गांधी चतुर भी थे, और बनिया भी, कहा किसने यह मायने रखता है...

संपादकीय
11 जून 2017


कल का दिन बड़ा अजीब था। मध्यप्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गांधी के उपवास-आंदोलन की तर्ज पर भोपाल में किसान आंदोलन को लेकर उपवा पर बैठे थे, और छत्तीसगढ़ के दौरे पर आए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गांधी को एक चतुर बनिया कहकर देश के बहुत से तबकों की नाराजगी में फंस गए थे। उनकी बात शायद नाजायज थी क्योंकि गांधी के परिवार के, उनके वंशज जो आमतौर पर गांधी के तरह-तरह के अपमान को झेलने के आदी रहे हैं, और कभी आक्रामक जवाब नहीं देते हैं, वे भी चुप नहीं रह पाए, और उन्होंने कड़ा और कड़वा जवाब दिया, जो कि जायज था। बाकी राजनीतिक दलों का तो यह हक बनता ही था कि भाजपा के मुखिया की ऐसी बात पर हमला करें, और उन्होंने ऐसा किया भी।
जो लोग अमित शाह को करीब से देख चुके हैं, वे जानते हैं कि वे अनायास कुछ नहीं कहते, या कि चूक से उनके मुंह से कुछ नहीं निकलता। उन्होंने गांधी के बारे में जब सार्वजनिक मंच से, माईक और कैमरे के सामने ये विशेषण इस्तेमाल किए तो उन्हें यह मालूम था कि इसे लेकर बवाल खड़ा होगा, और वैसा ही हुआ भी। तो कुछ लोगों का यह भी सोचना है कि देश के असल मुद्दों की तरफ से मीडिया और बाकी जनता का ध्यान हटाने के लिए भाजपा और संघ परिवार के लोग ऐसे बहुत से मामले छेड़ते हैं जिनको लेकर गैरभाजपाई पार्टियां और सामाजिक आंदोलनकारी टूट पड़ते हैं, और कुछ दिनों तक उन्हीं पर चर्चा होती है। तो क्या यह ऐसा ही एक मामला था? अगर ऐसी कोई नीयत इसके पीछे नहीं भी थी, तो भी इतना तो था ही कि गांधी को लेकर भाजपा के ये शब्द अपमानजनक तो माने ही जाने वाले थे, फिर चाहे किसी और इतिहासकार या राजनीतिक विश्लेषक की जुबान या कलम से ये शब्द आपत्तिजनक नहीं माने जाते।
अब अगर देखें तो किसी को चतुर कहने में कोई खास अपमान की बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कोई होशियार किन-किन मामलों में चतुर भी रहते हैं, यह बात किसी विभाजन रेखा से बांटी नहीं जा सकती। और बनिया तो एक हकीकत है, ठीक उसी तरह जिस तरह की कोई क्षत्रिय है, कोई दलित है, और कोई ब्राम्हण या बनिया है। गांधी एक बनिया परिवार में पैदा हुए थे, और अंग्रेजों के साथ उनके मोलभाव की समझौता-वार्ता देखें, कांग्रेस की राजनीति के भीतर लीडरशिप के झगड़ों को निपटाने के लिए उनका मोलभाव देखें, तो लगता है कि उनके बीच भाव-ताव करने की एक बनिया बुद्धि थी, और वह कोई नकारात्मक बात नहीं थी, वह बात जिंदगी के मुद्दों को निपटाने में गांधी की मददगार रहती थी। फिर यह देखें कि चतुर रहना किसी दुष्टता या शातिर होने से अलग है, चतुर होने का मतलब होशियार होना होता है, और अगर इतिहासकार रामगुहा जैसे कोई लोग गांधी के लिए ऐसे विशेषण इस्तेमाल करते, तो उन्हें एक सटीक व्याख्याकार माना जाता।
दिक्कत यह है कि भाजपा या उससे जुड़े संगठनों के लोगों का गांधी के लिए, खासकर गांधी की सोच के लिए, गांधी के जीवन-दर्शन के लिए जो सोचना है, वह कभी भी संदेह से परे नहीं रहा। मंच पर गांधी की तस्वीर जरूर सजी रही, लेकिन भाजपा और उसके साथियों की कथनी और करनी इन दोनों का गांधी से बड़ा फासला रहा। ऐसे में अमित शाह की कही बात उनकी साख के साथ, उनकी पार्टी की साख के साथ जोड़कर ही देखी जानी थी, और वैसा ही हुआ। अमरीका में एक अश्वेत दूसरे अश्वेत से जिन शब्दों में बात करते हैं, वैसे संबोधन अगर कोई गोरा किसी अश्वेत के लिए इस्तेमाल करे तो उसे नस्लभेद या रंगभेद का कुसूरवार करार दिया जाएगा। किसी भी जाति, धर्म, रंग, या क्षेत्रीयता के लोग आपस में जिस जुबान में बात कर सकते हैं, उस जुबान में वे विरोधियों से बात नहीं कर सकते थे। इसलिए अमित शाह की कही हुई बात एक गांधीविरोधी विचारधारा से निकली हुई बात के रूप में ही ली जानी थी, और इसीलिए उनकी बात पर इतना बवाल हो रहा है। जहां तक हमारी निजी सोच है, तो हमको लगता है कि गांधी ऐसे विशेषणों से बहुत परे के हैं, और वे अगर आज होते, तो इस बात का बुरा नहीं मानते। लेकिन आज के बयान गांधी नहीं दे रहे हैं, उनके समर्थक दे रहे हैं, प्रशंसक दे रहे हैं, और उनका हक है अमित शाह की बात को बुरा मानने का।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें