मोर की मर्दानगी खारिज करने वाले जज का अगला ओहदा?

संपादकीय
1 जून 2017


राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने रिटायर होने के एक दिन पहले एक फैसले में सरकार को सुझाव दिया कि गाय काटने पर उम्रकैद की सजा दी जानी चाहिए, और गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना चाहिए। उन्होंने इसके साथ-साथ दुनिया के अब तक के विज्ञान को चुनौती देते हुए ऐसी बातें कहीं कि जिन्हें लेकर सोशल मीडिया उबल पड़ा है, और शायद दुनिया भर के पशु वैज्ञानिक राजस्थान पहुंचने की तैयारी कर रहे होंगे जहां वे देखेंगे कि भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर किस तरह बिना संभोग के मोरनी को गर्भवती बनाता है, और मोर के आंसुओं से ही मोरनी मां बन जाती है। इस जज ने जो बातें कही हैं, उनसे यह भी लगता है कि इसके बाकी फैसलों को भी देखना चाहिए कि उनमें कहीं मानसिक विचलित स्थिति तो दिखाई नहीं पड़ती है?
देश में विज्ञान के मुकाबले अज्ञान को खड़ा करने की एक बड़ी कोशिश चल रही है। कई तरह की पौराणिक कहानियों को गिनाकर यह साबित किया जा रहा है कि हजारों या लाखों बरस पहले हिन्दुस्तान का विज्ञान कितना उन्नत था, और दुनिया में आज जहां-जहां जो-जो टेक्नालॉजी है, वह सब हजारों बरस पहले से हिन्दुस्तान में है। थोड़ी-बहुत समझ रखने वाले अक्लमंद लोगों को यह समझने में दिक्कत होती है कि जब इस देश की टेक्नालॉजी इतनी उन्नत थी, कि लंका से अयोध्या लौटते राम के पास विमान था, तो फिर मुगलों के हमलों के पहले वह तमाम टेक्नालॉजी कहां चली गई, और मुगलों को मारने में काम क्यों नहीं आ पाई?
पुराणों के हवाले से इस देश में पहले तो एक इतिहास गढऩे की कोशिश हो रही है, और फिर उस इतिहास की कहानियों को विज्ञान के सुबूत की तरह पेश किया जा रहा है। जब कोई देश या कोई पीढ़ी इतिहास में इस तरह गोताखोरी करने लगती है कि उसके पास न आज के लिए वक्त बचता, और न आगे बढऩे के लिए हसरत बचती, तब ऐसी पीढ़ी तलहटी तक जाकर ऊपर आकर तरह-तरह की नागमणियों को देखने का दावा भी करने लगती है। यह पूरा सिलसिला बहुत ही खतरनाक है जिसमें वर्तमान और भविष्य की सारी चुनौतियों को छोड़कर देश की जनता को एक अस्तित्वहीन और कहानीनुमा इतिहास में जीने को प्रेरित किया जा रहा है, और इन कहानियों को न मानने वालों को देशद्रोही करार दिया जा रहा है। किसी देश का इससे अधिक नुकसान भला क्या हो सकता है, और हिन्दुस्तान के पड़ोस के उसके दुश्मन समझे जाने वाले देशों की भला क्या औकात है कि वे हिन्दुस्तानी जनता को कई सदी पहले धकेल सकें? वे देश अपनी फौजों की मदद से और आतंकियों की मदद से इतना जरूर कर पा रहे हैं कि वे हिन्दुस्तानी सरहद के सैनिकों के सिर काटकर ले जा रहे हैं, लेकिन यह ताकत तो हिन्दुस्तान के भीतर के लोगों की ही है कि वे गणेश के सिर लगाने को प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक का सुबूत साबित कर सकें।
राजस्थान हाईकोर्ट के इस जज की नीयत लगती है कि आगे चलकर देश या अपने प्रदेश में रिटायर्ड जजों के लिए सुरक्षित कुछ बड़ी संवैधानिक कुर्सियों में से किसी एक के लायक अपने आपको साबित करना। पुनर्वास में कोई बुराई नहीं है, और बड़े-बड़े अफसर, बड़े-बड़े जज ऐसे पुनर्वास पाते भी रहते हैं। लेकिन एक मोर की मर्दानगी को झूठा साबित करके ऐसा ओहदा पाना ठीक नहीं है। मोर की भी कोई इज्जत होती है, और उसकी मोरनी अपने मोर की मर्दानगी की सबसे बड़ी गवाह भी होती है। राजस्थान शायद देश में सबसे अधिक मोरों वाला प्रदेश है, और अपने इस पक्षी की मर्दानगी को खारिज करने का यह बयान ठीक नहीं है। मोरों के पास वकील करने की ताकत होती तो रिटायर्ड जज साहब को कटघरे में खड़ा करवा देते, और उन्हें अपने आंसू देकर कहते कि इससे किसे गर्भवती कर सकते हो, करके दिखाओ। लेकिन पशु-पक्षियों के साथ दिक्कत यही है कि उनके नाम का इस्तेमाल गालियों से लेकर मिसालों तक बुरी तरह किया जाता है, और वे कुछ बोल भी नहीं पाते। फिलहाल सोशल मीडिया की मेहरबानी से जज साहब का विज्ञान तरह-तरह से धिक्कार पा रहा है क्योंकि हिन्दुस्तान में अभी भी हर कोई उनकी तरह के मंदअक्ल नहीं है, बल्कि अक्लमंद हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें