सरकारी सेवानियम और अभिव्यक्ति की आजादी

संपादकीय
06 मई 2017


छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को आज सुबह राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया, उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। अब राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी के ऐसे कथित पोस्ट को लेकर सरकार की काफी फजीहत हो रही है, और यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमों में अब मानवाधिकारवादियों के वकील वर्षा डोंगरे को गवाह बनाकर बुलाएं।
इस निलंबन के बाद सरकार आलोचना के कटघरे में आएगी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया है। लेकिन हमारा सोचना इस बारे में थोड़ा सा अलग है। सरकार का काम कुछ नियमों से बंधा रहता है, और जो लोग सरकार से वेतन और बाकी सुविधाएं, नौकरी की सुरक्षा पाते हैं, उन्हें यह सब कुछ जिम्मेदारियों और जवाबदेही के साथ ही मिलते हैं। शासन के सेवानियमों में यह भी है कि राज्य शासन के कामकाज या उसकी रीति-नीति की आलोचना न की जाए। और ये नियम सोशल मीडिया के पैदा होने के बाद के नहीं है, ये पहले से चले आ रहे हैं, यह एक अलग बात है कि सोशल मीडिया पर अपनी नई ताजी सक्रियता के चलते अब बहुतसे अधिकारी बहुत से मुद्दों पर खुलकर ऐसी बातें लिखने लगे हैं जो कि उनके सेवानियमों के खिलाफ जाती हैं। दूसरी तरफ देश में कई ऐसे चर्चित अफसर भी हुए हैं जिन्होंने सरकार से असहमति होने पर कामकाज छोड़कर सामाजिक आंदोलनकारी के रूप में काम किया है, या कि केजरीवाल की तरह राजनीति में आए हैं।
हम अगर वर्षा डोंगरे के ही मामले की बात करें, और इसे सच मानें कि उन्होंने ऐसी पोस्ट लिखी थी, और यह भी सच मानें कि उन्हें जेल में या कहीं और महिलाओं ने अपने सेक्स-शोषण की, जुल्म की, बातें बताई थीं। तो ऐसे में भी हमारा ख्याल है कि उनके पास सरकार के भीतर, औपचारिक रूप से भी इन बातों को रखने का एक विकल्प मौजूद था, जो कि सरकार के सेवा-नियमों के हिसाब से ठीक भी रहता। लेकिन उन्होंने अपनी ऐसी जानकारी को सरकार के सामने रखने के बजाय सोशल मीडिया पर जब रखा है, तो सरकार भी उस पर कार्रवाई करने की आजादी रखती है, हक रखती है। सरकार और वर्षा डोंगरे के बीच की यह लड़ाई सच की लड़ाई नहीं है, सच तो दोनों ही हो सकते हैं, यह लड़ाई, या कि यह कार्रवाई सरकारी सेवानियमों की है, जिसके तहत राज्य सरकार इस बात के लिए भी जिम्मेदार है कि उसके अधिकारियों-कर्मचारियों का आचरण कैसा रहे।
दरअसल वर्षा डोंगरे ने राज्य शासन और पीएससी के खिलाफ मुकदमा लड़ते हुए, और अदालत में बिना वकील अपना पक्ष खुद रखते हुए जो एक लंबी लड़ाई जीती है, उसकी वजह से भी यह हो सकता है कि उनके मन में बेइंसाफी के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ एक नाराजगी भरी हुई हो। आज वे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ कुछ लोगों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील को लेकर एक बार फिर अदालत में खड़ी हैं, और उनके दिमाग में सरकारी व्यवस्था के खिलाफ एक नाराजगी भी भरी हुई है। लेकिन हर ओहदे और हर भूमिका की अपनी सीमाएं होती हैं, जिन लोगों को ऐसी सीमाओं के बाहर जाकर काम करना हो, उनके लिए रास्ते खुले रहते हैं। सरकार में काम करते हुए सरकार की किसी गलती, या गलत काम की जानकारी होने पर उसे सरकार के भीतर ही ऊपर तक पहुंचाने का जो रास्ता है, हमारा ख्याल है वही रास्ता वर्षा डोंगरे के लिए ठीक होता, न कि उसे सेवानियमों के खिलाफ जाकर सार्वजनिक रूप से उठाने के। सरकारी सेवानियम नौकरी में रहने तक अभिव्यक्ति की आजादी पर हावी रहते हैं, यह बात अच्छी हो या बुरी हो, जायज हो या नाजायज हो, जब तक ऐसे सेवानियम हैं, तब तक या तो लोग सरकार के खिलाफ सरकार के बाहर न बोलें, या कि जैसा कि इस मामले में हो सकता है, इन नियमों को चुनौती देकर अदालत की एक नई व्याख्या मांगें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें