लोक सुराज की कड़ी मेहनत के साथ-साथ कुछ और भी जरूरी

संपादकीय
04 मई 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पूरी सरकार के साथ गर्मी के सबसे अधिक गर्म दिनों में सुबह से शाम तक लगातार लोक सुराज का दौरा कर रहे हैं, और इतना विशाल, इतना विस्तृत जनसंपर्क आसान बात नहीं रहती। उन्होंने इस अभियान की शुरुआत में ही यह साफ किया था कि वे लोगों की नाराजगी या संतोष को भी देख लेना चाहते हैं जो कि लगातार चल रही सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी के नाम से कई प्रदेशों में देखने मिलती है। जनता की नाराजगी और शिकायतों का ऐसा सामना कुछ तकलीफदेह तो रहता है क्योंकि सरकार के कामकाज में कमियां और खामियां दोनों ही आम बात रहती हैं, लेकिन लोगों के मुंह से उनकी दिक्कत-परेशानी, उनकी शिकायत, और उनकी मांग-उम्मीदों को सुनना, और प्रदेश-जिले स्तर के अफसरों के साथ उन्हें मौके पर ही निपटाना प्रतीकात्मक ही सही लेकिन एक बड़ा काम है। उनके मंत्री भी जगह-जगह दौरे कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का दौरा सबसे ही कड़ा है, सबसे ही मुश्किल है, और इसकी वजह से पूरे प्रदेश के अफसरों को अपने-अपने इलाकों में, अपने-अपने विभागों के कामकाज में चौकन्ना रहना पड़ रहा है।
वैसे तो आदर्श स्थिति यह होती कि जनदर्शन या ऐसे जनसंपर्क की नौबत ही नहीं आती, लेकिन भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में कभी भी ऐसी आदर्श स्थिति नहीं आ सकती जिसमें कि सुधार की गुंजाइश न हो, या कि गड़बडिय़ों को पकड़ा न जा सके। लोक सुराज का यह अभियान मुख्यमंत्री को प्रदेश के जिला स्तर के अफसरों के कामकाज को बेहतर समझने का एक मौका भी दे रहा है, और सरकारी अमला यह उम्मीद भी कर रहा है कि इस अभियान के पूरे होने के बाद बहुत से तबादले होंगे, और कई महत्वपूर्ण कुर्सियों पर जाने वाले लोग चुनाव तक वहां रहेंगे। यह भी उम्मीद की जा सकती है कि लोक सुराज दौरा शुरू होने के पहले से शिविर लगाकर लोगों से जो शिकायतें और मांग इक_ी की गई थीं, उनमें से संभव बातों को चुनाव तक पूरा करने का मौका सरकार को मिल जाएगा। अब छत्तीसगढ़ सरकार चुनाव-मोड में आ चुकी है, और केवल ऐसे ही कामों को उठाया जाएगा जिन्हें चुनाव आचार संहिता के पहले पूरा करके, या एक शक्ल देकर जनता के सामने रखा जा सकेगा।
लेकिन हम आज एक दूसरी बात करने के लिए इस चर्चा को छेड़ रहे हैं, न कि महज इस अभियान के बारे में लिखने को। यह अभियान तो अगले एक पखवाड़े में पूरा हो जाएगा, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर एक कमी शायद उसके बाद भी बनी रहेगी, जिसके लिए राज्य सरकार प्रदेश स्तर पर कभी-कभी कोशिश करती है। ऐसे अभियानों से परे भी प्रशासनिक सुधार एक ढांचागत सुधार से ही आ सकता है। और इसके लिए सरकार को अपने जमीनी स्तर के कामकाज में कागजों और फाईलों को कम करना पड़ेगा। आज जरा-जरा सी बात के लिए लोगों को सरकार में बहुत से कागज जमा करने पड़ते हैं, बहुत से धक्के खाने पड़ते हैं, और किसी को यह भरोसा नहीं रहता कि एक छोटी सी पटवारी-नकल जैसी बात उसे कितने महीने में मिल पाएगी, या कि तहसील का कोई नामांतरण कितने दिनों में हो पाएगा, या कि राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा में एमआरआई की बारी कितने हफ्तों में आ सकेगी। सरकार को अपने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए लोगों से भरवाए जाने वाले कागज घटाने चाहिए, हर कागज में मांगी जाने वाली जानकारी को घटाना चाहिए। अमरीका जैसे विकसित देश को देखें तो वहां सरकार के हर फॉर्म पर यह छपा होता है कि उसे भरने में औसतन कितनी देर लगेगी। भारत के प्रदेशों में सरकारी दफ्तरों का भ्रष्टाचार इस बात पर पनपता है कि लोगों से अधिक से अधिक जानकारी कैसे मांगी जाए, और उनमें से किसी भी जानकारी के न होने पर उनसे रिश्वत कैसे ली जाए। सरकार को जनता के बीच के लोगों की एक साधारण कमेटी बनाकर सरकारी कामकाज के जाल को घटाना चाहिए।
एक दूसरी बात जो बहुत महत्वपूर्ण है, और जो सरकार में कभी-कभी चर्चा में आती है, लेकिन आई-गई भी हो जाती है, वह है सरकारी दफ्तरों में अफसरों और कर्मचारियों की मौजूदगी। राज्य सरकार को बहुत ही कड़ाई से यह नियम लागू करना चाहिए कि हफ्ते में कम से कम एक दिन मुख्यमंत्री से लेकर पटवारी तक, हर कोई सुबह से शाम तक अपने दफ्तर में मौजूद रहें, और हफ्ते के ऐसे दिन को किसी भी तरह की बैठक या दौरों से मुक्त रखा जाए। इतना करने के बाद सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कौन से ऐसे दफ्तर हैं जहां पर जनता के काम ज्यादा पड़ते हैं, और वहां ऐसी अनिवार्य मौजूदगी के दिन एक से अधिक भी रखने चाहिए, और ऐसे दिनों में पूरे वक्त की मौजूदगी की गारंटी भी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से कभी-कभी ऐसी पहल शुरू भी हुई, लेकिन नियम-कायदों को नापसंद करने वाले लोगों ने आनन-फानन ऐसी व्यवस्था को चौपट कर दिया। इसलिए हमारा यह मानना है कि राज्य में वही व्यवस्था लागू हो सकती है जो कि मुख्यमंत्री के स्तर से शुरू हो, और जिसे वे अपने ऊपर भी लागू करें। सरकार को जनता से अपना फासला घटाना चाहिए, और इसके लिए सरकारी दफ्तरों को जनता के प्रति जवाबदेह रहते हुए हर हफ्ते काफी वक्त के लिए हर अफसर-कर्मचारी की मौजूदगी घोषित करनी चाहिए। देश के अलग-अलग राज्यों में ऐसी पहल हो भी रही है, और हम पिछले बरसों में इसी जगह लगातार यह सलाह देते भी आए हैं।
लोक सुराज निपटाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सरकार की जनता के लिए उपस्थिति की ऐसी गारंटी लागू करनी चाहिए, और इससे जनता की शिकायतें दूर भी होंगी।

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