मनमोहन सिंह की रखी नींव पर खड़ा जीएसटी आज आधी रात से

संपादकीय
30 जून 2017


आजादी के बाद का देश का सबसे बड़ा टैक्स कानून, जीएसटी आज आधी रात से लागू होने जा रहा है, और केन्द्र सरकार संसद में इसे लेकर कुछ उसी तरह का जलसा कर रही है जैसा कि देश की आजादी की घोषणा के लिए नेहरू की मौजूदगी में इसी संसद में हुआ था। उस ऐतिहासिक मौके की नकल या बराबरी करने की नीयत का आरोप लगाते हुए कांग्रेस और वामपंथी जीएसटी समारोह का विरोध कर रहे हैं, लेकिन पारे की तरह हिलते-डुलते नीतीश कुमार की पार्टी इस समारोह में शामिल होने जा रही है। मजे की बात यह है कि इस जीएसटी के लिए पिछली मनमोहन सिंह सरकार ने बरसों तक कोशिश की थी, और उस वक्त भाजपा की सारी प्रदेश सरकारें इसके खिलाफ कमर कसकर टूट पड़ी थीं, डटी हुई थीं, और इसका अंधा विरोध किया था। वक्त बदला और भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार बनी, और उसके बाद जीएसटी को लागू करवाने के लिए इस सरकार ने खूब खून-पसीना एक किया, और विपक्ष के सहयोग से यह कानून बन पाया, और राज्यों की विधानसभाओं ने भी इसे पास किया।
जीएसटी आज से एक हकीकत बनने जा रहा है, और कल सुबह से देश का कारोबार बुरी तरह उथल-पुथल झेलने वाला है। मजे की बात यह है कि इसके लिए न सरकारी विभाग तैयार हैं, न कारोबार तैयार है, न उद्योग तैयार हैं, न ही टैक्स सलाहकार अभी इसे पूरी तरह समझ पाए हैं, कम्प्यूटर पर इसका सॉफ्टवेयर पूरी तरह तैयार नहीं है, बाजार में यह सॉफ्टवेयर मिल नहीं रहा है, लोगों के पास कम्प्यूटर लगे नहीं हैं, खुद सरकार का अंदाज है कि इससे एक लाख नए रोजगार पैदा होंगे, और ये एक लाख लोग भी न पहचाने गए हैं, न रखे गए हैं, और न ही प्रशिक्षण पाए हुए हैं। लेकिन मोदी सरकार की किस्मत बुलंद है कि बिना किसी तैयारी के इस देश पर नोटबंदी का हमला कर दिया गया था, और पूरे देश ने उसे देशप्रेम की भावना से झेल लिया। हो सकता है कि जीएसटी से आने वाली दिक्कतें की जनता और बाजार दोनों ही बर्दाश्त कर लें, और फिर मोदी सरकार को जिता दें, लेकिन आने वाले दिन कई तरह की अभूतपूर्व दिक्कतों के रहने वाले हैं, इतना तो तय है।
दरअसल पिछली पौन सदी की आजादी में इस देश ने दो नंबर की अर्थव्यवस्था, सामानों की कच्ची खरीदी, बिना बिल का धंधा, और टैक्स चोरी को इतना देखा हुआ है कि अब एकाएक देश के दसियों लाख कारोबारी किस तरह सब कुछ एक नंबर में करने लगेंगे, यह एक बड़ी पहेली है। दूसरी तरफ जनता भी टैक्स चोरी का सामान खरीदने की इतनी आदी हो चुकी थी कि अब वह रातों-रात टैक्स देने के लिए कैसे तैयार होगी, यह समझना भी मुश्किल है। दूसरी तरफ जो छोटे या मझले कारोबारी जीएसटी के दायरे में आएंगे, उनकी दुकानों में कम्प्यूटर लगाने की जगह भी नहीं है, उनके पास ऐसे प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं हैं, और व्यापार की उनकी संस्कृति भी सब कुछ बही-खातों में करने की नहीं रही है। नतीजा यह है कि आज देश में बहुत कम लोग जीएसटी के लिए तैयार हैं। और जैसा कि केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कहा है, कि अब देश के लोग कच्चा-पक्का भूल जाएं, तो यह बदलाव छोटा नहीं है। कारोबार की चर्बी पर इससे बड़ा जोर पड़ेगा, और जहां लोगों ने बड़े-बड़े कारोबार महज टैक्स चोरी के मुनाफे से खड़े किए हैं, वे लोग अब रातों-रात टैक्स के साथ कैसे काम करेंगे, कैसे वह कमाई जारी रह पाएगी, यह अंदाज लगाना अभी आसान नहीं है।
केन्द्र सरकार ने एक लाख नए रोजगार की बात तो कही है, लेकिन अगर बहुत सारे कारोबार टैक्स चोरी बंद होने से डूब जाएंगे, तो उनमें लगे हुए छोटे-छोटे कर्मचारी और मजदूर कहां जाएंगे? वे टैक्स चोरी तो नहीं करते थे, लेकिन टैक्स चोरी वाले कारोबार में नौकरी-मजदूरी जरूर करते थे। अब अगर कम्प्यूटर-जानकार कर्मचारियों की जरूरत बढ़ेगी, तो हो सकता है कि दूसरी तरह के कुछ कर्मचारियों की जरूरत कम भी होगी, जो कारोबार बंद होंगे, वहां पर छंटनी भी होगी। इसके अलावा जीएसटी से महंगे होने वाले सामानों का ग्राहकों पर कितना असर पड़ेगा यह भी अभी पूरी तरह साफ नहीं है। इसलिए अभी हम अपनी कोई अटकल यहां पर देने के बजाय इंतजार करेंगे कि आने वाले महीनों में सरकार, कारोबार, और जनता पर जीएसटी का कैसा असर पड़ेगा। टैक्स चोरी जारी रहे, इसकी हिमायत कोई जिम्मेदार नहीं कर सकते। अगर इससे टैक्स चोरी बंद होती है, तो हो सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था इससे सुधरे, और अगर जनता पर कोई बड़ा बोझ नहीं पड़ता है, तो ऐसा आधुनिकीकरण शायद अच्छा साबित हो।

भीड़ की हिंसा पर प्रधानमंत्री का बयान, बहुत देर से, बहुत बेअसर

संपादकीय
29 जून 2017


कल दिल्ली सहित देश के दर्जनों शहरों में हजारों लोगों ने एक आंदोलन किया कि यह हिंसा उनके नाम पर न हो। यह एक प्रतीकात्मक नारा था जो कि बहुसंख्यक हिन्दुओं को यह कह रहा था कि वे गाय के नाम पर या किसी और नाम पर दूसरे धर्मों के लोगों को, या कि हिन्दुओं में ही दलितों को जिस तरह से मार रहे हैं, उसे बाकी हिन्दुओं का समर्थन हासिल नहीं है। नॉट इन माई नेम, इस नारे के साथ सोशल मीडिया पर भी पिछले कुछ दिनों से यह अभियान चल रहा है, और कल यह सड़कों पर उतरा। पिछले कुछ महीनों में लगातार सड़कों पर गौआतंकियों की भीड़ लोगों को शक में पीट-पीटकर मार रही है, या कि किसी सार्वजनिक विवाद में किसी को महज इसलिए मार डाला जा रहा है कि वह मुसलमान है, तो ऐसी हिंसा पर देश के समझदार लोग बहुत बुरी विचलित चल रहे हैं।
अब यह तो पता नहीं कि कल के इस गैरचुनावी, गैरराजनीतिक, सर्वदलीय-सर्वधर्म आंदोलन का असर हुआ, या कि अहमदाबाद में गांधी के साबरमती आश्रम में जाने का, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीड़ के द्वारा हो रही हिंसा पर अपनी तकलीफ जाहिर करते हुए नाराजगी भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि गाय की रक्षा, गाय की भक्ति गांधी-विनोबा से बढ़कर कोई नहीं कर सकता है, और देश को उसी अहिंसा के रास्ते पर चलना ही होगा। उन्होंने कहा कि गौरक्षा के नाम पर किसी इंसान को मारना क्या सही है? क्या ये गौरक्षा है कि हमें उसके नाम पर इंसान को मारने का हक मिल जाए?
प्रधानमंत्री की यह बात उस वक्त सामने आई है जब देश के बहुत से राज्यों में, और खासकर उत्तर भारत के हिन्दी राज्यों सहित कुछ और राज्यों में भी सड़कों पर जगह-जगह लोग गाय के नाम पर कत्ल कर रहे हैं इंसानों का। कहीं डेयरी चलाने वाले कारोबारी को मारा जा रहा है, तो अभी दिल्ली में ट्रेन में सीट का झगड़ा होने पर एक मुस्लिम लड़के को हिन्दू बदमाशों ने यह कहते हुए मार डाला कि यह बीफ खाने वाला है। जब पूरे देश में ऐसी सार्वजनिक हिंसा और भीड़ का इंसाफ लहू फैला चुका है, तब प्रधानमंत्री की ऐसी बातें बहुत देर से भी आई हुई हैं, और बहुत कम असर भी हैं। ऐसी बात को उनको ऐसी पहली हत्या के वक्त ही करना था, और साबरमती पहुंचने के पहले ही करना था। उन्हें तो नेहरू की तरह देश के मुख्यमंत्रियों को चि_ी लिखकर ऐसी हिंसा के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने को कहना था, और अपनी पार्टी या अपने सहयोगी संगठनों को सार्वजनिक रूप से कहना था कि उनके कोई मेंबर अगर ऐसी हिंसा करते हैं तो उन्हें जिंदगी भर के लिए बेदखल कर दिया जाए।
बहुत सी बातों का असर वक्त गुजर जाने के बाद खत्म हो जाता है। जब देश में साम्प्रदायिक हिंसा बहुसंख्यक तबके के बुनियादी हक की तरह इस्तेमाल होने लगी हो, तो इन बरसों में प्रधानमंत्री के एक-दो ऐसे दार्शनिक बयान कुछ वैसे ही हैं जैसे कि मुर्दे को दवा देना। दवा देना भी हो गया, और उसके इस्तेमाल का वक्त भी निकल गया। अगर नरेन्द्र मोदी गंभीरता से अपने ओहदे की जिम्मेदारी पूरी करना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी लंबी-लंबी चुप्पी छोड़कर ऐसी हिंसा के वक्त तुरंत ही कार्रवाई करनी होगी, अपनी पार्टी की सरकारों को हुक्म देना होगा, दूसरी पार्टी की राज्य सरकारों को सलाह देनी होगी, और इस सिलसिले को थामना होगा। आज गाय बचाने के नाम पर किसी को भी मार डालने का एक अलिखित लायसेंस लेकर हिंसक मुजरिम घूम रहे हैं, और जगह-जगह साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं। प्रधानमंत्री को यह भी देखना होगा कि उनकी पार्टी के कौन से नेता, किस सहयोगी संगठन के कौन से नेता ऐसे जुर्म को, ऐसी हिंसा को, ऐसी हत्याओं को सही करार देने का काम कर रहे हैं। इसके लिए तो उन्हें किसी अदालती कार्रवाई की जरूरत भी नहीं है।
भारत में धर्म और गाय के नाम पर नफरत का सैलाब फैलते चल रहा है, और उसकी लहरें अधिक ऊपर तक उठ रही हैं, और देश के सद्भाव को डुबाने पर आमादा हैं। प्रधानमंत्री को अगर इस बात को कहने के लिए साबरमती जाना पड़ता है, तो उन्हें हर हफ्ते वहां चले जाना चाहिए, क्योंकि आने वाले महीनों में गुजरात के चुनाव भी हैं, और उनका वहां आना-जाना लगा ही रहेगा। फिलहाल ऐसी हिंसा के बाद उनकी महीनों की चुप्पी चीख-चीखकर बोलती है, और उन्हें इसके बारे में सोचना चाहिए। 

साइकिल की शक्ल में मोदी को एक नसीहत

संपादकीय
28 जून 2017


योरप में नीदरलैंड पहुंचे हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वहां के प्रधानमंत्री ने एक साइकिल तोहफे में दी। साइकिल पर चढ़े मोदी हंसते हुए दिख रहे हैं। दुनिया के बहुत से विकसित देशों में समझदार लोग साइकिल का खूब इस्तेमाल करते हैं। लंदन शहर में रहना तो अंधाधुंध महंगा है, लेकिन वहां के लोग अधिक से अधिक इस्तेमाल बसों और भूमिगत ट्रेन का करते हैं, और साइकिल सबसे लोकप्रिय वाहन है। लंदन के एक मेयर ने पूरे शहर में साइकिलों की एक ऐसी सेवा शुरू की जिसमें लोग बड़ी मामूली सी फीस देकर महीने भर तक शहर में कहीं से भी साइकिल उठा सकते हैं, और कहीं पर भी छोड़ सकते हैं। इसके लिए बहुत पास-पास साइकिल स्टैंड बनाए गए हैं। पूरे योरप में लोग एक देश से दूसरे देश जाते हुए ट्रेन में अपनी साइकिल भी चढ़ाकर ले जाते हैं, और दूसरे देश पहुंचते ही उस पर सफर शुरू कर देते हैं। अमरीका में भी जहां बड़ी-बड़ी दानवाकार निजी कारों का चलन है, वहां कुछ समझदार प्रदेशों में लोग साइकिल भी चलाते हैं, और वहां बसों के आगे-पीछे साइकिल फंसाकर रखने का चलन है ताकि लोग लंबा सफर बस में कर सकें, और फिर अपनी साइकिल चला सकें।
भारत में सड़कों पर साइकिल चलाना खतरे से खाली नहीं रह गया है। तेज रफ्तार गाडिय़ां बढ़ती चल रही हैं, और उसके साथ-साथ इन गाडिय़ों पर सवार लोगों का अहंकार भी बढ़ते चल रहा है। इंजन की ताकत को लोग अपनी खुद की ताकत मानकर अपने अलावा सड़क पर हर किसी को रौंदते-कुचलते चलना चाहते हैं। ऐसे में खेल के मकसद से, या कि फैशन के तौर पर तो भारत में लोग साइकिल चला लेते हैं, लेकिन बाकी जगहों पर इसका चलन घटते चल रहा है। इसकी एक दूसरी वजह यह भी है कि लोगों की आर्थिक स्थिति पहले से थोड़ी सुधरी है, और पिछले दो दशक में लोग मोटरसाइकिलों पर दूर-दूर तक जाकर काम करने लगे हैं। पेट्रोल तो खर्च होता है, लेकिन लोगों के बेहतर रोजगार की, बेहतर मेहनताने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं, जो कि साइकिल पर चलते हुए नहीं हो सकता था।
लेकिन साइकिल को लेकर सरकारों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती क्योंकि सरकार में बैठे तमाम लोग बड़ी-बड़ी मुफ्त की सरकारी गाडिय़ों पर चलते हैं, और साइकिल से देश के होने वाले फायदे की उन्हें फिक्र नहीं रहती। अपनी सेहत के लिए सत्तारूढ़ लोग घर के एयरकंडीशंड कमरों में साइकिल चला लेते हैं, और सड़कों का खतरा नहीं उठाते। ऐसे में इस देश को यह समझने की जरूरत है कि इस रफ्तार से अगर गाडिय़ों का प्रदूषण सड़कों पर रहा, तो सरकार का जनता के इलाज पर खर्च बढ़ता चला जाएगा, और सांस से जुड़ी बीमारियां इतनी बढ़ जाएंगी कि लोग शहरों में रह नहीं पाएंगे। आज भी लोग दिल्ली जैसे शहर को प्रदूषण की वजह से छोड़ रहे हैं। भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों को शहरी सड़कों से गाडिय़ों को घटाने के बारे में तेजी से सोचना चाहिए, और इसके लिए न सिर्फ प्रमुख मार्गों पर सार्वजनिक परिवहन शुरू करना पड़ेगा, बल्कि शहरों के बाकी हिस्सों को भी ऐसे बस-मेट्रो रास्तों से जोडऩा होगा ताकि लोग निजी गाडिय़ों को लेकर चलने से बच सकें। जिस दिन भारत की सड़कों पर ऐसी निजी गाडिय़ां कम होंगी, उसी दिन लोग साइकिलों का इस्तेमाल कर सकेंगे। आज लोग महज कसरत या फैशन, या खेल के लिए भारत में साइकिल चला लेते हैं, बाकी जान का जोखिम उठाकर कोई ऐसा करना नहीं चाहते। भारत के प्रधानमंत्री को योरप से मिला यह तोहफा भारत की आंखें खोलने वाला साबित होने चाहिए और प्रधानमंत्री वहां से यह जागरूकता सीख-समझकर आए होंगे तो यह भारत के हित में होगा।

लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति के लिए सामंती रेल-डिब्बा!

संपादकीय
27 जून 2017


नए राष्ट्रपति के बनने में अभी कुछ हफ्ते बाकी हैं, लेकिन रेलवे ने राष्ट्रपति के रेल सफर के लिए एक नया डिब्बा बनाने की योजना तैयार कर ली है, और सैलून कहे जाने वाले ऐसे डिब्बों को रेलवे में सबसे बड़ा ऐशोआराम माना जाता है। रेल मंत्री से लेकर रेलवे के कुछ बड़े अफसरों तक का सफर ऐसे खास डिब्बों को किसी रेलगाड़ी में जोड़कर पूरा होता है, लेकिन राष्ट्रपति के लिए बनने वाला यह डिब्बा 8 करोड़ रूपए लेगा। अभी तक जो डिब्बा चल रहा था वह 1956 से जारी था, और छह दशक के इस इतिहास में राष्ट्रपति इसमें कुल 87 बार चढ़े। अब इस डिब्बे को रिटायर कर दिया गया है, और नया डिब्बा बनाने की तैयारी चल रही है।
भारत अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गया, लेकिन सामंती गुलामी जारी है। राष्ट्रपति से लेकर बड़ी अदालतों के जजों तक, और राज्यों के राज्यपाल तक का पूरा कामकाज चापलूस और पाखंडी सामंती रीति-रिवाजों और प्रतीकों से भरा रहता है। कुछ बड़ी अदालतों में जजों के सामने जोकरों की तरह सजे हुए कर्मचारी चांदी का राजदंड लेकर चलते हैं, तो छत्तीसगढ़ जैसे राजभवन में इक्कीसवीं सदी में दरबार-हॉल बनाया जाता है। देश आजाद हुआ, तो लोकतंत्र तो आ गया, लेकिन न तो निर्वाचित राजाओं का मिजाज लोकतांत्रिक हो पाया, न ही प्रजा यह समझ पाई कि अब वह राजा है। दोनों तरफ की यह सोच मुगल और अंग्रेजकालीन यथास्थिति को जारी रखने में मददगार हुई, और राष्ट्रपति भवन या राज्यों के राज्यपाल-भवन में झंडा फहराने और उतारने के लिए, प्रमुख लोगों को सलामी देने के लिए सलामी गारद तैनात रहती है, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की पूरी फौज घोड़ों की पलटन पर सवार चलती है, मानो कोई हमला होने पर वे अपने भालों से राष्ट्रपति को बचाएंगे। यह पूरा अलोकतांत्रिक सिलसिला चारों तरफ फैलता और नीचे तक उतरता है, और बहुत से राज्यों में कमिश्नर-कलेक्टर या एसपी तक अपने अर्दली की पोशाक अलग बनवा लेते हैं। अफसर तो अफसर, उनके अर्दली भी बाकी अर्दलियों से अलग दिखने चाहिए।
देश की जनता का मोटा पैसा ऐसे दिखावे पर और सत्ता पर काबिज लोगों के घमंड को सहलाने पर खर्च होता है, और कुपोषण के शिकार इस गरीब देश की जनता के खजाने की बर्बादी बढ़ती चलती है। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार ने लालबत्तियों पर रोक लगाई, तो इससे मिली हुई छूट वाली पुलिस गाडिय़ों को अपने सामने चलाते हुए नेता और जज चलने लगे हैं। अब जज की गाड़ी पर लालबत्ती नहीं है, इसलिए सामने लालबत्ती की हकदार पुलिस गाड़ी सायरन बजाते चलती है। यह सिलसिला किसी जनहित याचिका के बिना खत्म होते नहीं दिखता है, और राष्ट्रपति के लिए नया डिब्बा बनाने की तो बात ही एक बहुत बड़ा सामंती प्रतीक है, जिसे सिरे से ही खारिज करना चाहिए।
लोकतंत्र के खिलाफ जितने प्रतीक रहते हैं, उनका जमकर सार्वजनिक विरोध होना चाहिए, और सत्ता पर काबिज, विशेषाधिकार से लैस लोगों को घेरकर जगह-जगह सवाल किए जाने चाहिए कि गरीबों के पैसे का ऐसा बेजा और अलोकतांत्रिक इस्तेमाल करने का हौसला उनमें आता कैसे है? यहां पर हम तीन राज्य गिनाना चाहेंगे जो कि ऐसे किसी भी पाखंड से बचे हुए हैं, पश्चिम बंगाल, केरल, और त्रिपुरा। इन तीनों ही राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार हो, उसे सादगी से रहना पड़ता है, क्योंकि इन राज्यों में जनता का राजनीतिक शिक्षण इतना है, उसमें जागरूकता इतनी है कि जनता नेताओं की खाट खड़ी कर दे। इन तीनों ही राज्यों में एक और बात एक सरीखी है कि यहां पर वामपंथी दलों की सरकार है या रही है, और वामपंथियों की सादगी के लिए जिद ऐसी है कि अपने पैसों से एक महंगा स्मार्टफोन लेकर चलने वाले अपने एक सांसद को सीपीएम ने अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल में पार्टी से निलंबित कर दिया है। इसके सांसदों को दिल्ली में जो मकान मिलते हैं, उनका आधा हिस्सा उन्हें पार्टी के कामकाज के लिए, पार्टी कार्यकर्ताओं के रूकने के लिए देना पड़ता है, और सांसद की तनख्वाह पार्टी में जमा होती है, जहां से उन्हें एक न्यूनतम गुजारा-भत्ता ही दिया जाता है। ऐसी सादगी की सोच पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की पार्टी में भी है क्योंकि जनता के बीच सादगी एक परंपरा बन गई है, और उसके खिलाफ जाकर कोई नेता या पार्टी लोकप्रियता नहीं पा सकते।
आज सोशल मीडिया जनदबाव का एक बड़ा जरिया बन गया है, और लोगों को सत्ता की ऐसी मदहोश फिजूलखर्ची के खिलाफ जमकर आवाज उठानी चाहिए, क्योंकि ऐसे खर्च रोके न गए, तो वे बढ़ते चले जाएंगे, और गरीबों के बच्चे भूखे रह जाएंगे।

सच की चाहत तो बहुत, बर्दाश्त जरा भी नहीं...

संपादकीय
26 जून 2017


केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने सुझाया है कि स्कूली किताबों में आपातकाल के इतिहास पर एक अध्याय जोडऩा चाहिए ताकि बच्चों को उस दौर की जानकारी हो सके। उनका कहना इस मायने में तो सही है कि योरप का इतिहास और जर्मनी का इतिहास, मुगलों का इतिहास और अंग्रेजों का इतिहास तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया जाता है, लेकिन भारत का ताजा इतिहास नहीं पढ़ाया जाता। उनका सुझाव एक साहसी सोच है, और हम इस बात के हिमायती हैं, हालांकि ताजा इतिहास को छूना कितना खतरनाक हो सकता है, उसे पहले सोच लेना चाहिए।
अब पौन सदी पहले का इतिहास गांधी की हत्या है, उसे स्कूली पाठ्यक्रम में किस तरह पढ़ाया जाएगा? देश की आम जनता और दूसरी तरफ गोडसेवादियों की सोच और नजरिए में बड़ा फर्क है। गांधी की हत्या को एक राष्ट्रवादी काम कहा जाएगा, या कि देश के खिलाफ की गई हत्या? क्या सरकारों में इतना हौसला होगा कि गोडसे को खुलकर देख सकें, और दिखा सकें? इसके बाद अगर देखें तो आपातकाल तो आता ही है, 1984 के सिख विरोधी दंगे भी आते हैं। इन दंगों के पहले का स्वर्ण मंदिर का आतंकियों का डेरा भी आता है, और ऑपरेशन ब्लू स्टार भी। हौसले के साथ खरा इतिहास लिखने वाले तो मिल जाएंगे, लेकिन किस सरकार में यह हौसला होगा कि केन्द्र या राज्य की स्कूली किताबों में इस पूरे दौर को ईमानदारी से खुलकर लिख सके? थोड़ा और आगे बढ़ें तो भारत के ताजा इतिहास में बाबरी मस्जिद को गिराना भी आता है, बाबरी के ठीक पहले अडवानी की रथयात्रा भी आती है, और बाबरी के ठीक बाद मुंबई के बम धमाके भी आते हैं। अब इनको किस इतिहासकार की नजर से दिखाया जाएगा? थोड़ा सा और आगे बढ़ें तो गोधरा कांड और गुजरात के दंगे आते हैं, और क्या आज सरकार ईमानदारी के साथ इस दौर को स्कूली बच्चों के सामने रख सकेगी?
सच की मांग तो आसान होती है, सच की चाहत भी जायज होती है, लेकिन सच के लिए बर्दाश्त कम ही लोगों के दिल-दिमाग में होता है। ताजा इतिहास तो मधुमक्खियों के छत्ते सरीखा होता है जिसे छेडऩा कम खतरनाक नहीं होता। लोगों को याद होगा कि कुछ लोग अपने लिखे हुए दस्तावेज की शर्त के साथ छोड़कर जाते हैं कि उन्हें उनके मरने के बाद जारी किया जाए, या कि बीस बरस बाद जारी किया जाए। लोगों के मन में ताजा इतिहास की ईमानदारी के लिए कोई बर्दाश्त नहीं रहता, आज तो भारत में बनने वाली फिल्मों में किसी राजा या रानी के जिक्र को लेकर बवाल खड़ा हो जाता है कि उनमें ऐतिहासिक सच्चाई को तोड़ा-मरोड़ा गया है। इसलिए वेंकैया नायडू की बात अच्छी होते हुए भी इस देश के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि इस देश ने सच लिखने, कहने, और सुनने का हक खो दिया है। अब तो इस देश में बिल्कुल पुख्ता और निर्विवाद इतिहास को भी क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड की लिखावट की तरह मिटाना शुरू हो गया है, और संग्रहालयों पर हमले होने लगे हैं, दस्तावेजों को जलाया जाने लगा है, और इतिहासकारों को पीटा जाने लगा है। ऐसा देश बच्चों को कहां से लाकर सच पढ़ाएगा? जर्मनी के हिटलर के इतिहास, या कि अमरीका के अश्वेतों के इतिहास, या योरप के इतिहास को पढ़ाना ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि उसमें किताबों को लिखने वालों को मारने के लिए किसी अमरीकी या यूरोपियन की आत्मा नहीं आ सकती, और न ही उनके भक्तजन मारने के लिए आ सकते हैं। अपना खुद का इतिहास बड़ा घातक और जानलेवा साबित हो सकता है, अगर वह सच हो तो। इस देश में आज पाखंड की पूजा होती है, और हकीकत की हिकारत। ऐसे में ताजा इतिहास के सच की ज्यादा चर्चा नहीं करनी चाहिए, मतदाताओं के बीच चुनाव लडऩे जाने वाले नेता और उनकी पार्टियां शायद ही किसी सच को बर्दाश्त कर सकें।

दो महिला खिलाडिय़ों के लाजवाब जवाब

संपादकीय
25 जून 2017


भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज ने दो दिन पहले मीडिया के एक सवाल के जवाब में पुरूषवादी सोच को तगड़ी लताड़ लगाई। एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कि उनका पसंदीदा पुरूष क्रिकेट खिलाड़ी कौन है? मिताली ने इसके जवाब में सवाल किया कि क्या कभी उस पत्रकार ने किसी पुरूष क्रिकेट खिलाड़ी से यह पूछा है कि उसकी पसंदीदा महिला क्रिकेट खिलाड़ी कौन है? कुछ इसी तरह की लताड़ एक पत्रकार को तब खानी पड़ी थी जब सानिया मिर्जा से टीवी पर इंटरव्यू करते हुए यह पूछा गया था कि वे शादी के बाद अब सैटल कब होंगी? सवाल का मतलब यह था कि आल-औलाद पैदा करके वे परिवार कब पूरा करेंगी? इस पर सानिया ने कहा था कि लगता है कि यह पत्रकार इस बात से खुश नहीं है कि वे दुनिया की अव्वल खिलाड़ी रहने के बजाय मां क्यों नहीं बन रही हैं? उन्होंने कहा कि ऐसा सवाल किसी पुरूष खिलाड़ी से नहीं पूछा जाता। इस पर इस नामी-गिरामी टीवी पत्रकार को माफी मांगनी पड़ी थी, और उसने कहा कि यह आपत्ति सही है क्योंकि वह ऐसा सवाल किसी पुरूष खिलाड़ी से कभी नहीं पूछता।
दरअसल समाज और मीडिया इन दोनों के महिलाओं के बारे में नजरिए में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। बल्कि मीडिया के मालिकाना हक से लेकर मीडिया की रीति-नीति तय करने वाले संपादकों तक की कुर्सियों पर महिलाओं को जगह बहुत ही कम मिली हुई है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि समाज के दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, या कि गरीबों को ऐसी कोई कुर्सियां नसीब नहीं होती हैं। मीडिया के मालिक तो खैर हो सकता है कि खानदानी दौलत की वजह से मालिक बन जाते हों, लेकिन जिन कुर्सियों पर विरासत की जरूरत नहीं होती, वहां भी महिलाओं को जगह नहीं मिलती है, और यही वजह है कि अवसरों से वंचित ऐसे तमाम तबकों को अपनी आवाज उठाने का मौका भी कम मिलता है। देश के बड़े-बड़े अखबारों और चैनलों के संपादकों के नाम देखें, तो शायद ही कोई एक महिला नजर आए, और शायद ही कोई दलित या अल्पसंख्यक नजर आए।
दूसरी बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मीडिया में सभी महत्वपूर्ण कुर्सियों पर ऐसे लोग आ जाते हैं जिनके परिवार के लोग सरकार या कारोबार में सबसे ऊंची कुर्सियों पर हैं। मीडिया के अपने कारोबार के लिए यह अच्छी बात रहती है कि वे ताकतवर ओहदों पर बैठे लोगों की आल-औलाद को अपने कारोबार में महत्व दें, और अधिक कारोबार पाएं। जानकारों का कहना है कि देश में जो सबसे अधिक सम्माननीय मीडिया कारोबार हैं, वहां भी महत्वपूर्ण पत्रकार बनने का मौका ऐसी ही संतानों को अधिक मिलता है। यह कुछ उसी तरह का वंशवाद है जिसके चलते लोगों को अपने परिवार के लोगों के न रहने पर उनके चुनाव क्षेत्र से लडऩे का मौका मिलता है। यह कुछ उसी तरह का है कि लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी सार्वजनिक संस्थाओं पर काबिज रहते हैं, और उन्हें खून निकलने तक चूसते रहते हैं। महत्व की ऐसी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के लोग इस बात का सम्मान भी जरूरी नहीं समझते कि वंचित तबकों को कोई महत्व दिया जाना चाहिए, क्योंकि खुद उनके अस्तित्व में ऐसे किसी न्यायसंगत नजरिए की कोई जरूरत नहीं रहती है।
समाज में जो तबके सदियों से बेइंसाफी झेल रहे हैं, उन्हें अपनी लड़ाई में आज सोशल मीडिया से भी बहुत मदद मिल रही है क्योंकि सोशल मीडिया किसी मालिकाना हक के काबू में नहीं है, किसी जाति या किसी लिंग का बंधक नहीं है। इसलिए आज सभी उन तबकों को अपने संघर्ष को एक बार फिर आगे बढ़ाना चाहिए, जिन्हें परंपरागत मीडिया, परंपरागत राजनीति, या परंपरागत समाज कभी इंसाफ नहीं देते हैं। इन दो महिला खिलाडिय़ों ने जिस दम-खम से मीडिया के अन्यायपूर्ण सवालों का जवाब दिया है, उससे भारत की उन लाखों महिला नेताओं को भी सबक लेना चाहिए जो कि किसी को कमजोर साबित करने के लिए उसे चूडिय़ां भेंट करती हैं, मानो चूडिय़ां कमजोरी का प्रतीक हों। सामाजिक और राजनीतिक प्रतीकों के प्रति चौकन्नापन आए बिना दबे-कुचले तबकों का संघर्ष न आगे बढ़ेगा, न कामयाब होगा।

पेड न्यूज पर मप्र के मंत्री की अपात्रता एक बढिय़ा कार्रवाई

संपादकीय
24 जून 2017


मध्यप्रदेश में भाजपा के एक ताकतवर मंत्री नरोत्तम मिश्रा को चुनाव आयोग ने  पेड न्यूज छपवाने का गुनहगार मानते हुए विधायकी के लिए तीन साल अयोग्य घोषित कर दिया है, और तीन साल की सीमा से वे अगला विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। यह मामला 2008 के विधानसभा चुनाव का है, जिसमें नरोत्तम मिश्रा की छपवाई पेड न्यूज के सुबूत भी लोगों ने चुनाव आयोग को पेश किए, और वे आयोग के सामने इसका कोई जवाब नहीं दे पाए। पेड न्यूज का मामला नया नहीं है, और अकेले मध्यप्रदेश का नहीं है, भारत के कई प्रदेशों में चुनाव के वक्त मीडिया अपनी आत्मा को एक या अधिक पार्टियों और एक या अधिक उम्मीदवारों के बीच अधिक से अधिक दाम पर नीलाम करने पर आमादा रहता है, और देश की प्रेस कौंसिल इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है।
पेड न्यूज का सबसे बड़ा मामला महाराष्ट्र का है जिसमें कांग्रेस के अशोक चव्हाण ने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेश के अधिकतर बड़े अखबारों में कई-कई पन्नों के परिशिष्ट छपवाए थे जिनमें एक ही मैटर को हर अखबार ने अपने संवाददाता की रिपोर्ट की तरह छापा था और जिनमें अशोक चव्हाण की पार्टी को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की गई थी। प्रेस कौंसिल तक यह शिकायत पहुंची थी, और नामी-गिरामी संपादकों की एक जांच टीम बनाई गई थी। इसने एक बहुत लंबी रिपोर्ट कौंसिल को दी थी जिसमें यह पाया गया था कि अशोक पर्व नाम से छपे पन्ने पूरी तरह से पेड न्यूज थे। लेकिन प्रेस कौंसिल ने उस रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की, और बात को दफन कर दिया गया। लीक होकर बाहर आई रिपोर्ट देश के तमाम पत्रकारों के बीच घूमती रही, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब मध्यप्रदेश के इस मंत्री के मामले में चुनाव आयोग की कार्रवाई से यह उम्मीद बंधती है कि आने वाले चुनाव में मीडिया और राजनीति की गिरोहबंदी लोकतंत्र को शिकस्त देने के लिए मीडिया के बेजा इस्तेमाल के पहले सोचेगी।
दरअसल मीडिया को खरीदना एक से ज्यादा तरह से होता है, और यह भी कह सकते हैं कि मीडिया अपने आपको एक से ज्यादा तरह से बेचता है। कुछ तो इस तरह से बिकते हैं कि वे किसी पार्टी या उम्मीदवार के खिलाफ कुछ नहीं छापेंगे, और इस तरह अखबार और चैनल अपनी चुप्पी और अनदेखी को बेचते हैं, और यह खरीद-बिक्री दिखती भी नहीं है, और साबित भी नहीं हो सकती। दूसरी तरफ मीडिया का एक हिस्सा अपने पन्नों को या अपने बुलेटिन के मिनटों को बेचता है, और खरीददार नेता या पार्टी के पक्ष में, या कि उसके विरोधी के खिलाफ खबरों को छापता-दिखाता है। यह दूसरे किस्म की खरीद-बिक्री साबित हो सकती है, और मध्यप्रदेश वाले मामले में यही हुआ भी है। मीडिया के साथ पिछले बरसों में कुछ दिक्कतें हुई हैं जिनसे यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है। एक तो मीडिया ने अपने खर्चे इतने बढ़ा लिए हैं कि उनको पूरा करने के लिए आत्मा बेचना एक किस्म से जरूरी हो जाता है। दूसरी बात यह कि मीडिया के भीतर आपस में इतना गलाकाट मुकाबला चलता है कि एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं और अपनी प्रसार संख्या या दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए वे पार्टियों, नेताओं या सरकारों के गढ़े हुए झूठ को भी सच की तरह दिखाते चलते हैं।
मध्यप्रदेश की इस कार्रवाई से देश के मीडिया के ईमानदार हिस्से, और राजनीति के भी बेहतर हिस्से को एक राहत हो सकती है, और अगले चुनाव में चुनाव आयोग को मीडिया की बेहतर निगरानी के लिए कामकाजी-अखबारनवीसों को पूरे देश में तैनात करना चाहिए ताकि वे ऐसे और मामले सामने रख सकें।

सोशल मीडिया पर हिंसा और नफरत के हमलों पर सरकारों को कार्रवाई करना ही चाहिए

संपादकीय
23 जून 2017


ट्विटर पर एनडीए के राष्ट्रपति-प्रत्याशी रामनाथ कोविंद के नाम से खोले गए एक अकाऊंट में उनकी तस्वीर भी लगी है, और उसे विश्वसनीय बनाने के लिए उस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दर्जनों ट्वीट भी री-ट्वीट की गई हैं। लेकिन कोविंद के नाम से पोस्ट की गई ट्वीट देखें तो उन पर यूपीए की राष्ट्रपति-प्रत्याशी मीरा कुमार  के बारे में बड़ी भद्दी बातें लिखी गई हैं। एक तरफ तो भारत का आईटी कानून अखबारों के लिए बने कानूनों के मुकाबले बहुत अधिक कड़ा है, और उस पर बड़ी कड़ी सजा का इंतजाम भी है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर हर तरह की विचारधारा वाले जिस आक्रामक और हमलावर तरीके से रात-दिन हिंसा और अश्लीलता की बातें करते हैं, उस पर मानो सरकार का कोई काबू नहीं है, और देश का कोई कानून लागू नहीं है।
हमारा मानना है कि आज चाहे सत्तारूढ़ एनडीए के समर्थक ही क्यों न अधिक हिंसक बातें पोस्ट कर रहे हों, इस सिलसिले को थामने के लिए केन्द्र सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। दूसरी तरफ राज्य सरकारें भी यह कार्रवाई कर सकती हैं, और आज जब तक किसी बड़े नेता के बारे में कोई दूसरा बड़ा नेता कुछ न लिखे, तब तक आमतौर पर कानून तक कोई दौड़ नहीं लगती। आज किसी खिलाड़ी या फिल्म सितारे, या कि किसी चर्चित अखबारनवीस या टीवी पत्रकार के खिलाफ भयानक हिंसक और फूहड़ बातें की जाती हैं। सोच-समझकर साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वाली बातें पोस्ट की जाती हैं। झूठी तस्वीरें झूठे संदर्भ सहित पोस्ट करके तनाव खड़ा किया जाता है। और कम्प्यूटर-इंटरनेट पर सुबूत इतनी आसानी से रहने के बावजूद सरकारें कार्रवाई नहीं कर रही हैं। यह सिलसिला और लोगों को और गैरजिम्मेदार, और हिंसक, और हमलावर बनाता है, और ऐसे लोगों में से जब तक रोजाना कहीं न कहीं कुछ लोगों को कैद न हो, लोग समझदार नहीं हो पाएंगे।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ जिम्मेदारियों के साथ ही मिली हुई हैं। दूसरे लोगों के सम्मान, उनकी भावनाओं को कुचलते हुए लोग अपनी अभिव्यक्ति अगर करते हैं, तो उनके खिलाफ कानून बने हुए हैं। बहुत बड़े अरबपति लोग तो अपने वकील करके अदालत तक जाते हैं, और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले लोगों को घसीटते हैं। दूसरी तरफ आम लोग या ऐसे लोग जो कि बड़ी अदालतों तक का खर्च नहीं उठा सकते, वे चुपचाप बैठ जाते हैं। दरअसल ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का मुख्यालय अमरीका में है जहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक अलग सीमा है, और एक अलग कानून उस पर लागू होता है। वहां पर जो बातें गैरकानूनी नहीं हैं, वे भी हिन्दुस्तानी कानून में गैरकानूनी हैं। अब यहां ट्विटर या फेसबुक को तो शायद रोज अदालत में नहीं घसीटा जा सकता, लेकिन भारतीय कानून का इस्तेमाल करके उन हिन्दुस्तानियों को जरूर कटघरे में लाया जा सकता है जो कि यहां बैठे हिंसा और नफरत की बातें करते हैं, दूसरों का सुख-चैन तबाह करते हैं।
लोगों को अपने परिवार, अपनी पार्टी, अपने दफ्तर, और अपने दायरे के लोगों को भी सावधान करना चाहिए कि डिजिटल सुबूत कभी मिटते नहीं है, लोग लिखने के बाद चाहे उसे मिटा डालें, लेकिन एक बार पोस्ट की गई बातें कभी खत्म नहीं होती हैं, वे सुबूत के लिए कम्प्यूटरों पर दर्ज रहती हैं। इसलिए अगर हिफाजत से रहना है, तो जिम्मेदारी से ही सोशल मीडिया पर रहना होगा।

टाटा की शुरू की एयर इंडिया फिर टाटा के हाथ जाएगी?

संपादकीय
22 जून 2017


दुनिया किस तरह एक चक्कर लगाकर सफर पूरा करती है यह देखना हो तो भारत की सरकारी विमान सेवा एयर इंडिया को देखना चाहिए। आज केन्द्र सरकार एयर इंडिया के दसियों हजार या लाखों करोड़ के अब तक हो चुके घाटे को देखते हुए उसे बेचने की फिराक में है, और सरकार के लोगों को यह डर भी है कि इसके लिए पता नहीं सही दाम और सही ग्राहक मिलेंगे या नहीं। सरकारी संरक्षण और भारी तरफदारी के बावजूद एयर इंडिया की हालत बहुत खराब है, और इस खराबी की चर्चा करते हुए वह पुरानी सीएजी रिपोर्ट याद आती है जिसमें कहा गया था कि एयर इंडिया ने मुसाफिरों को मुफ्त दी जाने वाली पिपरमेंट की खपत छह सौ प्रति मुसाफिर बताई थी, जो कि चोरी-डकैती से कम कुछ नहीं हो सकता। खैर, एयर इंडिया उतनी ही भ्रष्ट होगी जितनी कि सरकार की बहुत सी और संस्थाएं होंगी। आज चर्चा के लायक बात यह है कि ऐसी खबरें हैं कि एयर इंडिया के आधे से अधिक शेयर खरीदने में टाटा ने दिलचस्पी दिखाई है। अब यह याद करने का मौका है कि 1932 में टाटा ने ही यह एयर लाईंस शुरू की थी, और आजादी के तुरंत बाद सरकार ने निजी कंपनियों के राष्ट्रीयकरण की सोच के चलते इस कंपनी के आधे शेयर खरीद लिए थे, और फिर कुछ बरस बाद इस पूरी कंपनी को ही अधिग्रहित कर लिया था। नेहरू के वक्त के सार्वजनिक उपक्रम के उस दौर में एयर इंडिया को एक सार्वजनिक उपक्रम बना दिया गया था, और बाद में सरकार के हर तबके ने इसे अपने-अपने तरीके से चूसा और दुहा। नतीजा यह निकला कि एकाधिकारवादी सरकारी कारोबार को भी सरकार ने डुबाकर रख दिया, और अब आज इस कारोबार को बचाने के लिए एक बार फिर टाटा से उम्मीद दिख रही है। करीब एक सदी बाद अब एयर इंडिया फिर घूम-फिरकर अपने संस्थापक के चरणों में जाकर लेट सकती है।
मौजूदा सरकार की सोच बहुत साफ है कि सरकार को कारोबार नहीं करना चाहिए, और कारोबार को नियंत्रित करके उसकी कमाई से तीस फीसदी टैक्स वसूल करना चाहिए। यह सोच मोदी सरकार की अपनी नहीं है, कांग्रेस की सरकार ने 90 के दशक में ही आर्थिक उदारीकरण का सिलसिला शुरू कर दिया था, और आरबीआई गवर्नर से लेकर वित्तमंत्री, और फिर प्रधानमंत्री के पद तक सम्हालते हुए मनमोहन सिंह ने इस उदारीकरण को लगातार बढ़ाया था। बहुत से सार्वजनिक उपक्रमों से सरकार ने उस वक्त घाटे के चलते हुए हाथ धो लिए थे, और अब एयर इंडिया शोकेस में रखा हुआ अगला सार्वजनिक उपक्रम दिख रहा है।
हम निजीकरण के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि अब खुली बाजार व्यवस्था में अगर सरकार अपने संस्थानों को बहुत ही खूबी और काबिलीयत से नहीं चला सकेगी, तो वह कारोबार से बाहर भी हो जाएगी, और ऐसे पब्लिक सेक्टर का दाम भी मिट्टी में मिल जाएगा। ऐसे में अगर सरकार काबिल कारोबारियों को सार्वजनिक उपक्रम के शेयर बेचती है, और वे ऐसे उपक्रमों को नियंत्रित करते हैं, तो सरकार वहां पर बेईमानी और चोरी-डकैती करने के लायक तो नहीं रहेगी, लेकिन सरकार के पास बचे हुए आधे से कम शेयरों के दाम भी आज के सौ फीसदी शेयरों के मुकाबले कई सौ फीसदी बढ़ जाएंगे, और सरकार फायदे में रहेगी। जब सत्ता का मिजाज ही अपने संस्थानों को लूटने का हो जाता है, तो उसे कारोबार से बाहर हो जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए दो बातों का बहुत ख्याल रखना चाहिए, पहली तो यह कि केवल ऐसे उपक्रम बेचे जाएं जो कि घाटे में चल रहे हैं, या कि जिनसे बहुत अधिक फायदा होने की संभावना है। सार्वजनिक उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारियों को यह नहीं सुहाता है कि संस्थानों का निजीकरण हो, क्योंकि इससे बहुत सी नौकरियां खत्म होती हैं, और निजी कारोबारी कम लोगों से बेहतर काम लेने का काम करते हैं। लेकिन नौकरियां बचाने के लिए सरकारी उपक्रमों को घाटे में चलाना ठीक नहीं है, क्योंकि यह पूरे देश का घाटा रहता है, महज सरकारी खजाने का घाटा नहीं रहता। इस देश  के औद्योगिक ढांचे का बेहतर इस्तेमाल अगर निजी कारोबारी कर सकते हैं, तो दुनिया भर में खुले मुकाबले के आज के इस दौर में सरकार को ऐसा करना भी चाहिए। करीब एक सदी बाद टाटा को अपना शुरू किया हुआ कारोबार अगर फिर से फायदे में चलाने की चुनौती मिल रही है, तो यह देश के सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के मामले में एक बड़ी मिसाल बन सकती है। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार टाटा को यह कंपनी बेचकर कह रही हो, तेरा तुझको अर्पण, लाखों करोड़ डूबा मेरा...।

सनसनी पर उतारू मीडिया की सुनामी से घिरे लोग...

संपादकीय
21 जून 2017


भाजपा-एनडीए ने अपने राष्ट्रपति पद प्रत्याशी का नाम घोषित किया तो लोग उनकी जाति की चर्चा पर उतर आए। और इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि ऐसे किसी फैसले और चुनाव के पीछे धर्म या जाति या क्षेत्रीयता का पैमाना तो रहता ही है। इसलिए अगर रामनाथ कोविंद एक दलित हैं, तो उनका दलित होना भारत की राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा में अनदेखा नहीं रह सकता। लेकिन कोई अगर यह समझे कि महज उनके दलित होने की वजह से ही उन्हें प्रत्याशी बनाया गया है, तो उन्हें यह भी देख लेना चाहिए कि राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में कोविंद का लंबा इतिहास है। वह अच्छा है या बुरा है, यह एक विश्लेषण का मुद्दा हो सकता है, लेकिन उन्हें महज दलित होने की वजह से राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, ऐसे नतीजे पर पहुंचना थोड़ी ज्यादती होगी। लेकिन मीडिया लोगों की सोच को एक अतिसरलीकरण की तरफ धकेलता है। कोविंद के बारे में पहले ही घंटे से यह बात कही जाने लगी कि वे भाजपा-एनडीए के प्रतिभा पाटिल हैं। दरअसल जब मीडिया ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाया था तो उनके खिलाफ बड़ी आक्रामक जुबान में यह कहा जाता था कि उनकी योग्यता महज इंदिरा गांधी के घर खाना बनाने जितनी थी। और उसी अपमानजनक मिसाल को लोग आज कोविंद पर फिट कर रहे हैं।
दरअसल हिन्दुस्तान में अब टीवी चैनल लोगों की सोच को तय करते हैं। और टीवी की अपनी मजबूरी यह है कि दर्शकों की सीमित संख्या को झपटकर अपने कब्जे में करने के लिए उसे सबसे सनसनीखेज, फिर चाहे झूठी ही क्यों न हो, सुर्खियों को दिखाना पड़ता है और लोगों को बांधकर रखना पड़ता है। अब टीवी को देख-देखकर प्रभावित हो चुके दर्शकों के सामने जब अखबारों को आना पड़ता है, तो वे भी टीवी की सनसनी से अछूते नहीं रह पाते, और उनके सामने भी प्रसार संख्या को बढ़ाने का गलाकाट मुकाबला रहता ही है। ऐसे माहौल में जब अच्छे-भले गंभीर और बड़े अखबारों की वेबसाइटों को देखें तो दिखाई पड़ता है कि सबसे सेक्सी, सबसे बुरे स्कैंडल वाली, सबसे अधिक नंगेपन वाली सुर्खियों के लिंक डाल-डालकर ये वेबसाइटें इंटरनेट-ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं, और जिस तरह टीवी टीआरपी के पीछे भागते हैं, अखबार प्रसार संख्या के पीछे भागते हैं, उसी तरह इंटरनेट के पेज हिट्स की तरफ भागते हैं। यह सिलसिला गैरजिम्मेदारी को बढ़ाते चलता है, और लोग तथ्यों के बजाय विशेषणों की बैसाखियों पर दौडऩे की कोशिश करने लगते हैं, कर रहे हैं। अब ऐसे में सनसनी की आग में घी या मिट्टीतेल डालने के लिए सोशल मीडिया पहुंच गया है, और इसमें गैरजिम्मेदार, भड़काऊ लोगों की भीड़ तो है ही, बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता भी पूरी गैरजिम्मेदारी से भड़काऊ झूठ को बढ़ावा देते रहते हैं। इसकी ताजा मिसाल उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का फेसबुक पेज है जहां पर असम की एक पुरानी तस्वीर को बंगाल की ताजा तस्वीर बताते हुए पोस्ट किया गया है, और इसमें एक आदिवासी महिला के कपड़े फाड़े हुए दिख रहे हैं, और अभी खबर आई है कि इसे लेकर योगी के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई है कि उन्होंने एक आदिवासी महिला की नग्नता को इस तरह उजागर किया, और झूठ के साथ उजागर किया।
दरअसल आज का वक्त सूचना के सैलाब का, बल्कि सूचना की सुनामी का है, और इसके थपेड़ों में लोगों की आंखों में रेत भी जा रही है, और नमकीन पानी भी जा रहा है। लोगों को सच दिखना बंद हो रहा है, और इन लहरों में उतराते-चढ़ते लोग सैलाब के साथ कहीं के कहीं पहुंच जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अखबारों में जो कुछ लोग अब तक गंभीर बचे हुए हैं, उन्हें जब तक रोजी-रोटी चलती रहे, तब तक गंभीर बने रहना चाहिए, ईमानदार बने रहना चाहिए, हालांकि यह बात दिन-ब-दिन अधिक और अधिक मुश्किल होती जा रही है। सनसनीखेज और चटपटे झूठ के बाजार में खालिस तपाए हुए सच की पूछ-परख बड़ी कम है, और लोकतंत्र में लोग इस नौबत के लंबे दाम चुका रहे हैं।

योग के फायदे तो अनगिनत पर सरकार पहले जगह तो दे

संपादकीय
20 जून 2017


भारत की सदियों पुरानी जीवनशैली का एक हिस्सा, योग अब पूरी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में अधिक प्रचलित होते चल रहा है। वैसे तो भारत में दिलचस्पी रखने वाले लोग जमाने से योग सीखने भारत आते थे, और बहुत सी पुरानी तस्वीरें बताती हैं कि आधी-पौन सदी पहले भी पश्चिम में योग का प्रचलन था। लेकिन नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह अंतरराष्ट्रीय दिवस भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्रसंघ से घोषित हुआ और आज भारत के तकरीबन हर हिस्से में योग का सार्वजनिक अभ्यास हुआ। टेलीविजन पर ऐसा बहुत समय बाद हुआ कि सुबह के दो घंटे हत्या और बलात्कार से आजाद रहे, और सिर्फ योग और उसके फायदों पर चर्चा होती रही। कुछ भाजपा विरोधी पार्टियों के राज वाले राज्यों को छोड़ दें, तो बाकी सारे देश में सरकार ने इस दिन इस समारोह को सरकारी स्तर पर किया, और स्कूल-कॉलेज के बच्चों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
बिना किसी खर्च के, बिना बिजली और बिना किसी मशीन के जो योग हो सकता है, वह लोगों को बहुत सी बीमारियों से बचाता है। हम बाबा रामदेव जैसे कुछ नाटकीय योग की बात नहीं करते, जिसके फायदे को लेकर डॉक्टरों को कई तरह के शक हैं, और जिससे होने वाले नुकसान को लेकर कई तरह आशंकाएं भी हैं, हम भारत के परंपरागत योग की बात करते हैं जो कि रामदेव के पैदा होने के सदियों पहले से बिना किसी बाजारू नाटकीयता के चल रहा है, और आज भी मुंगेर जैसे विश्वविख्यात योग संस्थानों से लेकर दक्षिण भारत के कई योग गुरुओं तक ने बिना साबुन और नूडल्स बेचे सिर्फ योग को फैलाया है। यह अलग बात है कि आज रामदेव भारत के राजकीय योग गुरु बने बैठे हैं, और सरकारी मंच से शोहरत पाते हुए अपने हजारों करोड़ के कारोबार को दसियों हजार करोड़ का कर रहे हैं।
लेकिन इन सबसे परे अगर हम पते की बात पर सीधे आएं, तो राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थानों को साफ-सुथरी, खुली और हवादार जगहों पर योग का इंतजाम करना चाहिए जिससे कि भारत की आबादी में बढ़ते चल रहे डायबिटीज सरीखे रोग पर काबू हो सके। अभी-अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने यह घोषणा की है कि हर जिला मुख्यालय में योग उद्यान बनाया जाएगा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इसी जगह इसी कॉलम में बरसों से यह मांग करते आ रहे हैं कि योग उद्यान बनाकर जनता को सेहतमंद रखने की एक लगभग मुफ्त कोशिश करनी चाहिए ताकि सरकार पर बीमार और इलाज का खर्च न आए। कई किस्म की गंभीर बीमारियां भी इस मुफ्त की जीवनशैली से घट सकती हैं, जिंदगी बढ़ सकती है, और चुस्त-दुरुस्त रहने से इंसान की उत्पादकता भी बढऩे की गारंटी रहती है। आज दिक्कत यह है कि खुली हुई जितनी जगह सरकार के पास है, उस पर स्थानीय संस्थाएं और सरकारी संस्थाएं सिर्फ कारोबार के कॉम्पलेक्स बनाने पर आमादा रहती हैं, और जनता की जरूरत के लायक मैदान और बाग-बगीचे बच नहीं जा रहे। देश में सरकार ही जमीनों की सबसे बड़ी मालिक है, इसलिए जमीन तो उसे ही देनी होगी, लेकिन समाज योग प्रशिक्षकों को जुटाने में मदद कर सकता है, और बहुत मामूली से खर्च से लोगों की जिंदगी को बहुत ही सेहतमंद बनाया जा सकता है, बीमारियों से लोगों को बचाया जा सकता है जो कि आगे चलकर सरकारी खर्च में बचत का एक तरीका भी साबित होगा। छत्तीसगढ़ में अभी हम शहरों की सार्वजनिक जगहों पर म्युनिसिपल द्वारा लगाई गई कसरत की मशीनों को देखते हैं जिन पर लोग दिखते ही हैं। जो लोग कसरत करते हैं, उनके लिए योग को अपनाना आसान भी रहता है, और राजधानी रायपुर के बगीचों में ये दोनों काम साथ-साथ करते हुए लोगों की भीड़ दिखती है। योग उद्यान बनाने के साथ-साथ जो मौजूदा उद्यान हैं, उनमें भी सरकार को थोड़ी सी पहल करके जनता के बीच के लोगों में से ही वालंटियर योग प्रशिक्षक तलाशने चाहिए। दूसरी तरफ स्कूल और कॉलेज भी खेलकूद के साथ-साथ योग को अपना सकते हैं, और इससे नफा छोड़ कोई नुकसान नहीं होगा।
अभी हमारे सामने 31 मार्च 2012 का संपादकीय है जिसमें हमने लिखा था-'....हम समाज और सरकार दोनों के स्तर पर एक सेहतमंद जीवनशैली के लिए जागरूकता के एक बड़े अभियान को तुरंत शुरू करने की मांग करते हैं। इसके तहत हर शहर और कस्बे में लोगों के लिए साफ हवा में घूमने-फिरने, कसरत करने, बीमारियों से बचाव की जानकारी पाने, योग और प्राणायाम के विवादहीन तरीकों को बढ़ावा देने का इंतजाम करना चाहिए। एक योजना के तहत सरकार ही जिला स्तर से शुरू करके बाद में और नीचे के स्तर तक ऐसे प्राकृतिक केंद्र विकसित कर सकती है जिनमें पेड़ों के बीच साफ और खुली हवा में ऐसे तमाम काम चल सकते हों। यह बात हम पहले भी सरकार को सुझा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जहां पर कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं, और मंत्रिमंडल में बहुत से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हैं, वहां पर फिर ऐसी जरूरत के लिए जागरूकता आसानी से आनी चाहिए। समाज अपने-आपमें इतने बड़े प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र खुद तो नहीं बना सकता, लेकिन वह सरकार को इसके लिए  तैयार जरूर कर सकता है...'

भाजपा का राष्ट्रपति प्रत्याशी घोषित, विपक्ष का पता नहीं

संपादकीय
19 जून 2017


राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के मौजूदा राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करके भाजपा ने एनडीए के भीतर और बाहर यह जाहिर कर दिया है कि उसे बहुमत या सर्वमत की कोई जरूरत नहीं है, और वह बाकी साथियों के बिना भी अपनी मर्जी से राष्ट्रपति बनवा सकती है। एक पढ़े-लिखे, वकालत किए हुए, और दो बार राज्यसभा सदस्य रहे एक दलित नेता को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने मुख्य विपक्ष कांग्रेस-यूपीए के सामने भी यह दिक्कत खड़ी की है कि वह एक दलित के नाम का विरोध कैसे करे? और यह बात तो है ही कि विपक्ष के पास अभी तक किसी एक नाम पर व्यापक सहमति का आसार भी नहीं दिख रहा है। यह एक अलग बात है कि विपक्ष के बीच किसी नाम पर गंभीरता से चर्चा भी सुनाई नहीं दे रही है।
राष्ट्रपति के नाम पर इस जगह बहुत कुछ लिखने का नहीं है, लेकिन इससे दो बातें साफ होती हैं, एक तो यह कि एनडीए के भीतर भाजपा को किसी सहमति की अब खास जरूरत नहीं लगती है, यह महज इस फैसले से साबित नहीं होता, बल्कि भाजपा के पूरे रूख से उसका यह नया आत्मविश्वास दिखाई देता है। दूसरी तरफ खाली बैठे हुए विपक्ष के पास किसी सहमति तक पहुंचने की ताकत भी नहीं दिख रही है, और अब तक तो गैरएनडीए पार्टियों की कोई ऐसी महत्वपूर्ण बैठक भी नहीं हुई है जिसमें किसी उम्मीदवार के नाम पर कोई चर्चा हो सके। कुल मिलाकर, घूम-फिरकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आसपास कुछ लोग जुटते हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी खो चुकी ताकत के बाद अब कोई वजन भी नहीं रखती। राष्ट्रपति चुनाव के इस मौके पर देश में दो बड़े गठबंधनों के बीच शक्ति संतुलन का एक नया सुबूत सामने आया है, और भाजपा का एक नया राजनीतिक भविष्य भी इससे साफ दिखाई देता है। इस चुनाव के बाद विपक्ष को भी इस देश में विपक्ष की भूमिका के बारे में सोचना चाहिए कि अगर वे राष्ट्रपति चुनाव के वक्त भी एक होकर नहीं बैठ सकते, तो फिर वे देश के चुनाव में किस तरह कोई गठबंधन बना पाएंगे। आज जिस तरह राहुल गांधी कांग्रेस के भीतर कांग्रेस की संभावनाओं पर एक बड़ा स्पीड ब्रेकर हैं, ठीक उसी तरह देश में विपक्ष की एकजुटता की संभावना में कांग्रेस एक बाधा दिखाई पड़ रही है। इस नौबत से उबरे बिना देश में भाजपा-एनडीए का विकल्प खड़ा नहीं होने वाला है।
भाजपा के अध्यक्ष सहित कई लोगों का यह रूख पिछले दिनों सामने आया कि वह महज सहमति की कोशिश कर रही है, उसे किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। लोगों को याद होगा कि लंबे समय तक देश और प्रदेशों में कांग्रेस का राज चलते रहा, और वह पार्टी अपनी मर्जी से कई ऐसे राष्ट्रपति बनाते रही जो कि शर्मनाक साख वाले थे। लेकिन जिस तरह पुरानी कहावतों में कहा जाता है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, संसदीय लोकतंत्र में भी गिनती ऐसे ही मायने रखती है कि जिसके सांसद-विधायक, उसी का राष्ट्रपति।

राहत, मदद, और मुआवजे का राजनीतिक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए

संपादकीय
18 जून 2017


जब कोई डॉक्टर स्नायुतंत्र की जांच के लिए लोगों की हड्डियों के जोड़ पर रबर का एक हथौड़ा मारते हैं, तो घुटनों पर इसके पड़ते ही पूरा पैर एक झटके से हिलता है। अंग्रेजी में इसी बात को नी जर्क रिएक्शन कहते हैं कि घुटने पर पड़ा तो बिलबिलाते हुए तुरंत प्रतिक्रिया की। इन दिनों भारत की सरकारें कुछ ऐसा ही कर रही हैं। देश और प्रदेशों में जब कोई ऐसा आंदोलन चलता है जिससे कि मतदाताओं के एक संगठित तबके की सोच पर बड़ा फर्क पड़ सकता है तो सरकारें तुरंत कार्रवाई करती हैं, और उससे भी अधिक कार्रवाई करती हुई दिखना चाहती हैं। मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिस गोली से तीन मौतें हुई थीं, तो आनन-फानन भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मरने वालों के लिए एक-एक करोड़ रूपए मुआवजे की घोषणा कर दी थी। इसी वक्त उनकी पार्टी के दूसरे मंत्री और नेता यह बयान दे रहे थे कि मरने वाले किसान नहीं थे, वे अराजक तत्व थे जो कि किसान आंदोलन में घुस गए थे। न तो शिवराज सिंह ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व से ऐसे अभूतपूर्व मुआवजे पर चर्चा की थी, न ही यह सोचा था कि इससे बाकी प्रदेशों, और खुद मध्यप्रदेश पर अभी ऐसी पुलिस-गोली-मौत पर मुआवजे का कैसा दबाव पड़ेगा। यह नी जर्क रिएक्शन दूसरे प्रदेशों में भी जगह-जगह देखने मिल रहा है, और जनमत की नाराजगी से बचने के लिए सरकारें तुरंत हरकत में आई हुई दिखने की कोशिश में ऐसे फैसले लेती हैं जो कि लंबे वक्त में जनता के ही खिलाफ हो जाते हैं।
जनलुभावने फैसले, और जनहित, ये दोनों हमेशा साथ-साथ नहीं चलते। बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जिनमें ये दोनों एक बराबरी से कंधे से कंधा टकराते हुए, कदम से कदम मिलाते हुए चलते हैं, लेकिन बहुत से मामलों में ये एक-दूसरे के ठीक खिलाफ भी हो जाते हैं। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम समाज के भीतर मर्दों को खुश करने के लिए एक अकेली शाहबानो को कुचलने का कानून बना डाला था, वह उस वक्त मुस्लिम मर्दों के बीच लुभावना मान लिया गया था, लेकिन वह जनहित के ठीक खिलाफ था। ठीक इसी तरह आज देश भर में गाय और बीफ को लेकर बनाए गए कानून, और गैरकानूनी हिंसा को मौन मंजूरी के मामले हैं। ये एक शाकाहारी, हिन्दू, और ऊंची समझी जाने वाली जातियों के बीच लुभावना कानूनी-गैरकानूनी काम तो हो सकता है, लेकिन यह जनहित के ठीक खिलाफ है। ऐसा ही मामला एक करोड़ का मुआवजा देने का है। सरकार के हाथ जनता का खजाना रहता जरूर है, लेकिन वह किसी बादशाह की मर्जी पर गले से उतारकर दी गई मोतियों की माला की तरह का नहीं रहता है, वह एक लोकतांत्रिक और सरकारी समझ के साथ, नियमों के भीतर, और दीर्घकालीन सोच का रहना चाहिए।
देश में जगह-जगह केन्द्र और राज्य सरकारें किसी कुदरती या इंसानी हादसे के बाद तरह-तरह के मुआवजों का ऐलान करती हैं। देश में एक मुआवजा नीति बनाई जानी चाहिए जिसे संघीय ढांचे के तहत व्यापक सहमति के दायरे में लाने की जरूरत है। इससे मुआवजे की लुभावनी घोषणा करके मतदाता-तबके के बीच राजनीतिक-लोकप्रियता पाने का सत्तारूढ़ नेताओं का उतावलापन काबू में आएगा। केन्द्र और राज्य के बीच, और अलग-अलग राज्यों के बीच भी अलग-अलग जिंदगियों की कीमत, या कि राहत तय करने के स्पष्ट पैमाने बनने चाहिए, वरना आज तो कई हताश-निराश किसान ऐसे भी हो सकते हैं जो कि किसी आंदोलन में अपनी जान देकर परिवार को एक करोड़ रूपए का मुआवजा दिलवाने को अपनी जिंदगी से बेहतर मान लेंगे। हमारा ख्याल है कि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर हर इंसानी जिंदगी का कई तरह का बीमा भी करवा सकती हैं, और अलग-अलग मुआवजों के बजाय लोगों को अपने हक से बीमे का दावा-भुगतान पाने दे सकती है। दुर्घटनाओं को लेकर पहले से ऐसे बीमे रहते हैं, और बाकी हादसों के लिए भी इसका इंतजाम होना चाहिए। ऐसी कोई तर्कसंगत वजह नहीं हो सकती कि किसी सड़क हादसे में अकेले मरने वाले के परिवार को किसी मुआवजे का हकदार न माना जाए, और जब दर्जन भर लोग एक हादसे में एक साथ मर जाएं, तो उन सबके परिवारों को मुआवजे का ऐलान सरकार करे। ऐसी मौत अकेले हो, या औरों के साथ हो, परिवार पर उनका असर एक जैसा ही पड़ता है।
फिलहाल देश भर में किसान आंदोलनों के चलते हुए मौत पर मुआवजे से परे भी तरह-तरह की कर्जमाफी की घोषणा हो रही है, अगले चुनावों के घोषणा पत्र अभी से घोषित किए जा रहे हैं कि किसी पार्टी की सरकार आने पर किसानों के लिए क्या-क्या किया जाएगा। ऐसी बिलबिलाहट से उपजी ऐसी प्रतिक्रिया से देश के दूसरे तबकों के भीतर भी यह बात घर कर जाती है कि हिंसक आंदोलन बिना कोई मांग पूरी नहीं हो सकती, या कि बड़ी संख्या में आत्महत्याओं के बाद भी सरकार के कानों पर जूं रेंगना शुरू करती हैं। सरकारें चूंकि पांच बरस की निरंतरता के साथ आती हैं, और राजनीतिक दलों को ऐसे एक कार्यकाल से अधिक के लिए भी सोचना पड़ता है, या कम से कम सोचना चाहिए, फिर बड़े राजनीतिक दल एक से अधिक राज्यों के लिए एक सरीखी जवाबदेही का बोझ भी ढोते हैं, इसलिए राहत, मदद, और मुआवजे की नीतियों का राजनीतिक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए, इससे देश बर्बाद होता है। किसानों को बचाना हो, या किसी और तबके को पैरों पर खड़ा करना हो, उन्हें लगातार बैसाखियों से बांधकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए लंबी सोच के साथ ठोस योजनाएं बनानी चाहिए जो कि उतनी लुभावनी नहीं लगेंगी जितनी कि एक करोड़ के मुआवजे की मुनादी लगती है, लेकिन वैसी आत्मनिर्भरता ही उन तबकों और बाकी देश, सबके भले की होगी।

शौचालय तो अच्छे हैं, लेकिन हत्या करके लागू करना वैसा ही है जैसा इमरजेंसी में नसबंदी...

