आंख के मुकाबले आंख नहीं दोस्ती के मुकाबले दोस्ती हो

संपादकीय
12 जून 2017


भारत में बंद पाकिस्तान के कैदियों में से करीब एक दर्जन को आज रिहा करके उनके देश भेजा जा रहा है। भारत की यह कार्रवाई ऐसे वक्त हो रही है जब सरहद पर दो तरह के तनाव चल रहे हैं, एक तो पाकिस्तानी फौज वहां भारत की तरफ बीच-बीच में युद्धविराम को तोड़कर गोली या गोला चलाने की दोषी करार दी जा रही है, दूसरी तरफ कश्मीर में लगातार पाकिस्तान के तरफ से आतंकियों के आने की तोहमत भी लग रही है। ऐसे में भारत में जनता का एक दबाव यह है कि पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, और विपक्षी दलों से लेकर मीडिया और आम जनता तक से यह मांग उठ रही है कि अपने चुनावी वायदे के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी सैनिक कार्रवाई करें।
नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी विपक्ष में रहते हुए लगातार पाकिस्तान के खिलाफ बहुत ही आक्रामक रहे, लेकिन केन्द्र की सत्ता में आने के बाद से उनका रूख एक सरकार का रहा, देश का रहा। भारत में सब्र से काम लिया, और पाकिस्तान के उकसावे या भड़कावे, हमले या घुसपैठ के खिलाफ भी कोई अनुपातहीन फौजी जवाब नहीं दिया। देशों के बीच संबंधों को दोनों तरफ से बिगाडऩे की कोशिश करें, तो वे लगातार बिगड़ते जाते हैं, और अगर सुधारने की कोशिश करें तो उनके धीरे-धीरे सुधरने की संभावना भी बनती है। ऐसे में दोनों देशों में लोगों को इसलिए सब्र से काम लेना चाहिए क्योंकि इनको हथियार बेचने वाली ताकतें कुछ और हैं, और वे चाहती हैं कि इनके बीच जंग चलती रहे, या कि जंग के माहौल से उसकी तैयारी का खर्च जारी रहे। हकीकत यह है कि भारत-पाकिस्तान की सरहद के दोनों तरफ इतने गरीब लोग हैं, और वे इतनी बड़ी गिनती में हैं, इतना कुपोषण है, और इलाज की इतनी कमी है, कि दोनों देश लगातार संबंध सुधारें तो न सिर्फ सैनिकों की जान बचेगी, बल्कि दोनों तरफ के कुपोषणग्रस्त और बीमार बच्चों की जान भी बचेगी। यह एक बहुत ही नासमझी का युद्धोन्माद रहता है जो फौज के मौजूदा या रिटायर हो चुके अफसरों का बढ़ाया हुआ रहता है, हथियारों के सौदागरों का बढ़ाया हुआ रहता है, या फिर हथियार-उद्योग के दलाल मीडिया का बढ़ाया हुआ रहता है। भारत में यह शिनाख्त करना अधिक मुश्किल नहीं है कि कौन से लोग, कौन से टीवी चैनल लगातार जंग की बातें करते हैं, लगातार भड़काने में लगे रहते हैं, और इसके पीछे उनको कहां से दलाली मिलती होगी, यह समझना बहुत मुश्किल भी नहीं है। ऐसे में अगर भाजपा सरकार अपनी पार्टी के पिछले एजेंडा को छोड़कर आज एक नए एजेंडा पर काम कर रही है, और कैदी रिहा कर रही है, हमलों पर सब्र दिखा रही है, तो यह एक बहुत ही अच्छी बात है। हमारा यह भी मानना है कि भारत में एनडीए के विरोधी दलों को भी केन्द्र सरकार की इस पहल पर उसकी तारीफ करनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं दलों में अमन-पसंद लोग अधिक हैं, जंग के खिलाफ लोग अधिक हैं।
भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ लोगों को समझदार-मीडिया के साथ मिलकर एक ऐसा अभियान चलाना चाहिए जिससे सरकारों पर दबाव पड़े, और दोनों तरफ के आम लोगों को जेलों से आजादी मिले, मैदानों पर टीमें उतरें, टीवी और सिनेमा में कलाकार काम करें, और लेखक एक-दूसरे देश जाकर आपस में बातचीत कर सकें। गांधी ने कहा था कि एक आंख के मुकाबले दूसरी आंख निकालने से एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी हो जाएगी।  इसी बात को दूसरी तरह से देखें तो यह भी साफ है कि एक दोस्ताना पहल के मुकाबले दूसरी दोस्ताना पहल से दुश्मनी भी खत्म हो सकती है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें