लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति के लिए सामंती रेल-डिब्बा!

संपादकीय
27 जून 2017


नए राष्ट्रपति के बनने में अभी कुछ हफ्ते बाकी हैं, लेकिन रेलवे ने राष्ट्रपति के रेल सफर के लिए एक नया डिब्बा बनाने की योजना तैयार कर ली है, और सैलून कहे जाने वाले ऐसे डिब्बों को रेलवे में सबसे बड़ा ऐशोआराम माना जाता है। रेल मंत्री से लेकर रेलवे के कुछ बड़े अफसरों तक का सफर ऐसे खास डिब्बों को किसी रेलगाड़ी में जोड़कर पूरा होता है, लेकिन राष्ट्रपति के लिए बनने वाला यह डिब्बा 8 करोड़ रूपए लेगा। अभी तक जो डिब्बा चल रहा था वह 1956 से जारी था, और छह दशक के इस इतिहास में राष्ट्रपति इसमें कुल 87 बार चढ़े। अब इस डिब्बे को रिटायर कर दिया गया है, और नया डिब्बा बनाने की तैयारी चल रही है।
भारत अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गया, लेकिन सामंती गुलामी जारी है। राष्ट्रपति से लेकर बड़ी अदालतों के जजों तक, और राज्यों के राज्यपाल तक का पूरा कामकाज चापलूस और पाखंडी सामंती रीति-रिवाजों और प्रतीकों से भरा रहता है। कुछ बड़ी अदालतों में जजों के सामने जोकरों की तरह सजे हुए कर्मचारी चांदी का राजदंड लेकर चलते हैं, तो छत्तीसगढ़ जैसे राजभवन में इक्कीसवीं सदी में दरबार-हॉल बनाया जाता है। देश आजाद हुआ, तो लोकतंत्र तो आ गया, लेकिन न तो निर्वाचित राजाओं का मिजाज लोकतांत्रिक हो पाया, न ही प्रजा यह समझ पाई कि अब वह राजा है। दोनों तरफ की यह सोच मुगल और अंग्रेजकालीन यथास्थिति को जारी रखने में मददगार हुई, और राष्ट्रपति भवन या राज्यों के राज्यपाल-भवन में झंडा फहराने और उतारने के लिए, प्रमुख लोगों को सलामी देने के लिए सलामी गारद तैनात रहती है, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की पूरी फौज घोड़ों की पलटन पर सवार चलती है, मानो कोई हमला होने पर वे अपने भालों से राष्ट्रपति को बचाएंगे। यह पूरा अलोकतांत्रिक सिलसिला चारों तरफ फैलता और नीचे तक उतरता है, और बहुत से राज्यों में कमिश्नर-कलेक्टर या एसपी तक अपने अर्दली की पोशाक अलग बनवा लेते हैं। अफसर तो अफसर, उनके अर्दली भी बाकी अर्दलियों से अलग दिखने चाहिए।
देश की जनता का मोटा पैसा ऐसे दिखावे पर और सत्ता पर काबिज लोगों के घमंड को सहलाने पर खर्च होता है, और कुपोषण के शिकार इस गरीब देश की जनता के खजाने की बर्बादी बढ़ती चलती है। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार ने लालबत्तियों पर रोक लगाई, तो इससे मिली हुई छूट वाली पुलिस गाडिय़ों को अपने सामने चलाते हुए नेता और जज चलने लगे हैं। अब जज की गाड़ी पर लालबत्ती नहीं है, इसलिए सामने लालबत्ती की हकदार पुलिस गाड़ी सायरन बजाते चलती है। यह सिलसिला किसी जनहित याचिका के बिना खत्म होते नहीं दिखता है, और राष्ट्रपति के लिए नया डिब्बा बनाने की तो बात ही एक बहुत बड़ा सामंती प्रतीक है, जिसे सिरे से ही खारिज करना चाहिए।
लोकतंत्र के खिलाफ जितने प्रतीक रहते हैं, उनका जमकर सार्वजनिक विरोध होना चाहिए, और सत्ता पर काबिज, विशेषाधिकार से लैस लोगों को घेरकर जगह-जगह सवाल किए जाने चाहिए कि गरीबों के पैसे का ऐसा बेजा और अलोकतांत्रिक इस्तेमाल करने का हौसला उनमें आता कैसे है? यहां पर हम तीन राज्य गिनाना चाहेंगे जो कि ऐसे किसी भी पाखंड से बचे हुए हैं, पश्चिम बंगाल, केरल, और त्रिपुरा। इन तीनों ही राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार हो, उसे सादगी से रहना पड़ता है, क्योंकि इन राज्यों में जनता का राजनीतिक शिक्षण इतना है, उसमें जागरूकता इतनी है कि जनता नेताओं की खाट खड़ी कर दे। इन तीनों ही राज्यों में एक और बात एक सरीखी है कि यहां पर वामपंथी दलों की सरकार है या रही है, और वामपंथियों की सादगी के लिए जिद ऐसी है कि अपने पैसों से एक महंगा स्मार्टफोन लेकर चलने वाले अपने एक सांसद को सीपीएम ने अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल में पार्टी से निलंबित कर दिया है। इसके सांसदों को दिल्ली में जो मकान मिलते हैं, उनका आधा हिस्सा उन्हें पार्टी के कामकाज के लिए, पार्टी कार्यकर्ताओं के रूकने के लिए देना पड़ता है, और सांसद की तनख्वाह पार्टी में जमा होती है, जहां से उन्हें एक न्यूनतम गुजारा-भत्ता ही दिया जाता है। ऐसी सादगी की सोच पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की पार्टी में भी है क्योंकि जनता के बीच सादगी एक परंपरा बन गई है, और उसके खिलाफ जाकर कोई नेता या पार्टी लोकप्रियता नहीं पा सकते।
आज सोशल मीडिया जनदबाव का एक बड़ा जरिया बन गया है, और लोगों को सत्ता की ऐसी मदहोश फिजूलखर्ची के खिलाफ जमकर आवाज उठानी चाहिए, क्योंकि ऐसे खर्च रोके न गए, तो वे बढ़ते चले जाएंगे, और गरीबों के बच्चे भूखे रह जाएंगे।

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