सोशल मीडिया पर हिंसा और नफरत के हमलों पर सरकारों को कार्रवाई करना ही चाहिए

संपादकीय
23 जून 2017


ट्विटर पर एनडीए के राष्ट्रपति-प्रत्याशी रामनाथ कोविंद के नाम से खोले गए एक अकाऊंट में उनकी तस्वीर भी लगी है, और उसे विश्वसनीय बनाने के लिए उस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दर्जनों ट्वीट भी री-ट्वीट की गई हैं। लेकिन कोविंद के नाम से पोस्ट की गई ट्वीट देखें तो उन पर यूपीए की राष्ट्रपति-प्रत्याशी मीरा कुमार  के बारे में बड़ी भद्दी बातें लिखी गई हैं। एक तरफ तो भारत का आईटी कानून अखबारों के लिए बने कानूनों के मुकाबले बहुत अधिक कड़ा है, और उस पर बड़ी कड़ी सजा का इंतजाम भी है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर हर तरह की विचारधारा वाले जिस आक्रामक और हमलावर तरीके से रात-दिन हिंसा और अश्लीलता की बातें करते हैं, उस पर मानो सरकार का कोई काबू नहीं है, और देश का कोई कानून लागू नहीं है।
हमारा मानना है कि आज चाहे सत्तारूढ़ एनडीए के समर्थक ही क्यों न अधिक हिंसक बातें पोस्ट कर रहे हों, इस सिलसिले को थामने के लिए केन्द्र सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। दूसरी तरफ राज्य सरकारें भी यह कार्रवाई कर सकती हैं, और आज जब तक किसी बड़े नेता के बारे में कोई दूसरा बड़ा नेता कुछ न लिखे, तब तक आमतौर पर कानून तक कोई दौड़ नहीं लगती। आज किसी खिलाड़ी या फिल्म सितारे, या कि किसी चर्चित अखबारनवीस या टीवी पत्रकार के खिलाफ भयानक हिंसक और फूहड़ बातें की जाती हैं। सोच-समझकर साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वाली बातें पोस्ट की जाती हैं। झूठी तस्वीरें झूठे संदर्भ सहित पोस्ट करके तनाव खड़ा किया जाता है। और कम्प्यूटर-इंटरनेट पर सुबूत इतनी आसानी से रहने के बावजूद सरकारें कार्रवाई नहीं कर रही हैं। यह सिलसिला और लोगों को और गैरजिम्मेदार, और हिंसक, और हमलावर बनाता है, और ऐसे लोगों में से जब तक रोजाना कहीं न कहीं कुछ लोगों को कैद न हो, लोग समझदार नहीं हो पाएंगे।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ जिम्मेदारियों के साथ ही मिली हुई हैं। दूसरे लोगों के सम्मान, उनकी भावनाओं को कुचलते हुए लोग अपनी अभिव्यक्ति अगर करते हैं, तो उनके खिलाफ कानून बने हुए हैं। बहुत बड़े अरबपति लोग तो अपने वकील करके अदालत तक जाते हैं, और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले लोगों को घसीटते हैं। दूसरी तरफ आम लोग या ऐसे लोग जो कि बड़ी अदालतों तक का खर्च नहीं उठा सकते, वे चुपचाप बैठ जाते हैं। दरअसल ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का मुख्यालय अमरीका में है जहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक अलग सीमा है, और एक अलग कानून उस पर लागू होता है। वहां पर जो बातें गैरकानूनी नहीं हैं, वे भी हिन्दुस्तानी कानून में गैरकानूनी हैं। अब यहां ट्विटर या फेसबुक को तो शायद रोज अदालत में नहीं घसीटा जा सकता, लेकिन भारतीय कानून का इस्तेमाल करके उन हिन्दुस्तानियों को जरूर कटघरे में लाया जा सकता है जो कि यहां बैठे हिंसा और नफरत की बातें करते हैं, दूसरों का सुख-चैन तबाह करते हैं।
लोगों को अपने परिवार, अपनी पार्टी, अपने दफ्तर, और अपने दायरे के लोगों को भी सावधान करना चाहिए कि डिजिटल सुबूत कभी मिटते नहीं है, लोग लिखने के बाद चाहे उसे मिटा डालें, लेकिन एक बार पोस्ट की गई बातें कभी खत्म नहीं होती हैं, वे सुबूत के लिए कम्प्यूटरों पर दर्ज रहती हैं। इसलिए अगर हिफाजत से रहना है, तो जिम्मेदारी से ही सोशल मीडिया पर रहना होगा।

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