संपादकीय
17 जून 2017


राजस्थान में खुले में शौच रोकने के लिए एक म्युनिसिपल के लोग शौच करती महिलाओं की तस्वीरें खींच रहे थे, और इनका विरोध करने पर एक सामाजिक कार्यकर्ता को पीट-पीटकर मार डाला गया। देश में खुले में शौच को रोकने का एक बड़ा अभियान चल रहा है जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर अमिताभ बच्चन तक सभी जुटे हुए हैं, और सरकारें खूब बड़ी रकम खर्च करके गांव-गांव में, घर-घर में शौचालय बना रही हैं। शौचालय बनाने के आंकड़े जिले के अफसरों को प्रधानमंत्री के हाथों सम्मान और पुरस्कार दिलवा रहे हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में दर्जनों जगहों से खबरें आई हैं कि रिकॉर्ड बनान के लिए, अपने जिले या अपने म्युनिसिपल को ओडीएफ घोषित करवाने के लिए अफसरों ने फर्जी आंकड़े गढ़ लिए, और अधूरे पड़े शौचालयों को इस्तेमाल होते बता दिया, पूरा बना हुआ बता दिया।
खुले में शौचालय एक सामाजिक शर्मिंदगी की बात भी है, और यह सेहत के लिए खराब भी है। इंसान की न्यूनतम प्रतिष्ठा के लिए भी यह जरूरी है कि उसे खुले में शौच न करना पड़े, और खासकर बेबस होकर न करना पड़े। यह एक अलग बात है कि गांवों में लोगों का खेत या मैदान जाना, या नदी-तालाब जाना सामाजिक संपर्क और संबंध का एक जरिया भी रहता है, लेकिन फिर भी यह तो मानना ही होगा कि शौचालय न होने की वजह से ऐसा होना शर्मिंदगी भी है, और खतरनाक भी है। बहुत सी महिलाएं रात-बिरात खुले में शौच के लिए आबादी के बाहर आते-जाते बलात्कारी मर्दों के हमले का शिकार भी होती रहती हैं। इसलिए सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना अच्छी है, और जनता को सरकार से पूरी की पूरी रकम की मदद भी मिल रही है।
लेकिन किसी भी, और कितनी भी अच्छी योजना को लागू करने के तौर-तरीके उस योजना को बुरा बनाने में देर नहीं करते। लोगों को याद होगा कि किस तरह इमरजेंसी में संजय गांधी के लगाए नारे को पूरा करने के लिए देश भर की सरकारी मशीनरी झोंक दी गई थी, और आबादी पर काबू पाने के लिए नसबंदी का अभियान चलाया गया था। आबादी घटाना बुरी बात नहीं है चाहे वह देश की हो, चाहे वह परिवार की हो। और गरीब परिवारों में अगर बच्चे कम रहें, तो उनकी जिंदगी बेहतर होती है इसमें भी कोई शक नहीं है। लेकिन इस अच्छे नारे पर इतना बुरा अमल हुआ था कि नसबंदी इस देश के इतिहास में एक बदनाम और हैवान शब्द हो गया, और संजय गांधी इसी एक बात को लेकर देश के सबसे बड़े खलनायक हो गए। सरकारी अमले ने सरकार के दिए हुए टारगेट को पूरा करने के लिए राह चलते कुंवारे लड़कों को भी पकड़-पकड़कर उनकी नसबंदी करवा दी थी, और देश में सेंसरशिप की वजह से ऐसी ज्यादती की खबरें भी नहीं आती थीं। नतीजा यह हुआ कि जब तक इंदिरा-संजय को जनता पर जुल्म का अंदाज लग पाता, उसके पहले उनकी हार तय हो चुकी थी।
आज शौचालय न रहने पर जगह-जगह अफसर लोगों का रियायती राशन बंद कर रहे हैं, उनके किसी भी तरह के सरकारी कामकाज पर रोक लगा रहे हैं, और शौच पर जाती महिलाओं की तस्वीरें खींचना, उन पर टॉर्च की रौशनी डालना जैसे बहुत से घटिया तौर-तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं। अभी घर-घर में शौचालय से आने वाली दो दिक्कतों का अंदाज भी नहीं लगाया गया है कि इनके लिए पानी कहां से आएगा, और जब इनके नीचे बने टैंक भर जाएंगे, तो उनकी सफाई कौन करेंगे? ये दो बुनियादी सवाल बेजवाब खड़े हुए हैं, और कुछ दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी मानना है कि इसके बाद तो पूरी जिंदगी के लिए भारत के गांव-गांव में सिर पर मैला ढोना जारी रहने की गारंटी हो गई है। शहरों में तो म्युनिसिपल की मशीनें आकर पखानों के टैंक साफ कर जाती हैं, लेकिन गांव-गांव में जहां पानी नहीं है, वहां ऐसी मशीनें कहां से आएंगी? फिर यह भी समझने की जरूरत है कि जिन जगहों पर मीलों दूर से सिर पर पानी लेकर आना घर की महिला की मजबूरी रहती है, उन जगहों पर ऐसे पखानों में खुले मैदान की शौच के मुकाबले कई गुना पानी लगेगा, और वह पानी भी पूरे परिवार के लिए महिला ही ढोकर लाएगी। पानी का ढांचा विकसित हुए बिना शौचालयों की ऐसी आक्रामक और हिंसक अनिवार्यता जनता के बुनियादी हक को कुचलना भी है। अगर स्थानीय अधिकारियों की ऐसी हैवानियत किसी भी अदालत में जाएगी, तो अधिकारी सजा पाएंगे। फिलहाल राजस्थान में सामाजिक कार्यकर्ता को सरकारी अमले ने जिस तरह पीट-पीटकर मार डाला है, उससे सबकी आंखें खुलनी चाहिए, और सरकारों को चाहिए कि अपने मैदानी अमले को कानून के भीतर रहकर काम करने की समझाईश दें। शौचालय अच्छी बात है, यह बात ठीक वैसी ही है कि तानाशाही के मुकाबले लोकतंत्र अच्छी बात है। लेकिन इराक में लोकतंत्र कायम करने के लिए अमरीकी बमबारी से जिस तरह लाखों लोगों की मौत हुई है, वह लोकतंत्र लाने का सही तरीका नहीं है। इसी तरह लोगों की शौच करते तस्वीरें खींचना, और विरोध करने वालों को मार डालना, शौचालय को बढ़ावा देने का तरीका नहीं है, और केन्द्र से लेकर राज्यों तक हर सरकार को अपने तौर तरीके तुरंत दुबारा जांचने चाहिए।

राष्ट्रपति के लिए जरूरी बहुमत से आगे बढऩा बुरा नहीं होगा...

संपादकीय
16 जून 2017


राष्ट्रपति चुनाव को लेकर देश में गहमागहमी बनी हुई है, और कुछ लोग इसे आम सहमति या सर्वसम्मति बनाने का एक मौका देख रहे हैं, तो कुछ लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा-एनडीए अगर अपने बहुमत से अपनी पसंद के किसी को राष्ट्रपति बना सकती है, तो उसे सर्वसम्मति की कोशिश क्यों करनी चाहिए? इस मौके पर एनडीए गठबंधन के भीतर भी शिवसेना शतरंज की बिसात पर ढाई घर चलने वाले घोड़े की तरह दिख रही है, दूसरी तरफ विपक्ष के पास अब तक कोई सर्वसम्मत नाम नहीं दिख रहा है जिसे कि एनडीए उम्मीदवार के सामने खड़ा किया जा सके। एनडीए के मुकाबले देश के सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी से दो बड़े ताकतवर केन्द्रीय मंत्री, राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू, जाकर मिले भी हैं, और उनसे यूपीए की किसी पसंद के बारे में पूछा। लोकतंत्र में आम सहमति का बड़ा महत्व होता है, और लोगों को विरोधियों के साथ की जरूरत न हो, तब भी उन्हें साथ रखने की कोशिश करनी चाहिए, और हो सकता है कि एनडीए या भाजपा के भीतर ऐसी सोच वाले भी कुछ लोग हों। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे लोग भी जरूर होंगे जो कि यह मानकर चल रहे होंगे कि सर्वसम्मति बनाने का बोझ हमेशा भाजपा के सिर पर क्यों आना चाहिए, और जब जनता ने एनडीए को विशाल बहुमत से जिताया है, राज्यों में भी उसे सत्ता दी है, तो फिर सर्वसम्मति की अधिक परवाह क्यों करनी चाहिए?
पिछले तीन बरस में मोदी सरकार के कामकाज में बहुत सी ऐसी बातें आई हैं जिनमें उसे अपनी पुरानी राजनीतिक घोषणाओं के खिलाफ जाकर पिछली यूपीए सरकार की बड़ी-बड़ी नीतियों को मानना पड़ा, उन पर अमल करना पड़ा, और उसके लिए एक बार फिर यूपीए का साथ लेना पड़ा। ऐसे दो सबसे बड़े मामले आधार कार्ड और जीएसटी के हैं। आधार कार्ड का भाजपा-एनडीए ने जमकर विरोध किया था, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी को जब आधार कार्ड योजना के संस्थापक नंदन निलेकेणि ने इस बारे में समझाया, तो एक बैठक के बाद ही प्रधानमंत्री इसके दीवाने हो गए, और उन्होंने इस योजना को यूपीए के मुकाबले कहीं आगे बढ़ाने की कोशिश की, और सरकारी काम के, सार्वजनिक जीवन के, और निजी जिंदगी के हर पहलू में इसे अनिवार्य बना दिया। यहां तक कि केन्द्र सरकार आधार कार्ड की अनिवार्यता के लिए सुप्रीम कोर्ट से टकराव ले रही है, जबकि यह सत्ता में आते ही इसे खारिज करने वाली थी। ऐसा ही दूसरा मामला जीएसटी का है। भारत के इतिहास का यह सबसे बड़ा टैक्स कानून यूपीए का बनाया हुआ है, और भाजपा ने इसका जमकर विरोध किया था, भाजपा के राज्यों से आए हुए मंत्री उस वक्त मनमोहन सरकार के साथ बैठकों में इसे देश को तबाह करने वाला कानून बताते थे। लेकिन अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने यूपीए के सांसदों को मनाकर, पार्टियों से अपील करके इस कानून को लागू करवाने में कमरतोड़ मेहनत की, और अब यह लागू होने जा रहा है।
इसलिए लोकतंत्र में आम सहमति या सर्वसम्मति का अपना एक महत्व होता है, सत्ता के बाहुबल का बहुमत साथ हो, तो भी लोगों को एक लोकतांत्रिक सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए। राष्ट्रपति का भारत में ऐसे तो रोजमर्रा के किसी काम में कोई दखल नहीं होता है, लेकिन बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें विपक्ष भी राष्ट्रपति तक अपनी मांगों या शिकायतों को लेकर पहुंचता है, और वैसे में अगर राष्ट्रपति सबके भरोसे के हैं, तो पक्ष-विपक्ष का टकराव घटने के आसार रहते हैं। एनडीए को आज चाहिए कि वह बहुमत के बाद भी अधिक से अधिक लोगों की सहमति जुटाने की कोशिश करे, और संसद के भीतर, या विधानसभाओं में उसे अपनी पसंद के राष्ट्रपति के लिए चाहे और वोटों की जरूरत न हो, उसकी पसंद को अगर जरूरत से ज्यादा वोट मिलते हैं, तो यह एनडीए की लोकतांत्रिक-कामयाबी होगी। देश में ऐसी चर्चा है कि एक दलित या आदिवासी महिला को भाजपा राष्ट्रपति पद के लिए पसंद कर सकती है, अगर ऐसा होता है, या कि किसी दूसरे भले नाम को आगे बढ़ाया जाता है, तो विपक्ष को भी बहुमत की पसंद का साथ देना चाहिए।

कामयाबी के ताजमहल बनाने के मुकाबले, और आम काम

संपादकीय
15 जून 2017


भारत के दो दर्जन से अधिक राज्यों में अब तो आधे राज्यों पर भाजपा की सरकार हो गई है, लेकिन एक वक्त था जब शायद दर्जनभर अलग-अलग पार्टियों की सरकारें राज्यों में रहती थीं, और उनके बीच एक राजनीतिक मुकाबला भी चलता था, और इन राज्यों के बड़े अफसरों के बीच भी अपने कामकाज को बेहतर दिखाने के लिए दिल्ली में भारत सरकार की बैठकों में एक मुकाबला होता था। अलग-अलग राज्यों की स्थितियां और अर्थव्यवस्था अलग-अलग रहती हैं, और उनकी चुनौतियां भी अलग-अलग रहती हैं, लेकिन फिर भी राज्यों की तुलना तो होती ही है। भारत सरकार के आंकड़ों में राज्यों की स्थितियों की तुलना तो एक बात रहती है, जनता के बीच यह भी गिना जाता है कि किस राज्य में किस पार्टी या नेता ने कितने बार सत्ता हासिल की है। ऐसे में अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के कामकाज को भी आंका जाता है, और छत्तीसगढ़ जैसे नए बने हुए राज्य की तुलना उसी के साथ राज्य बने हुए उत्तराखंड और झारखंड से कई पैमानों पर होती है। अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के कामकाज की अलग-अलग शैली भी होती है, और शायद ऐसी विविधता ही भारत के लोकतांत्रिक-संघीय ढांचे को बेहतर बनाने में काम भी आती है। राज्यों और नेताओं को एक-दूसरे से सीखने के लिए बहुत कुछ रहता है, और पार्टी के भीतर भी अलग-अलग नेता अपनी कायम की हुई मिसालों को लेकर एक-दूसरे को अघोषित चुनौती देते हुए भी खड़े रहते हैं।
सत्ता पर बैठे कुछ नेता और अफसर उदारता से दूसरे लोगों की कामयाबी को देखकर उसे मंजूर भी कर लेते हैं, और उनसे सीखने की कोशिश भी करते हैं। कई बार सीखकर किए हुए काम और बेहतर भी हो जाते हैं। राज्य के भीतर भी कई जिलों के अफसर अपनी मेहनत से बाकी जिलों के सामने एक चुनौती खड़ी करते हैं, और छत्तीसगढ़ में हम अफसरों के बीच ऐसा मुकाबला देखते भी आए हैं। ऐसे ही मंत्रियों के बीच भी अपने चुनाव क्षेत्र में काम करवाने को लेकर मुकाबला चलता है, और काबिल और कामयाब मंत्री अपने विभाग के कामकाज को दूसरे विभागों से बेहतर बनाने के लिए मेहनत करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नेता या अफसर के लिए सबसे बड़ी कामयाबी क्या हो सकती है?
कामयाबी के साथ एक दिक्कत यह है कि जब तक उसकी शिनाख्त न हो सके, जब तक वह अलग हटकर न दिखे, तब तक वह दिखती ही नहीं है। नतीजा यह होता है कि नेता और अफसर अलग हटकर किए जाने वाले कामों को लेकर इतनी मेहनत करते हैं कि जो न दिखने वाले आम काम रहते हैं, वे अनदेखे रह जाते हैं। चुनाव के वक्त लोगों को गिनाने के लिए कुछ बड़े काम जरूरी रहते हैं, बहुत से छोटे-छोटे कामों की कामयाबी न तो गिनाई जा सकती, और न ही वह लोगों को प्रभावित करती है। अफसरों के मामलों में भी यह है कि उन्हें चुनाव तो नहीं लडऩा पड़ता, लेकिन आज प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी प्रधानमंत्री के स्तर पर मिलने वाले पुरस्कार और सम्मान को पाने के लिए एक होड़ रहती है, और उनके जिलों या उनके शहरों की बाकी छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने पर किसी तरह का कोई सम्मान नहीं रहता है। ऐसे मुकाबले के चलते हुए माहौल कुछ इस तरह का रहता है कि स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में किसी की दिलचस्पी पास होने से अधिक की नहीं रहती, और आगे बड़े कॉलेज में दाखिले के मुकाबले में कामयाबी सबके लिए मायने रखती है। स्कूलों की पढ़ाई धरी रह जाती है, और प्रवेश परीक्षाओं के कामयाब लोग वाहवाही पाते हैं।
लेकिन यह लोकतंत्र के लिए एक घातक स्थिति भी है कि लोकप्रियता के पैमानों पर ऊपर पहुंचने के लिए, और कामयाबी के कुछ चुनिंदा मुकाबलों में जीतने के लिए लोगों की ताकत अनुपातहीन तरीके से लग जाती है, और जनता की जिंदगी में मायने रखने वाले छोटे-छोटे काम धरे रह जाते हैं। होना तो यह चाहिए था कि जनता चुनाव के वक्त ऐसे छोटे-छोटे कामों को भी याद रखती, लेकिन इंसानी मिजाज ऐसा रहता है कि वह बड़े-बड़े गिनाने लायक कामों को तो याद रखता है, बाकी चीजों को याद नहीं रखता। मतदाता की परिपक्वता जब तक नहीं बढ़ेगी, तब तक यह नौबत बनी रहेगी कि नेता और अफसर अपनी कामयाबी के ताजमहल बनाने में लगे रहेंगे, और नालियां भरी रहेंगी, घूरे पहाड़ बनते रहेंगे। लोकतंत्र में जनता की जागरूकता और उसकी समझ में कमी के चलने तक यह नौबत सुधरने की नहीं है।

