सच की चाहत तो बहुत, बर्दाश्त जरा भी नहीं...

संपादकीय
26 जून 2017


केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने सुझाया है कि स्कूली किताबों में आपातकाल के इतिहास पर एक अध्याय जोडऩा चाहिए ताकि बच्चों को उस दौर की जानकारी हो सके। उनका कहना इस मायने में तो सही है कि योरप का इतिहास और जर्मनी का इतिहास, मुगलों का इतिहास और अंग्रेजों का इतिहास तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया जाता है, लेकिन भारत का ताजा इतिहास नहीं पढ़ाया जाता। उनका सुझाव एक साहसी सोच है, और हम इस बात के हिमायती हैं, हालांकि ताजा इतिहास को छूना कितना खतरनाक हो सकता है, उसे पहले सोच लेना चाहिए।
अब पौन सदी पहले का इतिहास गांधी की हत्या है, उसे स्कूली पाठ्यक्रम में किस तरह पढ़ाया जाएगा? देश की आम जनता और दूसरी तरफ गोडसेवादियों की सोच और नजरिए में बड़ा फर्क है। गांधी की हत्या को एक राष्ट्रवादी काम कहा जाएगा, या कि देश के खिलाफ की गई हत्या? क्या सरकारों में इतना हौसला होगा कि गोडसे को खुलकर देख सकें, और दिखा सकें? इसके बाद अगर देखें तो आपातकाल तो आता ही है, 1984 के सिख विरोधी दंगे भी आते हैं। इन दंगों के पहले का स्वर्ण मंदिर का आतंकियों का डेरा भी आता है, और ऑपरेशन ब्लू स्टार भी। हौसले के साथ खरा इतिहास लिखने वाले तो मिल जाएंगे, लेकिन किस सरकार में यह हौसला होगा कि केन्द्र या राज्य की स्कूली किताबों में इस पूरे दौर को ईमानदारी से खुलकर लिख सके? थोड़ा और आगे बढ़ें तो भारत के ताजा इतिहास में बाबरी मस्जिद को गिराना भी आता है, बाबरी के ठीक पहले अडवानी की रथयात्रा भी आती है, और बाबरी के ठीक बाद मुंबई के बम धमाके भी आते हैं। अब इनको किस इतिहासकार की नजर से दिखाया जाएगा? थोड़ा सा और आगे बढ़ें तो गोधरा कांड और गुजरात के दंगे आते हैं, और क्या आज सरकार ईमानदारी के साथ इस दौर को स्कूली बच्चों के सामने रख सकेगी?
सच की मांग तो आसान होती है, सच की चाहत भी जायज होती है, लेकिन सच के लिए बर्दाश्त कम ही लोगों के दिल-दिमाग में होता है। ताजा इतिहास तो मधुमक्खियों के छत्ते सरीखा होता है जिसे छेडऩा कम खतरनाक नहीं होता। लोगों को याद होगा कि कुछ लोग अपने लिखे हुए दस्तावेज की शर्त के साथ छोड़कर जाते हैं कि उन्हें उनके मरने के बाद जारी किया जाए, या कि बीस बरस बाद जारी किया जाए। लोगों के मन में ताजा इतिहास की ईमानदारी के लिए कोई बर्दाश्त नहीं रहता, आज तो भारत में बनने वाली फिल्मों में किसी राजा या रानी के जिक्र को लेकर बवाल खड़ा हो जाता है कि उनमें ऐतिहासिक सच्चाई को तोड़ा-मरोड़ा गया है। इसलिए वेंकैया नायडू की बात अच्छी होते हुए भी इस देश के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि इस देश ने सच लिखने, कहने, और सुनने का हक खो दिया है। अब तो इस देश में बिल्कुल पुख्ता और निर्विवाद इतिहास को भी क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड की लिखावट की तरह मिटाना शुरू हो गया है, और संग्रहालयों पर हमले होने लगे हैं, दस्तावेजों को जलाया जाने लगा है, और इतिहासकारों को पीटा जाने लगा है। ऐसा देश बच्चों को कहां से लाकर सच पढ़ाएगा? जर्मनी के हिटलर के इतिहास, या कि अमरीका के अश्वेतों के इतिहास, या योरप के इतिहास को पढ़ाना ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि उसमें किताबों को लिखने वालों को मारने के लिए किसी अमरीकी या यूरोपियन की आत्मा नहीं आ सकती, और न ही उनके भक्तजन मारने के लिए आ सकते हैं। अपना खुद का इतिहास बड़ा घातक और जानलेवा साबित हो सकता है, अगर वह सच हो तो। इस देश में आज पाखंड की पूजा होती है, और हकीकत की हिकारत। ऐसे में ताजा इतिहास के सच की ज्यादा चर्चा नहीं करनी चाहिए, मतदाताओं के बीच चुनाव लडऩे जाने वाले नेता और उनकी पार्टियां शायद ही किसी सच को बर्दाश्त कर सकें।

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