कामयाबी के ताजमहल बनाने के मुकाबले, और आम काम

संपादकीय
15 जून 2017


भारत के दो दर्जन से अधिक राज्यों में अब तो आधे राज्यों पर भाजपा की सरकार हो गई है, लेकिन एक वक्त था जब शायद दर्जनभर अलग-अलग पार्टियों की सरकारें राज्यों में रहती थीं, और उनके बीच एक राजनीतिक मुकाबला भी चलता था, और इन राज्यों के बड़े अफसरों के बीच भी अपने कामकाज को बेहतर दिखाने के लिए दिल्ली में भारत सरकार की बैठकों में एक मुकाबला होता था। अलग-अलग राज्यों की स्थितियां और अर्थव्यवस्था अलग-अलग रहती हैं, और उनकी चुनौतियां भी अलग-अलग रहती हैं, लेकिन फिर भी राज्यों की तुलना तो होती ही है। भारत सरकार के आंकड़ों में राज्यों की स्थितियों की तुलना तो एक बात रहती है, जनता के बीच यह भी गिना जाता है कि किस राज्य में किस पार्टी या नेता ने कितने बार सत्ता हासिल की है। ऐसे में अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के कामकाज को भी आंका जाता है, और छत्तीसगढ़ जैसे नए बने हुए राज्य की तुलना उसी के साथ राज्य बने हुए उत्तराखंड और झारखंड से कई पैमानों पर होती है। अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के कामकाज की अलग-अलग शैली भी होती है, और शायद ऐसी विविधता ही भारत के लोकतांत्रिक-संघीय ढांचे को बेहतर बनाने में काम भी आती है। राज्यों और नेताओं को एक-दूसरे से सीखने के लिए बहुत कुछ रहता है, और पार्टी के भीतर भी अलग-अलग नेता अपनी कायम की हुई मिसालों को लेकर एक-दूसरे को अघोषित चुनौती देते हुए भी खड़े रहते हैं।
सत्ता पर बैठे कुछ नेता और अफसर उदारता से दूसरे लोगों की कामयाबी को देखकर उसे मंजूर भी कर लेते हैं, और उनसे सीखने की कोशिश भी करते हैं। कई बार सीखकर किए हुए काम और बेहतर भी हो जाते हैं। राज्य के भीतर भी कई जिलों के अफसर अपनी मेहनत से बाकी जिलों के सामने एक चुनौती खड़ी करते हैं, और छत्तीसगढ़ में हम अफसरों के बीच ऐसा मुकाबला देखते भी आए हैं। ऐसे ही मंत्रियों के बीच भी अपने चुनाव क्षेत्र में काम करवाने को लेकर मुकाबला चलता है, और काबिल और कामयाब मंत्री अपने विभाग के कामकाज को दूसरे विभागों से बेहतर बनाने के लिए मेहनत करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नेता या अफसर के लिए सबसे बड़ी कामयाबी क्या हो सकती है?
कामयाबी के साथ एक दिक्कत यह है कि जब तक उसकी शिनाख्त न हो सके, जब तक वह अलग हटकर न दिखे, तब तक वह दिखती ही नहीं है। नतीजा यह होता है कि नेता और अफसर अलग हटकर किए जाने वाले कामों को लेकर इतनी मेहनत करते हैं कि जो न दिखने वाले आम काम रहते हैं, वे अनदेखे रह जाते हैं। चुनाव के वक्त लोगों को गिनाने के लिए कुछ बड़े काम जरूरी रहते हैं, बहुत से छोटे-छोटे कामों की कामयाबी न तो गिनाई जा सकती, और न ही वह लोगों को प्रभावित करती है। अफसरों के मामलों में भी यह है कि उन्हें चुनाव तो नहीं लडऩा पड़ता, लेकिन आज प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी प्रधानमंत्री के स्तर पर मिलने वाले पुरस्कार और सम्मान को पाने के लिए एक होड़ रहती है, और उनके जिलों या उनके शहरों की बाकी छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने पर किसी तरह का कोई सम्मान नहीं रहता है। ऐसे मुकाबले के चलते हुए माहौल कुछ इस तरह का रहता है कि स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में किसी की दिलचस्पी पास होने से अधिक की नहीं रहती, और आगे बड़े कॉलेज में दाखिले के मुकाबले में कामयाबी सबके लिए मायने रखती है। स्कूलों की पढ़ाई धरी रह जाती है, और प्रवेश परीक्षाओं के कामयाब लोग वाहवाही पाते हैं।
लेकिन यह लोकतंत्र के लिए एक घातक स्थिति भी है कि लोकप्रियता के पैमानों पर ऊपर पहुंचने के लिए, और कामयाबी के कुछ चुनिंदा मुकाबलों में जीतने के लिए लोगों की ताकत अनुपातहीन तरीके से लग जाती है, और जनता की जिंदगी में मायने रखने वाले छोटे-छोटे काम धरे रह जाते हैं। होना तो यह चाहिए था कि जनता चुनाव के वक्त ऐसे छोटे-छोटे कामों को भी याद रखती, लेकिन इंसानी मिजाज ऐसा रहता है कि वह बड़े-बड़े गिनाने लायक कामों को तो याद रखता है, बाकी चीजों को याद नहीं रखता। मतदाता की परिपक्वता जब तक नहीं बढ़ेगी, तब तक यह नौबत बनी रहेगी कि नेता और अफसर अपनी कामयाबी के ताजमहल बनाने में लगे रहेंगे, और नालियां भरी रहेंगी, घूरे पहाड़ बनते रहेंगे। लोकतंत्र में जनता की जागरूकता और उसकी समझ में कमी के चलने तक यह नौबत सुधरने की नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें