भीड़ की हिंसा पर प्रधानमंत्री का बयान, बहुत देर से, बहुत बेअसर

संपादकीय
29 जून 2017


कल दिल्ली सहित देश के दर्जनों शहरों में हजारों लोगों ने एक आंदोलन किया कि यह हिंसा उनके नाम पर न हो। यह एक प्रतीकात्मक नारा था जो कि बहुसंख्यक हिन्दुओं को यह कह रहा था कि वे गाय के नाम पर या किसी और नाम पर दूसरे धर्मों के लोगों को, या कि हिन्दुओं में ही दलितों को जिस तरह से मार रहे हैं, उसे बाकी हिन्दुओं का समर्थन हासिल नहीं है। नॉट इन माई नेम, इस नारे के साथ सोशल मीडिया पर भी पिछले कुछ दिनों से यह अभियान चल रहा है, और कल यह सड़कों पर उतरा। पिछले कुछ महीनों में लगातार सड़कों पर गौआतंकियों की भीड़ लोगों को शक में पीट-पीटकर मार रही है, या कि किसी सार्वजनिक विवाद में किसी को महज इसलिए मार डाला जा रहा है कि वह मुसलमान है, तो ऐसी हिंसा पर देश के समझदार लोग बहुत बुरी विचलित चल रहे हैं।
अब यह तो पता नहीं कि कल के इस गैरचुनावी, गैरराजनीतिक, सर्वदलीय-सर्वधर्म आंदोलन का असर हुआ, या कि अहमदाबाद में गांधी के साबरमती आश्रम में जाने का, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीड़ के द्वारा हो रही हिंसा पर अपनी तकलीफ जाहिर करते हुए नाराजगी भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि गाय की रक्षा, गाय की भक्ति गांधी-विनोबा से बढ़कर कोई नहीं कर सकता है, और देश को उसी अहिंसा के रास्ते पर चलना ही होगा। उन्होंने कहा कि गौरक्षा के नाम पर किसी इंसान को मारना क्या सही है? क्या ये गौरक्षा है कि हमें उसके नाम पर इंसान को मारने का हक मिल जाए?
प्रधानमंत्री की यह बात उस वक्त सामने आई है जब देश के बहुत से राज्यों में, और खासकर उत्तर भारत के हिन्दी राज्यों सहित कुछ और राज्यों में भी सड़कों पर जगह-जगह लोग गाय के नाम पर कत्ल कर रहे हैं इंसानों का। कहीं डेयरी चलाने वाले कारोबारी को मारा जा रहा है, तो अभी दिल्ली में ट्रेन में सीट का झगड़ा होने पर एक मुस्लिम लड़के को हिन्दू बदमाशों ने यह कहते हुए मार डाला कि यह बीफ खाने वाला है। जब पूरे देश में ऐसी सार्वजनिक हिंसा और भीड़ का इंसाफ लहू फैला चुका है, तब प्रधानमंत्री की ऐसी बातें बहुत देर से भी आई हुई हैं, और बहुत कम असर भी हैं। ऐसी बात को उनको ऐसी पहली हत्या के वक्त ही करना था, और साबरमती पहुंचने के पहले ही करना था। उन्हें तो नेहरू की तरह देश के मुख्यमंत्रियों को चि_ी लिखकर ऐसी हिंसा के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने को कहना था, और अपनी पार्टी या अपने सहयोगी संगठनों को सार्वजनिक रूप से कहना था कि उनके कोई मेंबर अगर ऐसी हिंसा करते हैं तो उन्हें जिंदगी भर के लिए बेदखल कर दिया जाए।
बहुत सी बातों का असर वक्त गुजर जाने के बाद खत्म हो जाता है। जब देश में साम्प्रदायिक हिंसा बहुसंख्यक तबके के बुनियादी हक की तरह इस्तेमाल होने लगी हो, तो इन बरसों में प्रधानमंत्री के एक-दो ऐसे दार्शनिक बयान कुछ वैसे ही हैं जैसे कि मुर्दे को दवा देना। दवा देना भी हो गया, और उसके इस्तेमाल का वक्त भी निकल गया। अगर नरेन्द्र मोदी गंभीरता से अपने ओहदे की जिम्मेदारी पूरी करना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी लंबी-लंबी चुप्पी छोड़कर ऐसी हिंसा के वक्त तुरंत ही कार्रवाई करनी होगी, अपनी पार्टी की सरकारों को हुक्म देना होगा, दूसरी पार्टी की राज्य सरकारों को सलाह देनी होगी, और इस सिलसिले को थामना होगा। आज गाय बचाने के नाम पर किसी को भी मार डालने का एक अलिखित लायसेंस लेकर हिंसक मुजरिम घूम रहे हैं, और जगह-जगह साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं। प्रधानमंत्री को यह भी देखना होगा कि उनकी पार्टी के कौन से नेता, किस सहयोगी संगठन के कौन से नेता ऐसे जुर्म को, ऐसी हिंसा को, ऐसी हत्याओं को सही करार देने का काम कर रहे हैं। इसके लिए तो उन्हें किसी अदालती कार्रवाई की जरूरत भी नहीं है।
भारत में धर्म और गाय के नाम पर नफरत का सैलाब फैलते चल रहा है, और उसकी लहरें अधिक ऊपर तक उठ रही हैं, और देश के सद्भाव को डुबाने पर आमादा हैं। प्रधानमंत्री को अगर इस बात को कहने के लिए साबरमती जाना पड़ता है, तो उन्हें हर हफ्ते वहां चले जाना चाहिए, क्योंकि आने वाले महीनों में गुजरात के चुनाव भी हैं, और उनका वहां आना-जाना लगा ही रहेगा। फिलहाल ऐसी हिंसा के बाद उनकी महीनों की चुप्पी चीख-चीखकर बोलती है, और उन्हें इसके बारे में सोचना चाहिए। 

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