रातोंरात के कानूनी फेरबदल से जनता और कारोबार त्रस्त

संपादकीय
30 मई 2017


केंद्र सरकार के ऑनलाइन दवा बिक्री के प्रस्तावित आदेश के खिलाफ देशभर की दवा दुकानें आज बंद रहीं। ऑनलाइन कारोबार से देश के दुकानदारों की हालत खराब है, क्योंकि न तो दुनिया का कारोबार, और न ही जिंदगी का कोई भी और दायरा इतनी रफ्तार से फेरबदल के लिए तैयार रहता है। बाजार के दुकानदार पीढिय़ों से पूंजी निवेश करके कामकाज खड़ा करते हैं, और बहुत से लोगों का पैसा ब्याज से लिया हुआ भी रहता है। ऐसे में रातोंरात जब ऑनलाइन बिक्री करने वाले लोग दुकानदारों की खरीदी से भी कम कीमत पर बिक्री करने लगते हैं, तो बाजार के पांव उखड़ जाते हैं। यह सिलसिला सिर्फ ऑनलाइन बिक्री के मामले में हो रहा हो ऐसा भी नहीं है, आज भारत में बहुत से दूसरे दायरों में कारोबारी ऐसी ही दिक्कतों से गुजर रहे हैं।
एक तरफ तो आजादी के बाद का अब तक का सबसे बड़ा टैक्स फेरबदल, जीएसटी लागू होने जा रहा है, और बाजार उसे लेकर परेशान है, आशंका में है, और उसकी तैयारी में लगा हुआ है। दूसरी तरफ ऑनलाइन बिक्री की मार तो चल ही रही है। फिर देश के अखबारों का कारोबार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत नया वेतन देने के संघर्ष से जूझ रहा है, और केंद्र सरकार की नई विज्ञापन नीति से भी परेशान है। पूरे देश में कामकाजी महिलाओं के लिए जो नए कानून आए हैं, उनका बोझ उठाने के लिए भी कारोबार तैयार नहीं है। फिर जीएसटी सहित दूसरे टैक्सों को लेकर गिरफ्तारी की जो नई तलवार बाजार पर टांगी गई है, लोग उससे भी डरे-सहमे हैं।  देश को होटल और रेस्त्रां-बार का कारोबार सुप्रीम कोर्ट के हाईवे पर रोक के आदेश से बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और अकेले छत्तीसगढ़ में सैकड़ों कारोबारी इसी एक वजह से घाटे में आ रहे हैं, और अपने पूंजी निवेश पर कर्ज चुकाने की हालत में नहीं रह गए हैं।
फिर नोटबंदी से लेकर और कई तरह की रोक बैंकों और नगदी कारोबार पर लग गई है जिससे परंपरागत कारोबारी तौर-तरीके रातों-रात बदलने पड़ रहे हैं, और बाजार इसके लिए एकदम से तैयार भी नहीं है। कहीं पर सुप्रीम कोर्ट पुरानी गाडिय़ों पर रोक लगा रहा है, बाजार में पहुंच चुकी गाडिय़ों की बिक्री को बंद कर रहा है, तो कहीं अलग-अलग प्रदेश पुरानी गाडिय़ों पर अलग-अलग रोक लगा रहे हैं। ऐसे तमाम फेरबदल इस हकीकत को अनदेखा कर रहे हैं कि कर्ज लेकर काम करने वाले लोग, या कि शेयर होल्डर्स की पूंजी से काम करने वाली कंपनियां ऐसे रातोंरात के फेरबदल को नहीं झेल सकती हैं। आज जिस तरह से मांस के कारोबार को, जानवरों की हड्डियों और चमड़े के कारोबार को खत्म किया जा रहा है, दुधारू जानवरों के लाने-ले-जाने को खत्म किया जा रहा है, उससे आत्महत्या करने वाले किसान और अधिक बेबस होने जा रहे हैं। सत्ता पर बैठे हुए लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि रातोंरात के ऐसे कानूनी फेरबदल लागू होने पर जिंदगी को अस्तव्यस्त कर दे रहे हैं, करोडों लोगों के रोजगार छीन रहे हैं, और लाखों लोगों का कारोबार खत्म कर रहे हैं। यह सिलसिला देश की उत्पादकता के खिलाफ है, और अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाला है।
केंद्र सरकार को अपने खुद के इस नारे पर अमल के बारे में सोचना चाहिए जिसमें वह सबको साथ लेकर, सबके विकास की बात करती है। अभी केंद्र और राज्यों के तौर-तरीके इसके ठीक खिलाफ चल रहे हैं, और देश में लोकप्रियता की जो लहर मोदी के पक्ष में चल रही है, उसे स्थाई मानकर इस तरह के मनमाने फैसले ठीक नहीं हैं। सरकार में कोई भी रहे, जनता को जीने का हक रहना चाहिए, मौका रहना चाहिए।

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