किसानों की दिक्कत को महज सब्सिडी से निपटाना असंभव

संपादकीय
10 जून 2017


किसानों की दिक्कतें कम नहीं हैं, और जब वे अपने आपको मारने पर उतारू हैं, तो यह जाहिर है कि किसी विरोध-प्रदर्शन में वे दूसरे को मारने पर चाहे न सही, तोडफ़ोड़ और आगजनी पर तो उतारू हो ही सकते हैं। और फिर जब देश में कहीं जाट आंदोलन में तो कहीं और किसी जाति के आंदोलन में हफ्तों तक पटरियों पर ट्रेन बंद हो जाती है, सड़कों पर गाडिय़ां जलाने के साथ-साथ मुसाफिरों से बलात्कार होने लगते हैं, तो इसी देश के भीतर दूसरे हिस्सों तक ये खबरें पहुंचती हैं, और वहां भी आंदोलन हिंसक होने लगते हैं। लोगों को ऐसा भी लगता है कि जब तक आंदोलन हिंसक नहीं होंगे, तब तक उनकी सुनवाई नहीं होगी। इसलिए जब राज्यों में चुनाव करीब रहते हैं, तो हर कर्मचारी संगठन के आंदोलन होने लगते हैं कि उनकी पुरानी मांगों पर आंदोलन से सुनवाई हो सकती है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में किसानों के आंदोलन को कम आंकना इसलिए ठीक नहीं है कि बाकी प्रदेशों में भी आगे-पीछे इसी तरह की मांग उठने लगेगी। भारतीय लोकतंत्र में प्रदर्शन के दौरान हिंसा को दोनों तरफ से एक किस्म से अनिवार्य या अपरिहार्य मान लिया गया है, और देश भर में जगह-जगह सड़कों पर हिंसा और तोडफ़ोड़ दर्ज होती है।
किसानों की मांगों को देश के बाकी हालात से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब ग्राहक हर बार अपनी पिछली गाड़ी से बड़ी गाड़ी, अपने पिछले टीवी से बड़ा टीवी, और अपने पिछले मोबाइल फोन से अधिक बड़ा या अधिक महंगा फोन लेने में तकलीफ महसूस नहीं करते, तब आलू-प्याज, या अनाज के दाम देते हुए लोगों की जान निकलने लगती है। जबकि हकीकत यह है कि खेती अब बहुत महंगा कारोबार हो चुकी है। खेतिहर मजदूर बहुत महंगे हो गए हैं क्योंकि गांवों में सरकारी मजदूरी का रेट बहुत ऊपर चले गया है, और उतनी मजदूरी देकर किसान को कुछ कमाई बचना शायद नामुमकिन रहता है। इसके अलावा किसानों के परिवार के सारे लोग पहले खेती में उतरते थे, और वे खुद मजदूर की तरह भी काम कर लेते थे, लेकिन आज तो किसान की अगली पीढ़ी किसान बनना ही नहीं चाहती। और नौबत अगर सचमुच इतनी खराब न होती, तो इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या क्यों करते?
अब अगर हम इस समस्या के समाधान की बात अगर करें, तो केन्द्र सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर किसानों की मदद के लिए कुछ फैसले लेती आई हैं। सस्ता खाद, सस्ती बिजली, सस्ते बीज, और उपज का अधिक समर्थन मूल्य, इन सबसे किसान कुछ हद तक जिंदा बच पाए हैं। कहीं-कहीं कर्जमाफी या ब्याजमाफी भी देखने में आती है, और उससे भी कुछ आत्महत्याएं रूकती हैं। लेकिन एक बड़ी बात यह है कि लगातार सरकारी अनुदान या मदद से चलने वाला कारोबार अपने खुद के पैरों पर खड़ा रहना भूल जाता है। इसलिए जरूरी यह है कि किसान की जिंदगी में मुमकिन कई दूसरी बातों को बढ़ावा दिया जाए ताकि कुल मिलाकर किसान का जिंदा रहना हो सके। जिसमें डेयरी या दूसरे किस्म के पशुपालन के काम हो सकते हैं, सब्जी या फल-फूल की खेती हो सकती है, मधुमक्खी पालन हो सकता है, और गांवों में हो सकने वाले कई तरह के कुटीर उद्योग हो सकते हैं जिनसे कि किसान को मजदूरी की तलाश में दूसरे राज्यों में न जाना पड़े, और खुदकुशी न करनी पड़े। लेकिन इनमें से कोई पहल होने के बजाय पिछले दिनों हुआ यह है कि गाय, गोवंश, और बाकी कुछ जानवरों को कटने से बचाने के नाम पर ऐसे कानून बनाकर लागू कर दिए गए हैं जिनसे बूढ़े या कमजोर जानवर खुद भूख से मर जाएंगे, और उनके मालिक किसान जहर से। जानवरों की खरीद-बिक्री, और उनके कटने का सिलसिला खेती के समय से ही चले आ रहा है, और उसे रातोंरात इस तरह से बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट किया जा रहा है, और इसके भयानक नतीजे सामने आएंगे। जानवरों का इंसान की जिंदगी में एक उपयोग होता है, और वह उपयोग निपट जाने के बाद उन पर इंसान तभी कुछ खर्च कर पाते हैं, जब वे खुद का पेट भर पाते हैं, और कुछ बचा पाते हैं। अगर किसान से जानवरों की खरीद-बिक्री का हक इस तरह से छीन लिया जाएगा, तो खेती की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट लगेगी।
किसानों के बहुत से मुद्दे हैं, और उनको महज किसानी-सब्सिडी से नहीं निपटाया जा सकता। गांवों की अर्थव्यवस्था को ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग की मदद से बढ़ाना होगा, उसके बिना कोई सीधा इलाज नहीं है।

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