केजरीवाल का राजनीतिक अंदाज आज उन पर भारी

संपादकीय
08 मई 2017


दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार से हटाए गए एक मंत्री ने अगले ही दिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तगड़ा हमला किया और कहा कि उसने मुख्यमंत्री को 2 करोड़ रुपये नगद वसूली करते अपनी आंखों से देखा है। इसके बाद आज इस मंत्री ने भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो जाकर केजरीवाल सरकार के भ्रष्टाचार के कुछ मामले दिए। इसे लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है कि जब महीनों पहले इस मंत्री ने अपने मुख्यमंत्री को ऐसी गैरकानूनी उगाही करते देखा तो उसी वक्त इसकी शिकायत क्यों नहीं की? और अब शिकायत की तब सूझी जब उसे बर्खाश्त कर दिया गया है। इस मौके पर सब लोग अपने-अपने हाथ धो रहे हैं, और भाजपा के विरोधियों ने यह ढूंढ कर निकाला है कि इस मंत्री,कपिल मिश्रा, की मां भाजपा की एक नेता थीं, और वे भाजपा से चुनाव लड़कर जीती भी थीं। दूसरी तरफ, केजरीवाल से अब अलग हो चुके बहुत से लोग यह याद दिला रहे हैं कि केजरीवाल की तो पूरी की पूरी राजनीति ही ऐसे आरोपों को लेकर चलती आई है और वे बिना किसी बुनियाद के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का काम करते रहे हैं। यह बात सही भी है कि केजरीवाल का अंदाज पत्थर उछालकर भाग लेने जैसा रहा है, और वे इसी आदत के चलते अदालतों में मानहानि के मुकदमे भी झेल रहे हैं।
सार्वजनिक जीवन में आरोपों को लेकर दो बातें साफ रहनी चाहिए, पहली तो यह कि जब तक सबूत न हो तब तक सारे आरोप संदेह की तरह ही सामने रखने चाहिए, और फिर अगर किसी ने संदेह न जताकर सीधे आरोप लगाए, तो फिर उस आरोप को साबित करने की जिम्मेदारी भी उसी पर आनी चाहिए। अरूण जेटली पर लगाए गए ऐसे ही आरोपों को लेकर केजरीवाल अदालती कटघरे में है, और साबित कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लोकतंत्र में किसी की इज्जत को उछालना एक बड़ा आसान काम होता है, लेकिन हमारा मानना है कि ऐसा करने वाले नेता, या करने वाला मीडिया कानून के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। केजरीवाल सरकार के अनगिनत मंत्री और विधायक एक-एक करके कई तरह के मामलों में फंस गए हैं, और ये मामले आर्थिक भ्रष्टाचार से परे के भी हैं। केजरीवाल की दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने साथियों सहित राजनीति में ईमानदारी के पैमाने इतने ऊंचे कर दिए थे कि अब उनपर खरा उतर पाना उनके खुद के लिए भी मुश्किल हो रहा है।
हम किसी भी जांच को महज इसलिए टालने के खिलाफ है कि उसे लेकर सरकार पर राजनीति करने और विरोधियों को फंसाने के आरोप लग सकते हैं। ऐसे में तो देश की सारी पार्टियों, और सारे नेता मिलकर संगठित भ्रष्टाचार की गिरोहबंदी करने लगेंगे कि कोई किसी को फंसने न दे। लोकतंत्र में जो लोग ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं, उन्हें सबसे पहले उच्च स्तरीय जांच के लिए तैयार भी होना चाहिए। केजरीवाल की पूरी राजनीति भ्रष्टाचार के आरोपों को लगाने से शुरू हुई थी, और उस समय से उनकी कही हुई बातों को निकालकर उन्हें आज उस पर अमल करने को कहना चाहिए। 

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