जज बनाने के पहले अमरीका की तरह सार्वजनिक सुनवाई हो

संपादकीय
2 जून 2017


राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने रिटायर होते-होते आखिरी दिन गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने और मोरनी के बिना संभोग गर्भवती होने के जैसे बयान दिए, और फैसले में टिप्पणी की, उससे वे खुद तो पूरे देश में मखौल का सामान बन ही गए, लोगों ने यह सवाल भी उठाए हैं कि उनके पहले के दिए हुए फैसलों पर भी नजर डालनी चाहिए कि ऐसी अक्ल वाला आदमी और कहीं अपने पूर्वाग्रह से बेइंसाफी तो नहीं करते रहा है। लेकिन इस बारे में कल हम इसी जगह विस्तार से लिख चुके हैं, और आज इसी मुद्दे का एक दूसरा पहलू हम छूना चाहते हैं।
दरअसल पिछले हफ्ते ही छत्तीसगढ़ में एक नया बखेड़ा शुरू हुआ है जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक को छत्तीसगढ़ में एक सरकारी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। भाजपा की सरकार और भाजपा के राज्यपाल ने यह नियुक्ति की, और राज्यपाल भी ऐसे जो कि अपनी पूरी जिंदगी के संघ से संबंधों का खुलासे से खुद ही ब्यौरा देते हैं, उनकी जीवनी में संघ के स्वयंसेवक होने पर सैकड़ों पेज लिखे गए हैं। ऐसे में जब राज्य में भाजपा के छात्रसंगठन एबीवीपी ने इस कुलपति की नियुक्ति पर यह कहते हुए जमकर हंगामा किया कि इन्होंने सहिष्णुता-असहिष्णुता की बहस में पुरस्कारों को लौटाने की वकालत की थी, और इनके विचार भाजपा या संघ के विचार से मेल नहीं खाते। दो-तीन दिन के भीतर ही राज्यपाल ने अपनी की हुई इस नियुक्ति पर रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जजों से लेकर संवैधानिक पदों तक, और देश या प्रदेश के कई आयोगों तक होने वाली नियुक्तियों को लेकर देश में एक पारदर्शिता की जरूरत है। और इस मामले में अमरीका से कुछ सीखा जा सकता है जहां हर बड़ी अदालत के हर जज नियुक्ति के पहले संसद की कमेटी के सामने पेश होकर उनके सैकड़ों सवालों के जवाब देते हैं, और कई-कई दिन तक चलने वाली ऐसी सुनवाई टीवी पर भी दिखाई जाती है, और शायद वहां लोगों को बैठकर सुनने की इजाजत भी रहती है। वहां सीआईए या एफबीआई के मुखिया की नियुक्ति के लिए भी इस तरह की सुनवाई शायद होती है, और इनमें गर्भपात से लेकर नस्लवाद तक हर किस्म के मुद्दों पर उनकी राय पूछी जाती है, दर्ज की जाती है, उनके पहले के दिए हुए बयानों को उखाड़कर उन पर जवाब मांगे जाते हैं, और इतनी कड़ी छानबीन और अग्निपरीक्षा के बाद जाकर वहां बहुत सी महत्वपूर्ण कुर्सियों पर कोई पहुंच पाते हैं।
हिन्दुस्तान में भी जजों और संवैधानिक ओहदों पर आने वाले लोगों की ऐसी सुनवाई, और जनता के बीच खुली सुनवाई होना जरूरी है क्योंकि इसके बिना ऐसे जज अदालतों में पहुंच जाते हैं जो सतीप्रथा का समर्थन करते हैं, जो कि बुरी तरह से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे चले आते हैं। आज जजों का चयन सुप्रीम कोर्ट के जजों का एक कालेजियम करता है, और उसके भीतर क्या बात होती है, किन पैमानों पर यह चयन होता है, यह बाहर किसी को नहीं बताया जाता। बस छांटे हुए जजों के नाम केन्द्र सरकार को भेज दिए जाते हैं, जो कि अमूमन मान लिए जाते हैं, और उनकी नियुक्ति हो जाती है। दूसरी तरफ संवैधानिक संस्थाओं के लिए लोगों के नाम केन्द्र या राज्य की सरकारें छांटती हैं, और वे इन्हें लेकर किसी के प्रति जवाबदेह नहीं रहतीं। यही वजह है कि आज कई प्रदेशों में ऐसे राज्यपाल हैं जो कि घोर साम्प्रदायिक या हिंसक बातें सार्वजनिक रूप से कहते आए हैं, और जिनकी जाहिर तौर पर लोकतंत्र पर कोई आस्था नहीं दिखती है। इससे परे भी लोगों के भ्रष्टाचार के आरोप चले आते हैं, और उनसे उनकी नियुक्ति में कोई बाधा नहीं आती।
लोकतंत्र में यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। जब जनता का सूचना का अधिकार लागू है, और लोकतंत्र में पारदर्शिता की एक उम्मीद की जाती है, तो ऐसे तमाम चयन एक सुनवाई के बाद होने चाहिए, और किन लोगों को किन वजहों से नियुक्त किया जा रहा है, यह भी जनता के सामने आना चाहिए, ऐसे लोग जनता की जिंदगी को तय करते हैं, और बहुत से मामलों में जनता की मौत को भी तय करते हैं। ऐसे लोग एक गाय के प्रति अपने लगाव के  चलते किसी को फांसी सुना भी सकते हैं, और किसी को फांसी से बचा भी सकते हैं। ऐसे पूर्वाग्रह के खिलाफ सार्वजनिक सुनवाई की पारदर्शिता से कम और किसी बात से काम नहीं चलेगा।

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