राहत, मदद, और मुआवजे का राजनीतिक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए

संपादकीय
18 जून 2017


जब कोई डॉक्टर स्नायुतंत्र की जांच के लिए लोगों की हड्डियों के जोड़ पर रबर का एक हथौड़ा मारते हैं, तो घुटनों पर इसके पड़ते ही पूरा पैर एक झटके से हिलता है। अंग्रेजी में इसी बात को नी जर्क रिएक्शन कहते हैं कि घुटने पर पड़ा तो बिलबिलाते हुए तुरंत प्रतिक्रिया की। इन दिनों भारत की सरकारें कुछ ऐसा ही कर रही हैं। देश और प्रदेशों में जब कोई ऐसा आंदोलन चलता है जिससे कि मतदाताओं के एक संगठित तबके की सोच पर बड़ा फर्क पड़ सकता है तो सरकारें तुरंत कार्रवाई करती हैं, और उससे भी अधिक कार्रवाई करती हुई दिखना चाहती हैं। मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिस गोली से तीन मौतें हुई थीं, तो आनन-फानन भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मरने वालों के लिए एक-एक करोड़ रूपए मुआवजे की घोषणा कर दी थी। इसी वक्त उनकी पार्टी के दूसरे मंत्री और नेता यह बयान दे रहे थे कि मरने वाले किसान नहीं थे, वे अराजक तत्व थे जो कि किसान आंदोलन में घुस गए थे। न तो शिवराज सिंह ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व से ऐसे अभूतपूर्व मुआवजे पर चर्चा की थी, न ही यह सोचा था कि इससे बाकी प्रदेशों, और खुद मध्यप्रदेश पर अभी ऐसी पुलिस-गोली-मौत पर मुआवजे का कैसा दबाव पड़ेगा। यह नी जर्क रिएक्शन दूसरे प्रदेशों में भी जगह-जगह देखने मिल रहा है, और जनमत की नाराजगी से बचने के लिए सरकारें तुरंत हरकत में आई हुई दिखने की कोशिश में ऐसे फैसले लेती हैं जो कि लंबे वक्त में जनता के ही खिलाफ हो जाते हैं।
जनलुभावने फैसले, और जनहित, ये दोनों हमेशा साथ-साथ नहीं चलते। बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जिनमें ये दोनों एक बराबरी से कंधे से कंधा टकराते हुए, कदम से कदम मिलाते हुए चलते हैं, लेकिन बहुत से मामलों में ये एक-दूसरे के ठीक खिलाफ भी हो जाते हैं। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम समाज के भीतर मर्दों को खुश करने के लिए एक अकेली शाहबानो को कुचलने का कानून बना डाला था, वह उस वक्त मुस्लिम मर्दों के बीच लुभावना मान लिया गया था, लेकिन वह जनहित के ठीक खिलाफ था। ठीक इसी तरह आज देश भर में गाय और बीफ को लेकर बनाए गए कानून, और गैरकानूनी हिंसा को मौन मंजूरी के मामले हैं। ये एक शाकाहारी, हिन्दू, और ऊंची समझी जाने वाली जातियों के बीच लुभावना कानूनी-गैरकानूनी काम तो हो सकता है, लेकिन यह जनहित के ठीक खिलाफ है। ऐसा ही मामला एक करोड़ का मुआवजा देने का है। सरकार के हाथ जनता का खजाना रहता जरूर है, लेकिन वह किसी बादशाह की मर्जी पर गले से उतारकर दी गई मोतियों की माला की तरह का नहीं रहता है, वह एक लोकतांत्रिक और सरकारी समझ के साथ, नियमों के भीतर, और दीर्घकालीन सोच का रहना चाहिए।
देश में जगह-जगह केन्द्र और राज्य सरकारें किसी कुदरती या इंसानी हादसे के बाद तरह-तरह के मुआवजों का ऐलान करती हैं। देश में एक मुआवजा नीति बनाई जानी चाहिए जिसे संघीय ढांचे के तहत व्यापक सहमति के दायरे में लाने की जरूरत है। इससे मुआवजे की लुभावनी घोषणा करके मतदाता-तबके के बीच राजनीतिक-लोकप्रियता पाने का सत्तारूढ़ नेताओं का उतावलापन काबू में आएगा। केन्द्र और राज्य के बीच, और अलग-अलग राज्यों के बीच भी अलग-अलग जिंदगियों की कीमत, या कि राहत तय करने के स्पष्ट पैमाने बनने चाहिए, वरना आज तो कई हताश-निराश किसान ऐसे भी हो सकते हैं जो कि किसी आंदोलन में अपनी जान देकर परिवार को एक करोड़ रूपए का मुआवजा दिलवाने को अपनी जिंदगी से बेहतर मान लेंगे। हमारा ख्याल है कि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर हर इंसानी जिंदगी का कई तरह का बीमा भी करवा सकती हैं, और अलग-अलग मुआवजों के बजाय लोगों को अपने हक से बीमे का दावा-भुगतान पाने दे सकती है। दुर्घटनाओं को लेकर पहले से ऐसे बीमे रहते हैं, और बाकी हादसों के लिए भी इसका इंतजाम होना चाहिए। ऐसी कोई तर्कसंगत वजह नहीं हो सकती कि किसी सड़क हादसे में अकेले मरने वाले के परिवार को किसी मुआवजे का हकदार न माना जाए, और जब दर्जन भर लोग एक हादसे में एक साथ मर जाएं, तो उन सबके परिवारों को मुआवजे का ऐलान सरकार करे। ऐसी मौत अकेले हो, या औरों के साथ हो, परिवार पर उनका असर एक जैसा ही पड़ता है।
फिलहाल देश भर में किसान आंदोलनों के चलते हुए मौत पर मुआवजे से परे भी तरह-तरह की कर्जमाफी की घोषणा हो रही है, अगले चुनावों के घोषणा पत्र अभी से घोषित किए जा रहे हैं कि किसी पार्टी की सरकार आने पर किसानों के लिए क्या-क्या किया जाएगा। ऐसी बिलबिलाहट से उपजी ऐसी प्रतिक्रिया से देश के दूसरे तबकों के भीतर भी यह बात घर कर जाती है कि हिंसक आंदोलन बिना कोई मांग पूरी नहीं हो सकती, या कि बड़ी संख्या में आत्महत्याओं के बाद भी सरकार के कानों पर जूं रेंगना शुरू करती हैं। सरकारें चूंकि पांच बरस की निरंतरता के साथ आती हैं, और राजनीतिक दलों को ऐसे एक कार्यकाल से अधिक के लिए भी सोचना पड़ता है, या कम से कम सोचना चाहिए, फिर बड़े राजनीतिक दल एक से अधिक राज्यों के लिए एक सरीखी जवाबदेही का बोझ भी ढोते हैं, इसलिए राहत, मदद, और मुआवजे की नीतियों का राजनीतिक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए, इससे देश बर्बाद होता है। किसानों को बचाना हो, या किसी और तबके को पैरों पर खड़ा करना हो, उन्हें लगातार बैसाखियों से बांधकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए लंबी सोच के साथ ठोस योजनाएं बनानी चाहिए जो कि उतनी लुभावनी नहीं लगेंगी जितनी कि एक करोड़ के मुआवजे की मुनादी लगती है, लेकिन वैसी आत्मनिर्भरता ही उन तबकों और बाकी देश, सबके भले की होगी।

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