केंद्र सरकार की अवैज्ञानिक सोच की मिसालें खतरनाक

संपादकीय
14 जून 2017


केंद्र सरकार के एक मंत्रालय की बुकलेट में गर्भवर्ती महिलाओं को सेक्स और मांसाहार से दूर रहने की सलाह दी गई है ताकि उनके बच्चे अच्छे हो सकें, उनकी सेहत ठीक रह सके। आयुष मंत्रालय ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वस्थ्य जच्चा और सेहतमंद बच्चे के लिए सलाह दी है कि गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान इच्छा, क्रोध, लगाव, नफरत और वासना से खुद को अलग रखना चाहिए। साथ ही बुरी सोहबत से भी दूर रहना चाहिए। हमेशा अच्छे लोगों के साथ और शांतिप्रिय माहौल में रहें। आयुष मंत्रालय ने मदर एंड चाइल्ड केयर नामक बुकलेट जारी की है जिसमें, ये सलाह दी गई हैं।
आयुष मंत्रालय की सलाह यहां तक सीमित नहीं रही। मंत्रालय आगे कहता है कि यदि आप सुंदर और सेहतमंद बच्चा चाहती हैं तो महिलाओं को इच्छा और नफरत से दूर रहना चाहिए, आध्यात्मिक विचारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपने आसपास धार्मिक तथा सुंदर चित्रों को सजाना चाहिए। केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने पिछले सप्ताह इस बुकलेट को नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय स्वास्थ्य संपादकों के एक सम्मेलन में जारी किया था।
यह केंद्र सरकार में बैठे हुए लोगों की अवैज्ञानिक सोच की ताजा मिसाल है जिसमें लोगों के खानपान को प्रभावित करने की कोशिश भी है, धर्म को लादने की भी कोशिश है, और यह निहायत झूठी बात फैलाई जा रही है कि गर्भवती महिला को सेक्स से दूर रहना चाहिए। इस रिपोर्ट के आते ही भारत के बड़े-बड़े डॉक्टरों ने खुलकर इस झूठ का खंडन किया है और इसे पूरी तरह अवैज्ञानिक बताया है। यह बात किसी आम समझ के इंसान के भी गले नहीं उतर सकती कि सरकार के खर्च पर अवैज्ञानिक बातों को इतनी बेशर्मी के साथ कोई कैसे फैला सकते हैं?
आज देश में वैज्ञानिक सोच न होने से जगह-जगह महिलाओं की हत्या हो रही है क्योंकि आसपास के लोगों को उनके टोनही होने का शक रहता है। रायपुर में ही आज एक नौजवान ने इसी शक में अपनी मां की हत्या कर दी, इसी प्रदेश के एक दूसरे शहर में एक महिला के बदन में मिर्च डाल दी गई, और झारखंड की रिपोर्ट है कि वहां कितनी ही महिलाएं डायन कहकर मार डाली जा रही हैं। जब देश में अंधविश्वास इतना फैला हुआ हो, तो सरकार को न सिर्फ वैज्ञानिकता को बढ़ावा देना चाहिए, बल्कि समाज में चली आ रही बुरी बातों को खत्म करने के लिए एक आधुनिक सोच को भी बढ़ाना चाहिए। ऐसे में धर्म को बढ़ावा देना, मांसाहार के खिलाफ मुहिम चलाना, इन सबके लिए सरकार का इस्तेमाल करना, देश में अंधविश्वास के खतरे को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं है।
एक तरफ तो भारत चिकित्सा विज्ञान में इतना आगे बढ़ गया है कि दुनिया के विकसित देश के लोग भी सर्जरी कराने हिंदुस्तान आ जाते हैं क्योंकि यहां पर उत्कृष्टता विश्वस्तर की है, और खर्च बहुत कम है। दूसरी तरफ इस तरह का पाखंड, इस तरह का अंधविश्वास बढ़ाते चलना सरकार की दिमागी कमजोरी भी बताता है। इस बुकलेट के हिसाब से तो किसी नास्तिक महिला का बच्चा सेहतमंद हो ही नहीं सकता क्योंकि वह महिला आसपास धार्मिक वातावरण क्यों रखेगी? सरकार को तो यह सोचना चाहिए कि आज देश में जितने तरह की हिंसा हो रही है और जो टीवी के परदों के रास्ते गर्भवर्ती महिलाओं को भी देखनी पड़ रही है, उसे कम कैसे किया जाए?

पुलिस और हिंसक भीड़, दोनों पर नजर रखने वर्दी-कैमरे हों

संपादकीय
13 जून 2017


मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन में शामिल कांग्रेस की एक महिला विधायक का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे भीड़ से थाने में आग लगाने को कहते दिख रही हैं। इसे लेकर उनके खिलाफ पुलिस ने जुर्म कायम किया है। ऐसा देश भर में जगह-जगह बहुत से नेताओं के मामले में होता है कि वीडियो रिकॉर्डिंग रहने पर वे फंस जाते हैं, और अदालत तक सुबूतों में घिरे-घिरे पहुंच जाते हैं। लेकिन अधिकतर मामलों में सार्वजनिक जगहों पर जुर्म करने वाले, हिंसा भड़काने वाले लोग अगर कैमरों में कैद नहीं है, तो बच निकलते हैं।
इसका एक आसान तरीका भारत की पुलिस को इस्तेमाल करना चाहिए जो कि बहुत से विकसित देशों में अनिवार्य रूप से हो रहा है। हालांकि पुलिस या सत्ता इसे पसंद नहीं करेंगे, लेकिन मानवाधिकार आयोग या सर्वोच्च न्यायालय इसका हुक्म दे सकते हैं। पश्चिमी देशों की पुलिस की वर्दी पर सामने एक बॉडी-कैमरा लगा होता है जो उनकी लोगों से बातचीत को भी रिकॉर्ड करता है, और सामने के नजारे को भी। ऐसे में जब पुलिस पर ज्यादती के आरोप लगते हैं, तब भी इन कैमरों की रिकॉर्डिंग काम आती है, या कि जब किसी मुजरिम या किसी गवाह से पुलिस बातचीत करती है, तो उस बातचीत की रिकॉर्डिंग भी अदालत में सुबूत की तरह काम आती है। आज टेक्नालॉजी इतनी सस्ती हो गई है कि ऐसे कैमरे कुछ हजार रूपए में मिल जाते हैं, और इनके इस्तेमाल से पुलिस का अपना चाल-चलन, उनका व्यवहार, इन सबमें भी सुधार आना तय है।
भारत में भी दफ्तरों से बाहर सड़कों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर लोगों के बीच काम करने वाली पुलिस को ऐसे कैमरों से लैस किया जाना चाहिए। और आज तो संचार सुविधा भी इतनी सस्ती हो गई है कि इन कैमरों की रिकॉर्डिंग सीधे ही पुलिस कंट्रोल रूम में दर्ज की जा सकती है, और बाद में भीड़ और पुलिस पर लगने वाले अलग-अलग आरोपों का निपटारा आसान हो सकता है। सत्ता शायद ऐसा पसंद न करे क्योंकि उसकी मर्जी के मुताबिक काम करते हुए भी पुलिस कई बार हिंसा या ज्यादती करती है, और कई बार पुलिस अपनी मर्जी से भी हिंसा पर उतारू हो जाती है, लेकिन ऐसे कैमरे पुलिस की हिंसा को भी काबू करेंगे, और भीड़ की हिंसा के सुबूत भी दर्ज करते चलेंगे।
मानवाधिकार की रक्षा करने के लिए भी ऐसी टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जरूरी है, और इससे बयान और सुबूत के लंबे-चौड़े काम में भी पुलिस को मदद मिलेगी, और यह निपटारा जल्द हो सकेगा। मध्यप्रदेश में जिन लोगों के ऊपर हिंसा भड़काने के लिए मुकदमे दर्ज हुए हैं, उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनके लिए उनके वीआईपी दर्जे के मुताबिक अधिक कड़ी सजा का इंतजाम किया जाना चाहिए, आम इंसान को ऐसी सार्वजनिक हिंसा पर अगर चार बरस की कैद मिलना है, तो विधायक को छह बरस और सांसद को आठ बरस की सजा मिलनी चाहिए। ऐसी सजा दिलाने में भी पुलिस के वर्दी-कैमरे कारगर साबित होंगे। और यह बात तो है ही कि ऐसी किसी भी नई टेक्नालॉजी के उपकरणों की खरीदी में सरकार में बैठे बहुत से लोगों का बड़ा उत्साह रहता है, कम से कम उसके चलते ही ऐसे कैमरे आ जाएं।

आंख के मुकाबले आंख नहीं दोस्ती के मुकाबले दोस्ती हो

संपादकीय
12 जून 2017


भारत में बंद पाकिस्तान के कैदियों में से करीब एक दर्जन को आज रिहा करके उनके देश भेजा जा रहा है। भारत की यह कार्रवाई ऐसे वक्त हो रही है जब सरहद पर दो तरह के तनाव चल रहे हैं, एक तो पाकिस्तानी फौज वहां भारत की तरफ बीच-बीच में युद्धविराम को तोड़कर गोली या गोला चलाने की दोषी करार दी जा रही है, दूसरी तरफ कश्मीर में लगातार पाकिस्तान के तरफ से आतंकियों के आने की तोहमत भी लग रही है। ऐसे में भारत में जनता का एक दबाव यह है कि पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, और विपक्षी दलों से लेकर मीडिया और आम जनता तक से यह मांग उठ रही है कि अपने चुनावी वायदे के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी सैनिक कार्रवाई करें।
नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी विपक्ष में रहते हुए लगातार पाकिस्तान के खिलाफ बहुत ही आक्रामक रहे, लेकिन केन्द्र की सत्ता में आने के बाद से उनका रूख एक सरकार का रहा, देश का रहा। भारत में सब्र से काम लिया, और पाकिस्तान के उकसावे या भड़कावे, हमले या घुसपैठ के खिलाफ भी कोई अनुपातहीन फौजी जवाब नहीं दिया। देशों के बीच संबंधों को दोनों तरफ से बिगाडऩे की कोशिश करें, तो वे लगातार बिगड़ते जाते हैं, और अगर सुधारने की कोशिश करें तो उनके धीरे-धीरे सुधरने की संभावना भी बनती है। ऐसे में दोनों देशों में लोगों को इसलिए सब्र से काम लेना चाहिए क्योंकि इनको हथियार बेचने वाली ताकतें कुछ और हैं, और वे चाहती हैं कि इनके बीच जंग चलती रहे, या कि जंग के माहौल से उसकी तैयारी का खर्च जारी रहे। हकीकत यह है कि भारत-पाकिस्तान की सरहद के दोनों तरफ इतने गरीब लोग हैं, और वे इतनी बड़ी गिनती में हैं, इतना कुपोषण है, और इलाज की इतनी कमी है, कि दोनों देश लगातार संबंध सुधारें तो न सिर्फ सैनिकों की जान बचेगी, बल्कि दोनों तरफ के कुपोषणग्रस्त और बीमार बच्चों की जान भी बचेगी। यह एक बहुत ही नासमझी का युद्धोन्माद रहता है जो फौज के मौजूदा या रिटायर हो चुके अफसरों का बढ़ाया हुआ रहता है, हथियारों के सौदागरों का बढ़ाया हुआ रहता है, या फिर हथियार-उद्योग के दलाल मीडिया का बढ़ाया हुआ रहता है। भारत में यह शिनाख्त करना अधिक मुश्किल नहीं है कि कौन से लोग, कौन से टीवी चैनल लगातार जंग की बातें करते हैं, लगातार भड़काने में लगे रहते हैं, और इसके पीछे उनको कहां से दलाली मिलती होगी, यह समझना बहुत मुश्किल भी नहीं है। ऐसे में अगर भाजपा सरकार अपनी पार्टी के पिछले एजेंडा को छोड़कर आज एक नए एजेंडा पर काम कर रही है, और कैदी रिहा कर रही है, हमलों पर सब्र दिखा रही है, तो यह एक बहुत ही अच्छी बात है। हमारा यह भी मानना है कि भारत में एनडीए के विरोधी दलों को भी केन्द्र सरकार की इस पहल पर उसकी तारीफ करनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं दलों में अमन-पसंद लोग अधिक हैं, जंग के खिलाफ लोग अधिक हैं।
भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ लोगों को समझदार-मीडिया के साथ मिलकर एक ऐसा अभियान चलाना चाहिए जिससे सरकारों पर दबाव पड़े, और दोनों तरफ के आम लोगों को जेलों से आजादी मिले, मैदानों पर टीमें उतरें, टीवी और सिनेमा में कलाकार काम करें, और लेखक एक-दूसरे देश जाकर आपस में बातचीत कर सकें। गांधी ने कहा था कि एक आंख के मुकाबले दूसरी आंख निकालने से एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी हो जाएगी।  इसी बात को दूसरी तरह से देखें तो यह भी साफ है कि एक दोस्ताना पहल के मुकाबले दूसरी दोस्ताना पहल से दुश्मनी भी खत्म हो सकती है। 

गांधी चतुर भी थे, और बनिया भी, कहा किसने यह मायने रखता है...

