शौचालय तो अच्छे हैं, लेकिन हत्या करके लागू करना वैसा ही है जैसा इमरजेंसी में नसबंदी...

संपादकीय
17 जून 2017


राजस्थान में खुले में शौच रोकने के लिए एक म्युनिसिपल के लोग शौच करती महिलाओं की तस्वीरें खींच रहे थे, और इनका विरोध करने पर एक सामाजिक कार्यकर्ता को पीट-पीटकर मार डाला गया। देश में खुले में शौच को रोकने का एक बड़ा अभियान चल रहा है जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर अमिताभ बच्चन तक सभी जुटे हुए हैं, और सरकारें खूब बड़ी रकम खर्च करके गांव-गांव में, घर-घर में शौचालय बना रही हैं। शौचालय बनाने के आंकड़े जिले के अफसरों को प्रधानमंत्री के हाथों सम्मान और पुरस्कार दिलवा रहे हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में दर्जनों जगहों से खबरें आई हैं कि रिकॉर्ड बनान के लिए, अपने जिले या अपने म्युनिसिपल को ओडीएफ घोषित करवाने के लिए अफसरों ने फर्जी आंकड़े गढ़ लिए, और अधूरे पड़े शौचालयों को इस्तेमाल होते बता दिया, पूरा बना हुआ बता दिया।
खुले में शौचालय एक सामाजिक शर्मिंदगी की बात भी है, और यह सेहत के लिए खराब भी है। इंसान की न्यूनतम प्रतिष्ठा के लिए भी यह जरूरी है कि उसे खुले में शौच न करना पड़े, और खासकर बेबस होकर न करना पड़े। यह एक अलग बात है कि गांवों में लोगों का खेत या मैदान जाना, या नदी-तालाब जाना सामाजिक संपर्क और संबंध का एक जरिया भी रहता है, लेकिन फिर भी यह तो मानना ही होगा कि शौचालय न होने की वजह से ऐसा होना शर्मिंदगी भी है, और खतरनाक भी है। बहुत सी महिलाएं रात-बिरात खुले में शौच के लिए आबादी के बाहर आते-जाते बलात्कारी मर्दों के हमले का शिकार भी होती रहती हैं। इसलिए सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना अच्छी है, और जनता को सरकार से पूरी की पूरी रकम की मदद भी मिल रही है।
लेकिन किसी भी, और कितनी भी अच्छी योजना को लागू करने के तौर-तरीके उस योजना को बुरा बनाने में देर नहीं करते। लोगों को याद होगा कि किस तरह इमरजेंसी में संजय गांधी के लगाए नारे को पूरा करने के लिए देश भर की सरकारी मशीनरी झोंक दी गई थी, और आबादी पर काबू पाने के लिए नसबंदी का अभियान चलाया गया था। आबादी घटाना बुरी बात नहीं है चाहे वह देश की हो, चाहे वह परिवार की हो। और गरीब परिवारों में अगर बच्चे कम रहें, तो उनकी जिंदगी बेहतर होती है इसमें भी कोई शक नहीं है। लेकिन इस अच्छे नारे पर इतना बुरा अमल हुआ था कि नसबंदी इस देश के इतिहास में एक बदनाम और हैवान शब्द हो गया, और संजय गांधी इसी एक बात को लेकर देश के सबसे बड़े खलनायक हो गए। सरकारी अमले ने सरकार के दिए हुए टारगेट को पूरा करने के लिए राह चलते कुंवारे लड़कों को भी पकड़-पकड़कर उनकी नसबंदी करवा दी थी, और देश में सेंसरशिप की वजह से ऐसी ज्यादती की खबरें भी नहीं आती थीं। नतीजा यह हुआ कि जब तक इंदिरा-संजय को जनता पर जुल्म का अंदाज लग पाता, उसके पहले उनकी हार तय हो चुकी थी।
आज शौचालय न रहने पर जगह-जगह अफसर लोगों का रियायती राशन बंद कर रहे हैं, उनके किसी भी तरह के सरकारी कामकाज पर रोक लगा रहे हैं, और शौच पर जाती महिलाओं की तस्वीरें खींचना, उन पर टॉर्च की रौशनी डालना जैसे बहुत से घटिया तौर-तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं। अभी घर-घर में शौचालय से आने वाली दो दिक्कतों का अंदाज भी नहीं लगाया गया है कि इनके लिए पानी कहां से आएगा, और जब इनके नीचे बने टैंक भर जाएंगे, तो उनकी सफाई कौन करेंगे? ये दो बुनियादी सवाल बेजवाब खड़े हुए हैं, और कुछ दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी मानना है कि इसके बाद तो पूरी जिंदगी के लिए भारत के गांव-गांव में सिर पर मैला ढोना जारी रहने की गारंटी हो गई है। शहरों में तो म्युनिसिपल की मशीनें आकर पखानों के टैंक साफ कर जाती हैं, लेकिन गांव-गांव में जहां पानी नहीं है, वहां ऐसी मशीनें कहां से आएंगी? फिर यह भी समझने की जरूरत है कि जिन जगहों पर मीलों दूर से सिर पर पानी लेकर आना घर की महिला की मजबूरी रहती है, उन जगहों पर ऐसे पखानों में खुले मैदान की शौच के मुकाबले कई गुना पानी लगेगा, और वह पानी भी पूरे परिवार के लिए महिला ही ढोकर लाएगी। पानी का ढांचा विकसित हुए बिना शौचालयों की ऐसी आक्रामक और हिंसक अनिवार्यता जनता के बुनियादी हक को कुचलना भी है। अगर स्थानीय अधिकारियों की ऐसी हैवानियत किसी भी अदालत में जाएगी, तो अधिकारी सजा पाएंगे। फिलहाल राजस्थान में सामाजिक कार्यकर्ता को सरकारी अमले ने जिस तरह पीट-पीटकर मार डाला है, उससे सबकी आंखें खुलनी चाहिए, और सरकारों को चाहिए कि अपने मैदानी अमले को कानून के भीतर रहकर काम करने की समझाईश दें। शौचालय अच्छी बात है, यह बात ठीक वैसी ही है कि तानाशाही के मुकाबले लोकतंत्र अच्छी बात है। लेकिन इराक में लोकतंत्र कायम करने के लिए अमरीकी बमबारी से जिस तरह लाखों लोगों की मौत हुई है, वह लोकतंत्र लाने का सही तरीका नहीं है। इसी तरह लोगों की शौच करते तस्वीरें खींचना, और विरोध करने वालों को मार डालना, शौचालय को बढ़ावा देने का तरीका नहीं है, और केन्द्र से लेकर राज्यों तक हर सरकार को अपने तौर तरीके तुरंत दुबारा जांचने चाहिए।

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