राष्ट्रपति के लिए जरूरी बहुमत से आगे बढऩा बुरा नहीं होगा...

संपादकीय
16 जून 2017


राष्ट्रपति चुनाव को लेकर देश में गहमागहमी बनी हुई है, और कुछ लोग इसे आम सहमति या सर्वसम्मति बनाने का एक मौका देख रहे हैं, तो कुछ लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा-एनडीए अगर अपने बहुमत से अपनी पसंद के किसी को राष्ट्रपति बना सकती है, तो उसे सर्वसम्मति की कोशिश क्यों करनी चाहिए? इस मौके पर एनडीए गठबंधन के भीतर भी शिवसेना शतरंज की बिसात पर ढाई घर चलने वाले घोड़े की तरह दिख रही है, दूसरी तरफ विपक्ष के पास अब तक कोई सर्वसम्मत नाम नहीं दिख रहा है जिसे कि एनडीए उम्मीदवार के सामने खड़ा किया जा सके। एनडीए के मुकाबले देश के सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी से दो बड़े ताकतवर केन्द्रीय मंत्री, राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू, जाकर मिले भी हैं, और उनसे यूपीए की किसी पसंद के बारे में पूछा। लोकतंत्र में आम सहमति का बड़ा महत्व होता है, और लोगों को विरोधियों के साथ की जरूरत न हो, तब भी उन्हें साथ रखने की कोशिश करनी चाहिए, और हो सकता है कि एनडीए या भाजपा के भीतर ऐसी सोच वाले भी कुछ लोग हों। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे लोग भी जरूर होंगे जो कि यह मानकर चल रहे होंगे कि सर्वसम्मति बनाने का बोझ हमेशा भाजपा के सिर पर क्यों आना चाहिए, और जब जनता ने एनडीए को विशाल बहुमत से जिताया है, राज्यों में भी उसे सत्ता दी है, तो फिर सर्वसम्मति की अधिक परवाह क्यों करनी चाहिए?
पिछले तीन बरस में मोदी सरकार के कामकाज में बहुत सी ऐसी बातें आई हैं जिनमें उसे अपनी पुरानी राजनीतिक घोषणाओं के खिलाफ जाकर पिछली यूपीए सरकार की बड़ी-बड़ी नीतियों को मानना पड़ा, उन पर अमल करना पड़ा, और उसके लिए एक बार फिर यूपीए का साथ लेना पड़ा। ऐसे दो सबसे बड़े मामले आधार कार्ड और जीएसटी के हैं। आधार कार्ड का भाजपा-एनडीए ने जमकर विरोध किया था, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी को जब आधार कार्ड योजना के संस्थापक नंदन निलेकेणि ने इस बारे में समझाया, तो एक बैठक के बाद ही प्रधानमंत्री इसके दीवाने हो गए, और उन्होंने इस योजना को यूपीए के मुकाबले कहीं आगे बढ़ाने की कोशिश की, और सरकारी काम के, सार्वजनिक जीवन के, और निजी जिंदगी के हर पहलू में इसे अनिवार्य बना दिया। यहां तक कि केन्द्र सरकार आधार कार्ड की अनिवार्यता के लिए सुप्रीम कोर्ट से टकराव ले रही है, जबकि यह सत्ता में आते ही इसे खारिज करने वाली थी। ऐसा ही दूसरा मामला जीएसटी का है। भारत के इतिहास का यह सबसे बड़ा टैक्स कानून यूपीए का बनाया हुआ है, और भाजपा ने इसका जमकर विरोध किया था, भाजपा के राज्यों से आए हुए मंत्री उस वक्त मनमोहन सरकार के साथ बैठकों में इसे देश को तबाह करने वाला कानून बताते थे। लेकिन अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने यूपीए के सांसदों को मनाकर, पार्टियों से अपील करके इस कानून को लागू करवाने में कमरतोड़ मेहनत की, और अब यह लागू होने जा रहा है।
इसलिए लोकतंत्र में आम सहमति या सर्वसम्मति का अपना एक महत्व होता है, सत्ता के बाहुबल का बहुमत साथ हो, तो भी लोगों को एक लोकतांत्रिक सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए। राष्ट्रपति का भारत में ऐसे तो रोजमर्रा के किसी काम में कोई दखल नहीं होता है, लेकिन बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें विपक्ष भी राष्ट्रपति तक अपनी मांगों या शिकायतों को लेकर पहुंचता है, और वैसे में अगर राष्ट्रपति सबके भरोसे के हैं, तो पक्ष-विपक्ष का टकराव घटने के आसार रहते हैं। एनडीए को आज चाहिए कि वह बहुमत के बाद भी अधिक से अधिक लोगों की सहमति जुटाने की कोशिश करे, और संसद के भीतर, या विधानसभाओं में उसे अपनी पसंद के राष्ट्रपति के लिए चाहे और वोटों की जरूरत न हो, उसकी पसंद को अगर जरूरत से ज्यादा वोट मिलते हैं, तो यह एनडीए की लोकतांत्रिक-कामयाबी होगी। देश में ऐसी चर्चा है कि एक दलित या आदिवासी महिला को भाजपा राष्ट्रपति पद के लिए पसंद कर सकती है, अगर ऐसा होता है, या कि किसी दूसरे भले नाम को आगे बढ़ाया जाता है, तो विपक्ष को भी बहुमत की पसंद का साथ देना चाहिए।

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