संपादकीय
11 जून 2017


कल का दिन बड़ा अजीब था। मध्यप्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गांधी के उपवास-आंदोलन की तर्ज पर भोपाल में किसान आंदोलन को लेकर उपवा पर बैठे थे, और छत्तीसगढ़ के दौरे पर आए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गांधी को एक चतुर बनिया कहकर देश के बहुत से तबकों की नाराजगी में फंस गए थे। उनकी बात शायद नाजायज थी क्योंकि गांधी के परिवार के, उनके वंशज जो आमतौर पर गांधी के तरह-तरह के अपमान को झेलने के आदी रहे हैं, और कभी आक्रामक जवाब नहीं देते हैं, वे भी चुप नहीं रह पाए, और उन्होंने कड़ा और कड़वा जवाब दिया, जो कि जायज था। बाकी राजनीतिक दलों का तो यह हक बनता ही था कि भाजपा के मुखिया की ऐसी बात पर हमला करें, और उन्होंने ऐसा किया भी।
जो लोग अमित शाह को करीब से देख चुके हैं, वे जानते हैं कि वे अनायास कुछ नहीं कहते, या कि चूक से उनके मुंह से कुछ नहीं निकलता। उन्होंने गांधी के बारे में जब सार्वजनिक मंच से, माईक और कैमरे के सामने ये विशेषण इस्तेमाल किए तो उन्हें यह मालूम था कि इसे लेकर बवाल खड़ा होगा, और वैसा ही हुआ भी। तो कुछ लोगों का यह भी सोचना है कि देश के असल मुद्दों की तरफ से मीडिया और बाकी जनता का ध्यान हटाने के लिए भाजपा और संघ परिवार के लोग ऐसे बहुत से मामले छेड़ते हैं जिनको लेकर गैरभाजपाई पार्टियां और सामाजिक आंदोलनकारी टूट पड़ते हैं, और कुछ दिनों तक उन्हीं पर चर्चा होती है। तो क्या यह ऐसा ही एक मामला था? अगर ऐसी कोई नीयत इसके पीछे नहीं भी थी, तो भी इतना तो था ही कि गांधी को लेकर भाजपा के ये शब्द अपमानजनक तो माने ही जाने वाले थे, फिर चाहे किसी और इतिहासकार या राजनीतिक विश्लेषक की जुबान या कलम से ये शब्द आपत्तिजनक नहीं माने जाते।
अब अगर देखें तो किसी को चतुर कहने में कोई खास अपमान की बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कोई होशियार किन-किन मामलों में चतुर भी रहते हैं, यह बात किसी विभाजन रेखा से बांटी नहीं जा सकती। और बनिया तो एक हकीकत है, ठीक उसी तरह जिस तरह की कोई क्षत्रिय है, कोई दलित है, और कोई ब्राम्हण या बनिया है। गांधी एक बनिया परिवार में पैदा हुए थे, और अंग्रेजों के साथ उनके मोलभाव की समझौता-वार्ता देखें, कांग्रेस की राजनीति के भीतर लीडरशिप के झगड़ों को निपटाने के लिए उनका मोलभाव देखें, तो लगता है कि उनके बीच भाव-ताव करने की एक बनिया बुद्धि थी, और वह कोई नकारात्मक बात नहीं थी, वह बात जिंदगी के मुद्दों को निपटाने में गांधी की मददगार रहती थी। फिर यह देखें कि चतुर रहना किसी दुष्टता या शातिर होने से अलग है, चतुर होने का मतलब होशियार होना होता है, और अगर इतिहासकार रामगुहा जैसे कोई लोग गांधी के लिए ऐसे विशेषण इस्तेमाल करते, तो उन्हें एक सटीक व्याख्याकार माना जाता।
दिक्कत यह है कि भाजपा या उससे जुड़े संगठनों के लोगों का गांधी के लिए, खासकर गांधी की सोच के लिए, गांधी के जीवन-दर्शन के लिए जो सोचना है, वह कभी भी संदेह से परे नहीं रहा। मंच पर गांधी की तस्वीर जरूर सजी रही, लेकिन भाजपा और उसके साथियों की कथनी और करनी इन दोनों का गांधी से बड़ा फासला रहा। ऐसे में अमित शाह की कही बात उनकी साख के साथ, उनकी पार्टी की साख के साथ जोड़कर ही देखी जानी थी, और वैसा ही हुआ। अमरीका में एक अश्वेत दूसरे अश्वेत से जिन शब्दों में बात करते हैं, वैसे संबोधन अगर कोई गोरा किसी अश्वेत के लिए इस्तेमाल करे तो उसे नस्लभेद या रंगभेद का कुसूरवार करार दिया जाएगा। किसी भी जाति, धर्म, रंग, या क्षेत्रीयता के लोग आपस में जिस जुबान में बात कर सकते हैं, उस जुबान में वे विरोधियों से बात नहीं कर सकते थे। इसलिए अमित शाह की कही हुई बात एक गांधीविरोधी विचारधारा से निकली हुई बात के रूप में ही ली जानी थी, और इसीलिए उनकी बात पर इतना बवाल हो रहा है। जहां तक हमारी निजी सोच है, तो हमको लगता है कि गांधी ऐसे विशेषणों से बहुत परे के हैं, और वे अगर आज होते, तो इस बात का बुरा नहीं मानते। लेकिन आज के बयान गांधी नहीं दे रहे हैं, उनके समर्थक दे रहे हैं, प्रशंसक दे रहे हैं, और उनका हक है अमित शाह की बात को बुरा मानने का।

किसानों की दिक्कत को महज सब्सिडी से निपटाना असंभव

संपादकीय
10 जून 2017


किसानों की दिक्कतें कम नहीं हैं, और जब वे अपने आपको मारने पर उतारू हैं, तो यह जाहिर है कि किसी विरोध-प्रदर्शन में वे दूसरे को मारने पर चाहे न सही, तोडफ़ोड़ और आगजनी पर तो उतारू हो ही सकते हैं। और फिर जब देश में कहीं जाट आंदोलन में तो कहीं और किसी जाति के आंदोलन में हफ्तों तक पटरियों पर ट्रेन बंद हो जाती है, सड़कों पर गाडिय़ां जलाने के साथ-साथ मुसाफिरों से बलात्कार होने लगते हैं, तो इसी देश के भीतर दूसरे हिस्सों तक ये खबरें पहुंचती हैं, और वहां भी आंदोलन हिंसक होने लगते हैं। लोगों को ऐसा भी लगता है कि जब तक आंदोलन हिंसक नहीं होंगे, तब तक उनकी सुनवाई नहीं होगी। इसलिए जब राज्यों में चुनाव करीब रहते हैं, तो हर कर्मचारी संगठन के आंदोलन होने लगते हैं कि उनकी पुरानी मांगों पर आंदोलन से सुनवाई हो सकती है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में किसानों के आंदोलन को कम आंकना इसलिए ठीक नहीं है कि बाकी प्रदेशों में भी आगे-पीछे इसी तरह की मांग उठने लगेगी। भारतीय लोकतंत्र में प्रदर्शन के दौरान हिंसा को दोनों तरफ से एक किस्म से अनिवार्य या अपरिहार्य मान लिया गया है, और देश भर में जगह-जगह सड़कों पर हिंसा और तोडफ़ोड़ दर्ज होती है।
किसानों की मांगों को देश के बाकी हालात से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब ग्राहक हर बार अपनी पिछली गाड़ी से बड़ी गाड़ी, अपने पिछले टीवी से बड़ा टीवी, और अपने पिछले मोबाइल फोन से अधिक बड़ा या अधिक महंगा फोन लेने में तकलीफ महसूस नहीं करते, तब आलू-प्याज, या अनाज के दाम देते हुए लोगों की जान निकलने लगती है। जबकि हकीकत यह है कि खेती अब बहुत महंगा कारोबार हो चुकी है। खेतिहर मजदूर बहुत महंगे हो गए हैं क्योंकि गांवों में सरकारी मजदूरी का रेट बहुत ऊपर चले गया है, और उतनी मजदूरी देकर किसान को कुछ कमाई बचना शायद नामुमकिन रहता है। इसके अलावा किसानों के परिवार के सारे लोग पहले खेती में उतरते थे, और वे खुद मजदूर की तरह भी काम कर लेते थे, लेकिन आज तो किसान की अगली पीढ़ी किसान बनना ही नहीं चाहती। और नौबत अगर सचमुच इतनी खराब न होती, तो इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या क्यों करते?
अब अगर हम इस समस्या के समाधान की बात अगर करें, तो केन्द्र सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर किसानों की मदद के लिए कुछ फैसले लेती आई हैं। सस्ता खाद, सस्ती बिजली, सस्ते बीज, और उपज का अधिक समर्थन मूल्य, इन सबसे किसान कुछ हद तक जिंदा बच पाए हैं। कहीं-कहीं कर्जमाफी या ब्याजमाफी भी देखने में आती है, और उससे भी कुछ आत्महत्याएं रूकती हैं। लेकिन एक बड़ी बात यह है कि लगातार सरकारी अनुदान या मदद से चलने वाला कारोबार अपने खुद के पैरों पर खड़ा रहना भूल जाता है। इसलिए जरूरी यह है कि किसान की जिंदगी में मुमकिन कई दूसरी बातों को बढ़ावा दिया जाए ताकि कुल मिलाकर किसान का जिंदा रहना हो सके। जिसमें डेयरी या दूसरे किस्म के पशुपालन के काम हो सकते हैं, सब्जी या फल-फूल की खेती हो सकती है, मधुमक्खी पालन हो सकता है, और गांवों में हो सकने वाले कई तरह के कुटीर उद्योग हो सकते हैं जिनसे कि किसान को मजदूरी की तलाश में दूसरे राज्यों में न जाना पड़े, और खुदकुशी न करनी पड़े। लेकिन इनमें से कोई पहल होने के बजाय पिछले दिनों हुआ यह है कि गाय, गोवंश, और बाकी कुछ जानवरों को कटने से बचाने के नाम पर ऐसे कानून बनाकर लागू कर दिए गए हैं जिनसे बूढ़े या कमजोर जानवर खुद भूख से मर जाएंगे, और उनके मालिक किसान जहर से। जानवरों की खरीद-बिक्री, और उनके कटने का सिलसिला खेती के समय से ही चले आ रहा है, और उसे रातोंरात इस तरह से बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट किया जा रहा है, और इसके भयानक नतीजे सामने आएंगे। जानवरों का इंसान की जिंदगी में एक उपयोग होता है, और वह उपयोग निपट जाने के बाद उन पर इंसान तभी कुछ खर्च कर पाते हैं, जब वे खुद का पेट भर पाते हैं, और कुछ बचा पाते हैं। अगर किसान से जानवरों की खरीद-बिक्री का हक इस तरह से छीन लिया जाएगा, तो खेती की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट लगेगी।
किसानों के बहुत से मुद्दे हैं, और उनको महज किसानी-सब्सिडी से नहीं निपटाया जा सकता। गांवों की अर्थव्यवस्था को ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग की मदद से बढ़ाना होगा, उसके बिना कोई सीधा इलाज नहीं है।

ज्ञान तो बढ़ता जा रहा है, पर हिन्दुस्तानी समझ घट रही है

संपादकीय
9 जून 2017


कन्नौज की एक खबर है कि खजाना दिलाने का झांसा देकर एक मां-बाप के सामने में उनकी नाबालिग लड़की के साथ एक तांत्रिक ने पहले बलात्कार किया, और फिर उसे बलि चढ़ा दी। उनके घर पर खजाना गड़ा होने की बात कहकर उसने परिवार के लालच का फायदा उठाया, और यह सारा काम परिवार के सामने ही किया। ऐसा कोई न कोई मामला रोज कहीं न कहीं से सामने आता है, और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे एक मामले के सामने आने के पीछे सैकड़ों छुपे हुए मामले रह जाते होंगे, क्योंकि लोग धोखे का शिकार होने के बाद सामाजिक अपमान के डर से कई बातों को छुपा भी जाते हैं। अंधविश्वास का यह हाल है कि छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में महिलाओं को टोनही कहकर लगातार प्रताडि़त किया जाता है, और झारखंड में हर बरस बहुत सी हत्याएं ऐसे आरोपों के साथ होती हैं। जबकि हकीकत यह पाई गई है कि किसी महिला को टोनही कहकर मारने वाले लोग आमतौर पर वे रहते हैं जो कि उस महिला का देह शोषण करना चाहते हैं, और उनकी हसरत पूरी नहीं होती, या कि उस महिला के नाम पर बची जमीन-जायदाद को हड़पना चाहते हैं।
भारत में अंधविश्वास लोगों के साक्षर और शिक्षित होने के बावजूद कम होते नहीं दिखता है। यहां टीवी पर ऐसे चैनलों को रात-दिन ऐसे जालसाजों को दिखाने का लाइसेंस सरकार की तरफ से मिलता है, जो कि आगे चलकर बलात्कारी या ठग निकलते हैं, और उसके बावजूद उनके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। अंधविश्वास और पाखंड को बढ़ावा देने के लिए आस्था का बड़ा सहारा ठगों को मिलता है। इस देश में लोगों की आस्था किसी भी तरह के धार्मिक या आध्यात्मिक दिखने वाले लोगों पर आनन-फानन पैदा हो जाती हैं। कुछ खास किस्म के कपड़े, जटा या भभूत, चिमटा या माला, इन सबको लेकर लोग ठगी का एक कारोबार शुरू कर सकते हैं, और अखबारों में ईश्तहार देकर, होटलों में कमरे लेकर लोगों को लूट सकते हैं, और महिलाओं के साथ बलात्कार कर सकते हैं। यह सिलसिला घटते नहीं दिख रहा है, बढ़ते हुए ही दिख रहा है।
दरअसल इस देश में वैज्ञानिक सोच घटती जा रही है। पढ़ाई बढ़ रही है, लोगों का ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन उनकी समझ घटती चल रही है। एक तरफ तो यह देश दुनिया भर के विकसित देशों के भी उपग्रह लेकर अपने रॉकेट आए दिन अंतरिक्ष में भेजता है, और भारत का अंतरिक्ष-संस्थान देश के लिए कमाई का जरिया भी बन गया है। वहां के हर अंतरिक्ष अभियान में महिला वैज्ञानिकों की बहुत बड़ी हिस्सेदारी सामने आती है, लेकिन दूसरी तरफ देश के कुछ हिस्सों में महिलाओं को टोनही कहकर मारा जा रहा है, देश भर के मंदिरों में महिलाओं को महीने के कुछ दिनों में दाखिला नहीं दिया जाता है, और धर्म या आध्यात्मक के नाम पर महिलाओं का देह शोषण लगातार होता है। आस्थावान लोग बहुत समय तक पाखंडियों को बर्दाश्त करते हैं, बल्कि अपने परिवार की महिलाओं के शोषण को वे ईश्वर या गुरू की सेवा भी मान बैठते हैं। बहुत से मामलों में परिवार के लोग अपनी नाबालिग बच्चियों को भी बलात्कारी बाबाओं तक खुद ही पहुंचाते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है, और देश को इससे उबरने के लिए अपनी सोच को तर्कसंगत और न्यायसंगत बनाना होगा। यह काम आसान नहीं होगा क्योंकि हाल के बरसों में अवैज्ञानिक बातों को इतना बढ़ावा दिया गया है कि लोग अब पाखंड को वैज्ञानिक सच मानने लगे हैं। कानून अकेले ऐसी नौबत से नहीं निपट सकता, खासकर तब जब राजनीतिक और सामाजिक ताकतें ऐसे पाखंड को बढ़ावा देकर अपने वोट बढ़ाने, या अपने बाहुबल को बढ़ाने मेें लगी हुई हैं। समाज के ही जिम्मेदार और जागरूक तबके को खुलकर आगे आना होगा, और यह नौबत सुधारनी होगी।

बुलबुले सी बड़ी हो रही डिजिटल व्यवस्था, बचाव के इंतजाम नहीं

संपादकीय
8 जून 2017


खाड़ी के देशों में अभी एकाएक एक बहुत छोटे और बहुत संपन्न देश कतर के खिलाफ चार देशों ने आतंक का आरोप लगाते हुए उससे रिश्ता तोड़ दिया। और इस बात को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की सऊदी अरब की यात्रा और वहां पर मुस्लिम देशों के शासकों से की गई बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी तरफ अमरीका के कुछ जानकार लोगों का, और वहां की खुफिया एजेंसी का यह मानना है कि ट्रंप ने कतर को आतंक-समर्थक और सहयोगी मानने की जो धारणा बनाई, वह एक ऐसी झूठी खबर पर आधारित थी जो कि रूसी हैकरों ने कतर की एक समाचार-एजेंसी की वेबसाईट पर पोस्ट की थी। इस खबर में कतर के शासकों के कुछ ऐसे बयान का हवाला दिया गया था, जिनका उन लोगों ने तुरंत ही खंडन कर दिया था। लेकिन तब तक नुकसान तो हो ही चुका था, और जिन लोगों को झूठे सुबूत गढ़कर दूसरे देशों पर हमले करने की आदत है, उनको तो मानो यह एक सुबूत मिल गया था। अब लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि इराक में सामूहिक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने की खुफिया जानकारी का दावा करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जिस तरह संयुक्त राष्ट्र तक की हेठी करते हुए हमला किया था, और लाखों लोगों को मार डाला था, वह पूरा का पूरा मामला झूठ पर टिका हुआ था, और इराक में रासायनिक हथियार तो दूर कोई रसायन तक नहीं मिले थे। बाद में अमरीकी हमले में साथ देने वाले दूसरे देशों ने भी यह महसूस किया था कि उन्हें झांसा देकर उनको साथ लिया गया था, और एक बेगुनाह देश पर हमला किया गया था।
अभी दुनिया भर में यह माना जा रहा है कि जिस तरह रूसी हैकरों ने पिछले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में एक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के ईमेल में घुसपैठ करके वहां की जानकारी उनके प्रतिद्वंद्वी डोनल्ड ट्रंप को दी थी, और फिर ऐसा ही खतरा फ्रांस और जर्मनी के चुनाव में भी सामने आया, तो इससे यह बात जाहिर होती है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में भी जनमत को तोडऩे-मरोडऩे के लिए हैकर एक हमलावर की तरह काम करते हैं, और एक देश दूसरे देश में चुनाव को तय करने, उसे किसी तरफ मोडऩे का काम भी कर सकता है। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि दुनिया अभी बड़े छोटे-छोटे साइबर हमलों के सामने बिल्कुल बेबस साबित हो रही है। अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं जब एक साइबर हमले में डेढ़ सौ देशों के करोड़ों कम्प्यूटरों को तबाह कर दिया गया था, और ब्रिटेन जैसे मजबूत देश में सरकारी इलाज थम गया था। इसके बाद कुछ दिनों के भीतर ही ब्रिटिश एयरवेज के कम्प्यूटरों में अंदरुनी खामी आई, और कई दिनों तक इस एयरलाइंस का काम ठप्प हो गया, और दसियों लाख लोगों की आवाजाही थम गई।
भारत आज पूरी तरह डिजिटल होने के लिए दौड़ रहा है, और खासी तेजी से दौड़ रहा है। यहां पर अगर बैंकों और आधार कार्ड के डेटाबेस में कोई घुसपैठ करे, तो हो सकता है हिन्दुस्तान की जिंदगी थम ही जाए। यह सिलसिला इस देश के रेल रिजर्वेशन तक भी जा सकता है, और विमान सेवाओं तक भी। इससे एक झटके में इंटरनेट और मोबाइल फोन भी ठप्प हो सकते हैं, और लोग अपने पैसे न निकाल पाने की वजह से भूखे मरने की नौबत में आ सकते हैं। आज ही एक खबर है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार अंतरराष्ट्रीय तनाव और उठा-पटक फिर से चरम पर है। तृतीय विश्वयुद्ध का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि इस बार विश्वयुद्ध ऑनलाइन लड़ा जाएगा, जिसे साइबर युद्ध की संज्ञा दी जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि यह साइबर विश्वयुद्ध पहले हो चुके दो विश्वयुद्धों से भी ज्यादा घातक साबित हो सकता है। इसमें हमलावर की पहचान कर पाना भी आसान नहीं है। महज अंदाजा लगाकर ही किसी पर आरोप लगाया जा सकता है। ऐसे में अमरीका समेत दुनिया के शक्तिशाली देशों के परमाणु हथियार भी धरे के धरे रह जाएंगे और हैकर दुनिया को तबाह कर देंगे। वर्तमान में कतर संकट और खाड़ी क्षेत्र में उपजे तनाव के लिए हैकिंग को जिम्मेदार बताया जा रहा है।
ऊपर की इन बातों को देखें तो लगता है कि देशों के बीच दुश्मनी करवाने, एक-दूसरे पर हमले करवाने, एक-दूसरे को जंग में उलझाने, एक-दूसरे की बैंकिंग को ठप्प करने जैसे कितने ही काम ऐसे हो सकते हैं जिनमें एक भी गोली न चले, और करोड़ों लोगों की जिंदगी थम जाए, उनकी अपने सरकार पर से उम्मीद खत्म हो जाए, और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने में लंबा वक्त लग जाए।
दुनिया में डिजिटल व्यवस्था एक फुलाए जा रहे बुलबुले की तरह बड़ी होती जा रही है, लेकिन इस बुलबुले को बचाकर रखने का इंतजाम कम से कम हिन्दुस्तान जैसे देश में तो नहीं दिखता है। दरअसल जब डिजिटल और साइबर ढांचा खड़ा किया जाता है, तो उसके साथ-साथ सावधानी के साधन भी खड़े किए जाने चाहिए, जो कि आज कहीं दिख नहीं रहे हैं।

किसान आंदोलन एक खतरनाक मोड़ पर पहुंचा, आगे क्या?

संपादकीय
7 जून 2017


मध्यप्रदेश में किसानों का आंदोलन जिस खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, उससे राज्य सरकार का हड़बड़ाना तो स्वाभाविक है, देश के बाकी राज्यों को भी इससे एक सबक लेना चाहिए, और केन्द्र सरकार के साथ बैठकर किसानों और किसानी की दिक्कतों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। आज भी हिन्दुस्तान में आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती और उससे जुड़ी हुई गतिविधियों पर जिंदा है, और यह एक ऐसा तबका है जो कि देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाकर चल रहा है, वरना वह पीढ़ी तो अभी जिंदा है ही जिसने अमरीका से आए हुए पीएल-480 गेहूं की लाल-काली रोटियों को खाने की मशक्कत की थी। किसानों का मुद्दा नया नहीं है, यह मुद्दा बरसों से चले आ रहा है, और महाराष्ट्र, आन्ध्र, तेलंगाना जैसे कई राज्य हैं जिन्होंने हजारों की संख्या में किसानों की आत्महत्या दर्ज की है। छत्तीसगढ़ भी किसानों की आत्महत्याएं देखते आया है, यह एक अलग बात है कि सरकार और पुलिस का नजरिया यह रहता है कि हर किसान आत्महत्या किसानी-आत्महत्या नहीं होती है। लेकिन हमारा यह मानना है कि आत्महत्या की नौबत तो बहुत बाद में जाकर आती है, और उसके पहले किसान का पूरा परिवार टूट जाता है, खानपान छूट जाता है, इलाज और पढ़ाई का खर्च उठाने की ताकत नहीं बचती है, और तब जाकर कोई खुदकुशी करता है।
लेकिन किसानों की आत्महत्या को महज कर्ज से जोड़कर देखना ठीक नहीं है, और न ही केवल कर्जमाफी से ऐसी आत्महत्या रूकेगी, या कि किसानों का उग्र आंदोलन थमेगा। किसानी से जुड़ी हुई बहुत सी और बातें हैं जिनमें सोचना जरूरी है, और फसल से परे का एक मामला इन दिनों खबरों में वैसे भी बना हुआ था, और उस बीच मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर सरकारी गोलियों से पांच किसानों की मौत भी हो गई है, और हड़बड़ाई सरकार का एक-एक करोड़ रूपए का अभूतपूर्व रिकॉर्ड मुआवजा देने की घोषणा की है। इस घोषणा और ऐसे मुआवजे से बाद में देश भर में आंदोलनों में होने वाली मौतों को लेकर बाकी राज्य सरकारों को क्या-क्या परेशानी झेलनी पड़ेगी, वह एक अलग बहस का मुद्दा है, लेकिन आज की बात किसानों की दिक्कत तक रहना जरूरी है।
पूरे देश में किसानों की अर्थव्यवस्था उनके जानवरों से जुड़ी रहती है। मध्यप्रदेश में अभी चल रहे किसान आंदोलन में तो किसान दूध बहाते दिख ही रहे हैं। पिछले दो हफ्तों से देश भर में इस बात का विरोध चल रहा है कि केन्द्र सरकार ने जानवरों की खरीद-बिक्री पर रोक के जो नए नियम लागू किए हैं, उनके चलते पूरे देश में जगह-जगह अपराध कहलाने वाले काम होंगे, कहीं पर लोग जानवरों को न बेच पाने की वजह से मरने के लिए खुला छोड़ देंगे, तो कहीं किसी के खरीदे-बेचे जानवरों को लेकर झगड़े होंगे। कुल मिलाकर किसान अगर अपने बेकार हो चुके जानवरों को बेच नहीं पाएंगे, तो न उन जानवरों को कुछ खिला पाएंगे, और न खुद कुछ खा पाएंगे। यह बात महाराष्ट्र में पिछले बरसों में लगातार सामने आई जहां पर राज्य सरकार ने खुद के बनाए हुए बहुत कड़े कानून आतंक की तरह लागू किए थे, और किसान मरने की नौबत में आ गए थे, मर रहे थे, और उनका मरना जारी ही है। पिछले चौबीस घंटों में ही महाराष्ट्र में पांच किसानों ने आत्महत्या की है। जानवरों को लेकर एक भावनात्मक कानून और अभियान, आंदोलन और हिंसा से सबसे बड़ा नुकसान सबसे गरीब लोगों का हो रहा है, और जिन लोगों की भावनाएं, जिन लोगों का अहंकार इससे संतुष्ट हो रहा है, उनके पेट पहले से भरे हुए हैं।
अब सवाल यह है कि इस देश में किसानों और किसानी को बचाना है, या कि सरकारों के लिए एक पसंदीदा काम को आगे बढ़ाना है जो कि अनाज आयात करने का होता है। जब हजारों करोड़ का अनाज खरीदा जाता है, तो सबको मोटी रकम बचती है। अगर भारत की खेती धीरे-धीरे बदहाल होकर घाटे का काम रह जाएगी, तो किसान किसानी छोड़ देंगे, और सरकार के पास दूसरे देशों का मोहताज रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहेगा। इसलिए किसानों की दिक्कतों के बारे में व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है, और इसकी शुरुआत जानवरों की खरीद-बिक्री, और उनके कटने पर लगे हुए नए ताजा प्रतिबंधों को खत्म करने से होनी चाहिए।

आतंकियों को कफन-दफन का हक न देना गलत होगा

संपादकीय
6 जून 2017


लंदन में आतंकी हमला करने वाले मुस्लिम नौजवानों के कफन-दफन के वक्त धार्मिक संस्कार करवाने से वहां के 130 इमाम मना कर चुके हैं। जाहिर है कि उनके मन में या तो ब्रिटिश समाज के भीतर नाराजगी का डर होगा, या कि वे सचमुच ही ऐसी आतंकी वारदात करने वालों के खिलाफ होंगे। लेकिन सवाल यह है कि चाहे कोई आतंकी ही क्यों न हो, क्या उनके धार्मिक या कानूनी अधिकार इस तरह खत्म करना ठीक है? और ऐसे मौके कई दूसरी जगहों पर भी आते हैं, जब बच्चों से बलात्कार की भयानक कहानियों के बीच जब आरोपियों को अदालत में पेश किया जाता है, तब भी ऐसी बात उठती है कि कोई वकील उनका केस ना ले। कई बार यह मांग भी उठती है कि बेकसूरों की हत्या करने वाले नक्सलियों को इलाज क्यों दिया जाए?
लेकिन यह बात समझनी चाहिए कि आतंकियों या दूसरी किस्म के मुजरिमों की सोच तो अलोकतांत्रिक रहती है, तभी वे ऐसे जुर्म करते हैं, लेकिन उनके साथ अस्पताल, कब्रिस्तान, या अदालत ने बर्ताव करने वाले लोग अगर लोकतांत्रिक हैं, तो उन्हें मुजरिमों को भी उनके नागरिक अधिकार देने से मना नहीं करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह याद होगा कि कुछ अरसा पहले जब बुरी तरह से घायल एक नक्सली को बचाने की नौबत आई, तो बस्तर में तैनात पुलिस के एक हैलिकॉप्टर से उसे रायपुर लाया गया। और वह नक्सली एक ऐसी मुठभेड़ में ही घायल हुआ था, जिसमें शायद कई सुरक्षाकर्मी मारे गए थे, या घायल हुए थे। ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें पुलिस जवानों ने घायल मुजरिमों या नक्सलियों को अस्पताल में खून दिया है। अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टरों तो वहां पहुंचने वाले सभी तरह के जख्मी मुजरिमों का इलाज भी करते हैं, और जरूरत पडऩे पर तुरंत अपना खून भी देते हैं।
लोगों को यह समझना चाहिए कि सभ्य समाज, लोकतांत्रिक समाज किसी को अपने अधिकार खोने को नहीं कहता। इसलिए मीडिया को भी यह चाहिए कि वह किसी टकराव या नाराजगी की वजह से, या कि विरोध करने के लिए किसी व्यक्ति या किसी संगठन की खबरों का बहिष्कार न करे। ऐसे संगठन तो मीडिया के खिलाफ अलोकतांत्रिक काम कर सकते हैं, लेकिन मीडिया चूंकि लोकतंत्र पर भरोसा रखता है, इसलिए उसे अपने पाठकों के जानने के हक का सम्मान करते हुए, और लोगों के बोलने के हक का सम्मान करने के लिए किसी भी तरह के बहिष्कार से बचना चाहिए। आतंकी को मजहबी कफन-दफन न मिले, यह बेइंसाफी होगी, क्योंकि मजहब और धर्म तो बहुत सी जगहों पर आतंक को बढ़ावा देने का काम करते ही रहते हैं, धर्म स्थल मुजरिमों से अधिक आबाद रहते हैं, शरीफों से कम। इसलिए एक भले नागरिक और बुरे नागरिक के बुनियादी अधिकारों में फर्क करना ठीक नहीं है।

पर्यावरण बर्बादी के जिम्मेदार, कुछ अनदेखे पहलू

संपादकीय
5 जून 2017


हर बरस कुछ ऐसे दिन आते हैं जब किसी मुद्दे पर सोचा जाता है। हिन्दुस्तान में साल में कम से कम दो दिन आजादी के बारे में सोचा जाता है, एक दिन महिलाओं के हक के बारे में सोचा जाता है, और साल में एक दिन पर्यावरण के बारे में भी सोचा जाता है। दिक्कत यह है कि लोग पर्यावरण को या तो जंगलों से और पेड़ों से जोड़कर देखते हैं, या फिर वे प्रदूषण से इसका रिश्ता पाते हैं। हकीकत यह है कि इन दोनों से परे भी पर्यावरण को बचाने, या कि उसकी बर्बादी की एक बहुत बड़ी वजह खर्चीली जीवनशैली है जिसमें लोग बहुत से सामानों का इस्तेमाल करते हैं, और उनको बनाते हुए धरती पर कार्बन बढ़ते चलता है। अमरीका में वैसे तो मशीनें कम धुआं छोड़ती हैं, वह प्रदूषण फैलाने वाले काम दूसरे गरीब देशों में करवाता है, लेकिन फिर भी वह अगर पर्यावरण की बर्बादी के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार देश माना जाता है, तो उसकी वजह यह है कि वहां के लोगों की जिंदगी में सामानों की खपत इतनी अधिक है कि उससे सामान बनाते हुए प्रदूषण होता है, और फिर कचरे के ढेर से धरती पर बोझ बढ़ता है।
हम पर्यावरण दिवस के मौके पर जब यह देखते हैं कि लोग अपनी कमाई पर फिजूलखर्ची करके बहुत से सामानों का बोझ धरती पर बढ़ाते हैं, तो उनमें जागरूकता की कमी दिखती है। लेकिन दूसरी तरफ जब जनता के पैसों पर यही काम करने वाले नेता या अफसर, या कि सरकारी सहूलियतें पाने वाले दूसरे लोग यह काम करते हैं, तो एक तरफ वे जनता की छाती पर बोझ बनते हैं, और ऐसा करते हुए वे धरती पर बोझ बढ़ाते भी हैं। हमारा ख्याल है कि अगर सरकारों में बैठे हुए लोग अपनी खुद की जीवनशैली में किफायत बरतें, बंगले और दफ्तर छोटे करें, तो उनमें बिजली की खपत भी घट जाएगी, पानी की खपत भी घट जाएगी, और उनको बनाते हुए सामान की खपत घटेगी, तो धरती पर बोझ भी घटेगा। पर्यावरण को किफायत के नजरिए से देखना अधिक जरूरी है क्योंकि पेड़ों का कटना, या कि लगना तो समझ में आता है, लेकिन यह बात आमतौर पर समझ में नहीं आती कि बड़े-बड़े सरकारी निर्माण किस तरह लगातार पर्यावरण का नुकसान करते हैं।
इस मौके पर मीडिया में लगातार ऐसी खबरें आती हैं कि कारखाने कितना प्रदूषण बढ़ा रहे हैं, जंगल विभाग के लगाए हुए पेड़ किस तरह सूखकर गायब हो चुके हैं, और नदियों में कितना प्रदूषण हो चुका है। लेकिन इसके अलावा लोगों के बदन के भीतर कीटनाशकों और रसायनों का एक ऐसा प्रदूषण बढ़ते चल रहा है जो कि लोगों के जींस के रास्ते अगली पीढ़ी तक चले जाना तय है। इसलिए पर्यावरण दिवस के मौके पर लोगों को गिने-चुने और चर्चित पहलुओं से परे ऐसे दूसरे मुद्दों को भी देखना चाहिए जिससे कि धरती को बचाया जा सकता है। हिन्दुस्तान में गांधी जैसा इंसान हुआ जिसने कि कम से कम सामान इस्तेमाल करके किफायत का एक ऐसा उदाहरण सामने रखा जो कि पूरी दुनिया को बचा सकता है। लेकिन आज कारोबार से लेकर सरकार तक, हर किसी की दिलचस्पी इसमें रहती है कि खर्च कैसे अधिक से अधिक किया जाए क्योंकि उसी में अधिक से अधिक कमाई भी रहती है। इसलिए आज धरती का बचना या कि अपने खुद के लिए अधिक पैसों का बचना, इन दोनों के बीच एक बड़ा टकराव चल रहा है।