भाजपा का राष्ट्रपति प्रत्याशी घोषित, विपक्ष का पता नहीं

संपादकीय
19 जून 2017


राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के मौजूदा राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करके भाजपा ने एनडीए के भीतर और बाहर यह जाहिर कर दिया है कि उसे बहुमत या सर्वमत की कोई जरूरत नहीं है, और वह बाकी साथियों के बिना भी अपनी मर्जी से राष्ट्रपति बनवा सकती है। एक पढ़े-लिखे, वकालत किए हुए, और दो बार राज्यसभा सदस्य रहे एक दलित नेता को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने मुख्य विपक्ष कांग्रेस-यूपीए के सामने भी यह दिक्कत खड़ी की है कि वह एक दलित के नाम का विरोध कैसे करे? और यह बात तो है ही कि विपक्ष के पास अभी तक किसी एक नाम पर व्यापक सहमति का आसार भी नहीं दिख रहा है। यह एक अलग बात है कि विपक्ष के बीच किसी नाम पर गंभीरता से चर्चा भी सुनाई नहीं दे रही है।
राष्ट्रपति के नाम पर इस जगह बहुत कुछ लिखने का नहीं है, लेकिन इससे दो बातें साफ होती हैं, एक तो यह कि एनडीए के भीतर भाजपा को किसी सहमति की अब खास जरूरत नहीं लगती है, यह महज इस फैसले से साबित नहीं होता, बल्कि भाजपा के पूरे रूख से उसका यह नया आत्मविश्वास दिखाई देता है। दूसरी तरफ खाली बैठे हुए विपक्ष के पास किसी सहमति तक पहुंचने की ताकत भी नहीं दिख रही है, और अब तक तो गैरएनडीए पार्टियों की कोई ऐसी महत्वपूर्ण बैठक भी नहीं हुई है जिसमें किसी उम्मीदवार के नाम पर कोई चर्चा हो सके। कुल मिलाकर, घूम-फिरकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आसपास कुछ लोग जुटते हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी खो चुकी ताकत के बाद अब कोई वजन भी नहीं रखती। राष्ट्रपति चुनाव के इस मौके पर देश में दो बड़े गठबंधनों के बीच शक्ति संतुलन का एक नया सुबूत सामने आया है, और भाजपा का एक नया राजनीतिक भविष्य भी इससे साफ दिखाई देता है। इस चुनाव के बाद विपक्ष को भी इस देश में विपक्ष की भूमिका के बारे में सोचना चाहिए कि अगर वे राष्ट्रपति चुनाव के वक्त भी एक होकर नहीं बैठ सकते, तो फिर वे देश के चुनाव में किस तरह कोई गठबंधन बना पाएंगे। आज जिस तरह राहुल गांधी कांग्रेस के भीतर कांग्रेस की संभावनाओं पर एक बड़ा स्पीड ब्रेकर हैं, ठीक उसी तरह देश में विपक्ष की एकजुटता की संभावना में कांग्रेस एक बाधा दिखाई पड़ रही है। इस नौबत से उबरे बिना देश में भाजपा-एनडीए का विकल्प खड़ा नहीं होने वाला है।
भाजपा के अध्यक्ष सहित कई लोगों का यह रूख पिछले दिनों सामने आया कि वह महज सहमति की कोशिश कर रही है, उसे किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। लोगों को याद होगा कि लंबे समय तक देश और प्रदेशों में कांग्रेस का राज चलते रहा, और वह पार्टी अपनी मर्जी से कई ऐसे राष्ट्रपति बनाते रही जो कि शर्मनाक साख वाले थे। लेकिन जिस तरह पुरानी कहावतों में कहा जाता है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, संसदीय लोकतंत्र में भी गिनती ऐसे ही मायने रखती है कि जिसके सांसद-विधायक, उसी का राष्ट्रपति।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व एथनिक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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