पुलिस और हिंसक भीड़, दोनों पर नजर रखने वर्दी-कैमरे हों

संपादकीय
13 जून 2017


मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन में शामिल कांग्रेस की एक महिला विधायक का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे भीड़ से थाने में आग लगाने को कहते दिख रही हैं। इसे लेकर उनके खिलाफ पुलिस ने जुर्म कायम किया है। ऐसा देश भर में जगह-जगह बहुत से नेताओं के मामले में होता है कि वीडियो रिकॉर्डिंग रहने पर वे फंस जाते हैं, और अदालत तक सुबूतों में घिरे-घिरे पहुंच जाते हैं। लेकिन अधिकतर मामलों में सार्वजनिक जगहों पर जुर्म करने वाले, हिंसा भड़काने वाले लोग अगर कैमरों में कैद नहीं है, तो बच निकलते हैं।
इसका एक आसान तरीका भारत की पुलिस को इस्तेमाल करना चाहिए जो कि बहुत से विकसित देशों में अनिवार्य रूप से हो रहा है। हालांकि पुलिस या सत्ता इसे पसंद नहीं करेंगे, लेकिन मानवाधिकार आयोग या सर्वोच्च न्यायालय इसका हुक्म दे सकते हैं। पश्चिमी देशों की पुलिस की वर्दी पर सामने एक बॉडी-कैमरा लगा होता है जो उनकी लोगों से बातचीत को भी रिकॉर्ड करता है, और सामने के नजारे को भी। ऐसे में जब पुलिस पर ज्यादती के आरोप लगते हैं, तब भी इन कैमरों की रिकॉर्डिंग काम आती है, या कि जब किसी मुजरिम या किसी गवाह से पुलिस बातचीत करती है, तो उस बातचीत की रिकॉर्डिंग भी अदालत में सुबूत की तरह काम आती है। आज टेक्नालॉजी इतनी सस्ती हो गई है कि ऐसे कैमरे कुछ हजार रूपए में मिल जाते हैं, और इनके इस्तेमाल से पुलिस का अपना चाल-चलन, उनका व्यवहार, इन सबमें भी सुधार आना तय है।
भारत में भी दफ्तरों से बाहर सड़कों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर लोगों के बीच काम करने वाली पुलिस को ऐसे कैमरों से लैस किया जाना चाहिए। और आज तो संचार सुविधा भी इतनी सस्ती हो गई है कि इन कैमरों की रिकॉर्डिंग सीधे ही पुलिस कंट्रोल रूम में दर्ज की जा सकती है, और बाद में भीड़ और पुलिस पर लगने वाले अलग-अलग आरोपों का निपटारा आसान हो सकता है। सत्ता शायद ऐसा पसंद न करे क्योंकि उसकी मर्जी के मुताबिक काम करते हुए भी पुलिस कई बार हिंसा या ज्यादती करती है, और कई बार पुलिस अपनी मर्जी से भी हिंसा पर उतारू हो जाती है, लेकिन ऐसे कैमरे पुलिस की हिंसा को भी काबू करेंगे, और भीड़ की हिंसा के सुबूत भी दर्ज करते चलेंगे।
मानवाधिकार की रक्षा करने के लिए भी ऐसी टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जरूरी है, और इससे बयान और सुबूत के लंबे-चौड़े काम में भी पुलिस को मदद मिलेगी, और यह निपटारा जल्द हो सकेगा। मध्यप्रदेश में जिन लोगों के ऊपर हिंसा भड़काने के लिए मुकदमे दर्ज हुए हैं, उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनके लिए उनके वीआईपी दर्जे के मुताबिक अधिक कड़ी सजा का इंतजाम किया जाना चाहिए, आम इंसान को ऐसी सार्वजनिक हिंसा पर अगर चार बरस की कैद मिलना है, तो विधायक को छह बरस और सांसद को आठ बरस की सजा मिलनी चाहिए। ऐसी सजा दिलाने में भी पुलिस के वर्दी-कैमरे कारगर साबित होंगे। और यह बात तो है ही कि ऐसी किसी भी नई टेक्नालॉजी के उपकरणों की खरीदी में सरकार में बैठे बहुत से लोगों का बड़ा उत्साह रहता है, कम से कम उसके चलते ही ऐसे कैमरे आ जाएं।

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