पेड न्यूज पर मप्र के मंत्री की अपात्रता एक बढिय़ा कार्रवाई

संपादकीय
24 जून 2017


मध्यप्रदेश में भाजपा के एक ताकतवर मंत्री नरोत्तम मिश्रा को चुनाव आयोग ने  पेड न्यूज छपवाने का गुनहगार मानते हुए विधायकी के लिए तीन साल अयोग्य घोषित कर दिया है, और तीन साल की सीमा से वे अगला विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। यह मामला 2008 के विधानसभा चुनाव का है, जिसमें नरोत्तम मिश्रा की छपवाई पेड न्यूज के सुबूत भी लोगों ने चुनाव आयोग को पेश किए, और वे आयोग के सामने इसका कोई जवाब नहीं दे पाए। पेड न्यूज का मामला नया नहीं है, और अकेले मध्यप्रदेश का नहीं है, भारत के कई प्रदेशों में चुनाव के वक्त मीडिया अपनी आत्मा को एक या अधिक पार्टियों और एक या अधिक उम्मीदवारों के बीच अधिक से अधिक दाम पर नीलाम करने पर आमादा रहता है, और देश की प्रेस कौंसिल इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है।
पेड न्यूज का सबसे बड़ा मामला महाराष्ट्र का है जिसमें कांग्रेस के अशोक चव्हाण ने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेश के अधिकतर बड़े अखबारों में कई-कई पन्नों के परिशिष्ट छपवाए थे जिनमें एक ही मैटर को हर अखबार ने अपने संवाददाता की रिपोर्ट की तरह छापा था और जिनमें अशोक चव्हाण की पार्टी को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की गई थी। प्रेस कौंसिल तक यह शिकायत पहुंची थी, और नामी-गिरामी संपादकों की एक जांच टीम बनाई गई थी। इसने एक बहुत लंबी रिपोर्ट कौंसिल को दी थी जिसमें यह पाया गया था कि अशोक पर्व नाम से छपे पन्ने पूरी तरह से पेड न्यूज थे। लेकिन प्रेस कौंसिल ने उस रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की, और बात को दफन कर दिया गया। लीक होकर बाहर आई रिपोर्ट देश के तमाम पत्रकारों के बीच घूमती रही, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब मध्यप्रदेश के इस मंत्री के मामले में चुनाव आयोग की कार्रवाई से यह उम्मीद बंधती है कि आने वाले चुनाव में मीडिया और राजनीति की गिरोहबंदी लोकतंत्र को शिकस्त देने के लिए मीडिया के बेजा इस्तेमाल के पहले सोचेगी।
दरअसल मीडिया को खरीदना एक से ज्यादा तरह से होता है, और यह भी कह सकते हैं कि मीडिया अपने आपको एक से ज्यादा तरह से बेचता है। कुछ तो इस तरह से बिकते हैं कि वे किसी पार्टी या उम्मीदवार के खिलाफ कुछ नहीं छापेंगे, और इस तरह अखबार और चैनल अपनी चुप्पी और अनदेखी को बेचते हैं, और यह खरीद-बिक्री दिखती भी नहीं है, और साबित भी नहीं हो सकती। दूसरी तरफ मीडिया का एक हिस्सा अपने पन्नों को या अपने बुलेटिन के मिनटों को बेचता है, और खरीददार नेता या पार्टी के पक्ष में, या कि उसके विरोधी के खिलाफ खबरों को छापता-दिखाता है। यह दूसरे किस्म की खरीद-बिक्री साबित हो सकती है, और मध्यप्रदेश वाले मामले में यही हुआ भी है। मीडिया के साथ पिछले बरसों में कुछ दिक्कतें हुई हैं जिनसे यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है। एक तो मीडिया ने अपने खर्चे इतने बढ़ा लिए हैं कि उनको पूरा करने के लिए आत्मा बेचना एक किस्म से जरूरी हो जाता है। दूसरी बात यह कि मीडिया के भीतर आपस में इतना गलाकाट मुकाबला चलता है कि एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं और अपनी प्रसार संख्या या दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए वे पार्टियों, नेताओं या सरकारों के गढ़े हुए झूठ को भी सच की तरह दिखाते चलते हैं।
मध्यप्रदेश की इस कार्रवाई से देश के मीडिया के ईमानदार हिस्से, और राजनीति के भी बेहतर हिस्से को एक राहत हो सकती है, और अगले चुनाव में चुनाव आयोग को मीडिया की बेहतर निगरानी के लिए कामकाजी-अखबारनवीसों को पूरे देश में तैनात करना चाहिए ताकि वे ऐसे और मामले सामने रख सकें।

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