सुप्रीम कोर्ट अपना घर सुधारने की पहल करे

संपादकीय
09 मई 2017


कोलकाता हाईकोर्ट के एक दलित जज का सुप्रीम कोर्ट के साथ महीनों से चलते आ रहा टकराव आज एक अभूतपूर्व नौबत लेकर आया, और सुप्रीम कोर्ट ने इस जज को अपनी अवमानना का दोषी ठहराते हुए 6 महीने की कैद सुनाई है। हाईकोर्ट जज ने लगातार सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह तोहमत लगाना जारी रखा था कि उनके साथ दलित होने की वजह से प्रताडऩा की जा रही है। उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर एक बड़ा टकराव खड़ा किया था और घर बैठे उन्होंने अपने को अदालत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट जजों को सजा सुना दी थी, और पुलिस को हुक्म दिया था कि इन जजों को जेल भेजा जाए।
दरअसल, भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बुनियादी खामी है कि सुप्रीम कोर्ट के हाथ हाईकोर्ट का प्रशासन नहीं रहता, और हाईकोर्ट के अदालती फैसलों पर तो सुप्रीम कोर्ट फैसला दे सकता है, लेकिन प्रशासनिक मामलों में उसका हाईकोर्ट पर काबू नहीं रहता। इसी तरह, खुद सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में प्रशासनिक रूप से बेकाबू सा रहता है, और सरकार के पास अदालत की मनमानी पर कार्रवाई करने के लिए कोई अधिकार नहीं रहते। किसी जज को हटाना हो तो उसके लिए संसद में बड़ी संख्या में सांसदों की तरफ से प्रस्ताव लाना पड़ता है, और उसके बाद भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह काम इतना मुश्किल रहता है कि देश के इतिहास में ऐसे गिने-चुने ही मौके आए हैं, जबकि जजों के बारे में कई बार ऐसी चर्चा आती है कि उनमें बहुत से जज भ्रष्ट रहते हैं, जिनपर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है।
संसद, सरकार, और अदालत, भारतीय लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों का  एक-दूसरे पर नियंत्रण बनाया तो गया है, लेकिन इन तीनों के बीच अदालतों का अधिकार क्षेत्र मनमानी का खतरा लिए हुए दिखता है। हमारे पास इसका कोई आसान इलाज नहीं है क्योंकि ऐसी किसी भी दिक्कत के चलते हुए हड़बड़ी में जब कोई इलाज ढूंढा जाता है तो उसका साईड रिएक्शन अधिक खतरनाक हो सकता है। लेकिन यह बात तय है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बीच एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था कायम करना जरूरी है क्योंकि जजों के भ्रष्ट होने पर भी उनके ऊपर कोई कार्रवाई होते हम नहीं देखते हैं। लोगों को याद होगा कि भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह खुला आरोप लगाया था कि उनमें से आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट हैं, उनके ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मुकदमा भी शुरू किया था, लेकिन साहसी पिता-पुत्र ने कोई माफी मांगने से इंकार कर दिया था, और भ्रष्टाचार की जांच भी नहीं करवाई गई।
हमारा यह मानना है कि अदालतों को अपनी अवमानना से अधिक फिक्र इस बात की करनी चाहिए कि उन पर लगने वाले आरोपों की जांच हो रही है या नहीं। जजों के हाथ में लोगों की जिंदगी के ऐसे मायने रखने वाले पहलू रहते हैं कि उन्हें संदेह से परे जीना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को खुद ही जजों पर लगने वाले भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोपों की जांच के लिए अदालत से बाहर की एक प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। अदालत के भीतर कोई जांच निष्पक्ष और ईमानदार नहीं हो सकती।

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