साइकिल की शक्ल में मोदी को एक नसीहत

संपादकीय
28 जून 2017


योरप में नीदरलैंड पहुंचे हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वहां के प्रधानमंत्री ने एक साइकिल तोहफे में दी। साइकिल पर चढ़े मोदी हंसते हुए दिख रहे हैं। दुनिया के बहुत से विकसित देशों में समझदार लोग साइकिल का खूब इस्तेमाल करते हैं। लंदन शहर में रहना तो अंधाधुंध महंगा है, लेकिन वहां के लोग अधिक से अधिक इस्तेमाल बसों और भूमिगत ट्रेन का करते हैं, और साइकिल सबसे लोकप्रिय वाहन है। लंदन के एक मेयर ने पूरे शहर में साइकिलों की एक ऐसी सेवा शुरू की जिसमें लोग बड़ी मामूली सी फीस देकर महीने भर तक शहर में कहीं से भी साइकिल उठा सकते हैं, और कहीं पर भी छोड़ सकते हैं। इसके लिए बहुत पास-पास साइकिल स्टैंड बनाए गए हैं। पूरे योरप में लोग एक देश से दूसरे देश जाते हुए ट्रेन में अपनी साइकिल भी चढ़ाकर ले जाते हैं, और दूसरे देश पहुंचते ही उस पर सफर शुरू कर देते हैं। अमरीका में भी जहां बड़ी-बड़ी दानवाकार निजी कारों का चलन है, वहां कुछ समझदार प्रदेशों में लोग साइकिल भी चलाते हैं, और वहां बसों के आगे-पीछे साइकिल फंसाकर रखने का चलन है ताकि लोग लंबा सफर बस में कर सकें, और फिर अपनी साइकिल चला सकें।
भारत में सड़कों पर साइकिल चलाना खतरे से खाली नहीं रह गया है। तेज रफ्तार गाडिय़ां बढ़ती चल रही हैं, और उसके साथ-साथ इन गाडिय़ों पर सवार लोगों का अहंकार भी बढ़ते चल रहा है। इंजन की ताकत को लोग अपनी खुद की ताकत मानकर अपने अलावा सड़क पर हर किसी को रौंदते-कुचलते चलना चाहते हैं। ऐसे में खेल के मकसद से, या कि फैशन के तौर पर तो भारत में लोग साइकिल चला लेते हैं, लेकिन बाकी जगहों पर इसका चलन घटते चल रहा है। इसकी एक दूसरी वजह यह भी है कि लोगों की आर्थिक स्थिति पहले से थोड़ी सुधरी है, और पिछले दो दशक में लोग मोटरसाइकिलों पर दूर-दूर तक जाकर काम करने लगे हैं। पेट्रोल तो खर्च होता है, लेकिन लोगों के बेहतर रोजगार की, बेहतर मेहनताने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं, जो कि साइकिल पर चलते हुए नहीं हो सकता था।
लेकिन साइकिल को लेकर सरकारों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती क्योंकि सरकार में बैठे तमाम लोग बड़ी-बड़ी मुफ्त की सरकारी गाडिय़ों पर चलते हैं, और साइकिल से देश के होने वाले फायदे की उन्हें फिक्र नहीं रहती। अपनी सेहत के लिए सत्तारूढ़ लोग घर के एयरकंडीशंड कमरों में साइकिल चला लेते हैं, और सड़कों का खतरा नहीं उठाते। ऐसे में इस देश को यह समझने की जरूरत है कि इस रफ्तार से अगर गाडिय़ों का प्रदूषण सड़कों पर रहा, तो सरकार का जनता के इलाज पर खर्च बढ़ता चला जाएगा, और सांस से जुड़ी बीमारियां इतनी बढ़ जाएंगी कि लोग शहरों में रह नहीं पाएंगे। आज भी लोग दिल्ली जैसे शहर को प्रदूषण की वजह से छोड़ रहे हैं। भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों को शहरी सड़कों से गाडिय़ों को घटाने के बारे में तेजी से सोचना चाहिए, और इसके लिए न सिर्फ प्रमुख मार्गों पर सार्वजनिक परिवहन शुरू करना पड़ेगा, बल्कि शहरों के बाकी हिस्सों को भी ऐसे बस-मेट्रो रास्तों से जोडऩा होगा ताकि लोग निजी गाडिय़ों को लेकर चलने से बच सकें। जिस दिन भारत की सड़कों पर ऐसी निजी गाडिय़ां कम होंगी, उसी दिन लोग साइकिलों का इस्तेमाल कर सकेंगे। आज लोग महज कसरत या फैशन, या खेल के लिए भारत में साइकिल चला लेते हैं, बाकी जान का जोखिम उठाकर कोई ऐसा करना नहीं चाहते। भारत के प्रधानमंत्री को योरप से मिला यह तोहफा भारत की आंखें खोलने वाला साबित होने चाहिए और प्रधानमंत्री वहां से यह जागरूकता सीख-समझकर आए होंगे तो यह भारत के हित में होगा।

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