। खासकर जो राजनीतिक  दल अपने लोगों के चुनाव में जीतकर आने और उनकी साख को लेकर फिक्रमंद रहते हैं, उन्हें तो बंद कमरे के भीतर अपने लोगों के लिए नसीहतों की ऐसी क्लास लगानी चाहिए, और पार्टियों को खुद भी अपने लोगों पर ऐसी नजर रखनी चाहिए। 

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