दो महिला खिलाडिय़ों के लाजवाब जवाब

संपादकीय
25 जून 2017


भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज ने दो दिन पहले मीडिया के एक सवाल के जवाब में पुरूषवादी सोच को तगड़ी लताड़ लगाई। एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कि उनका पसंदीदा पुरूष क्रिकेट खिलाड़ी कौन है? मिताली ने इसके जवाब में सवाल किया कि क्या कभी उस पत्रकार ने किसी पुरूष क्रिकेट खिलाड़ी से यह पूछा है कि उसकी पसंदीदा महिला क्रिकेट खिलाड़ी कौन है? कुछ इसी तरह की लताड़ एक पत्रकार को तब खानी पड़ी थी जब सानिया मिर्जा से टीवी पर इंटरव्यू करते हुए यह पूछा गया था कि वे शादी के बाद अब सैटल कब होंगी? सवाल का मतलब यह था कि आल-औलाद पैदा करके वे परिवार कब पूरा करेंगी? इस पर सानिया ने कहा था कि लगता है कि यह पत्रकार इस बात से खुश नहीं है कि वे दुनिया की अव्वल खिलाड़ी रहने के बजाय मां क्यों नहीं बन रही हैं? उन्होंने कहा कि ऐसा सवाल किसी पुरूष खिलाड़ी से नहीं पूछा जाता। इस पर इस नामी-गिरामी टीवी पत्रकार को माफी मांगनी पड़ी थी, और उसने कहा कि यह आपत्ति सही है क्योंकि वह ऐसा सवाल किसी पुरूष खिलाड़ी से कभी नहीं पूछता।
दरअसल समाज और मीडिया इन दोनों के महिलाओं के बारे में नजरिए में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। बल्कि मीडिया के मालिकाना हक से लेकर मीडिया की रीति-नीति तय करने वाले संपादकों तक की कुर्सियों पर महिलाओं को जगह बहुत ही कम मिली हुई है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि समाज के दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, या कि गरीबों को ऐसी कोई कुर्सियां नसीब नहीं होती हैं। मीडिया के मालिक तो खैर हो सकता है कि खानदानी दौलत की वजह से मालिक बन जाते हों, लेकिन जिन कुर्सियों पर विरासत की जरूरत नहीं होती, वहां भी महिलाओं को जगह नहीं मिलती है, और यही वजह है कि अवसरों से वंचित ऐसे तमाम तबकों को अपनी आवाज उठाने का मौका भी कम मिलता है। देश के बड़े-बड़े अखबारों और चैनलों के संपादकों के नाम देखें, तो शायद ही कोई एक महिला नजर आए, और शायद ही कोई दलित या अल्पसंख्यक नजर आए।
दूसरी बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मीडिया में सभी महत्वपूर्ण कुर्सियों पर ऐसे लोग आ जाते हैं जिनके परिवार के लोग सरकार या कारोबार में सबसे ऊंची कुर्सियों पर हैं। मीडिया के अपने कारोबार के लिए यह अच्छी बात रहती है कि वे ताकतवर ओहदों पर बैठे लोगों की आल-औलाद को अपने कारोबार में महत्व दें, और अधिक कारोबार पाएं। जानकारों का कहना है कि देश में जो सबसे अधिक सम्माननीय मीडिया कारोबार हैं, वहां भी महत्वपूर्ण पत्रकार बनने का मौका ऐसी ही संतानों को अधिक मिलता है। यह कुछ उसी तरह का वंशवाद है जिसके चलते लोगों को अपने परिवार के लोगों के न रहने पर उनके चुनाव क्षेत्र से लडऩे का मौका मिलता है। यह कुछ उसी तरह का है कि लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी सार्वजनिक संस्थाओं पर काबिज रहते हैं, और उन्हें खून निकलने तक चूसते रहते हैं। महत्व की ऐसी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के लोग इस बात का सम्मान भी जरूरी नहीं समझते कि वंचित तबकों को कोई महत्व दिया जाना चाहिए, क्योंकि खुद उनके अस्तित्व में ऐसे किसी न्यायसंगत नजरिए की कोई जरूरत नहीं रहती है।
समाज में जो तबके सदियों से बेइंसाफी झेल रहे हैं, उन्हें अपनी लड़ाई में आज सोशल मीडिया से भी बहुत मदद मिल रही है क्योंकि सोशल मीडिया किसी मालिकाना हक के काबू में नहीं है, किसी जाति या किसी लिंग का बंधक नहीं है। इसलिए आज सभी उन तबकों को अपने संघर्ष को एक बार फिर आगे बढ़ाना चाहिए, जिन्हें परंपरागत मीडिया, परंपरागत राजनीति, या परंपरागत समाज कभी इंसाफ नहीं देते हैं। इन दो महिला खिलाडिय़ों ने जिस दम-खम से मीडिया के अन्यायपूर्ण सवालों का जवाब दिया है, उससे भारत की उन लाखों महिला नेताओं को भी सबक लेना चाहिए जो कि किसी को कमजोर साबित करने के लिए उसे चूडिय़ां भेंट करती हैं, मानो चूडिय़ां कमजोरी का प्रतीक हों। सामाजिक और राजनीतिक प्रतीकों के प्रति चौकन्नापन आए बिना दबे-कुचले तबकों का संघर्ष न आगे बढ़ेगा, न कामयाब होगा।

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