खास लोगों की मनमानीतले कुचलते हुए आम लोग...

संपादकीय
3 जून 2017


आज एक साथ कुछ छोटी-छोटी खबरें इस तरह सामने आई हैं कि उन्हें मिलाकर उन पर सोचना-विचारना जरूरी है। दिल्ली में एक केन्द्रीय मंत्री की एमआरआई जांच होनी थी, और उस कमरे में धातु की एक अंगूठी भी पहनकर नहीं जाया जा सकता क्योंकि करोड़ों की इस मशीन में बहुत अधिक शक्तिशाली चुम्बक रहते हैं जो कि लोहे की किसी भी चीज को खींच लेते हैं। यहां पर मंत्री का गार्ड पिस्तौल सहित घुस गया, और मशीन ने उसकी पिस्तौल खींच ली, और मंत्री हड़बड़ाकर बाहर भागे, पांच करोड़ रूपए की मशीन खराब हो गई। एक दूसरी खबर है कि गंगा की सफाई के लिए उत्तरप्रदेश के एक मंत्री बोट पर सवार गंगा में थे, और वे सफाई की बात कर रहे थे, और उनके साथ चल रहीं भाजपा महिला सांसद ने पानी पीकर प्लास्टिक की खाली बोतल गंगा में ही फेंक दी, और यह पूरा नजारा कैमरों पर कैद हो गया। यही भाजपा सांसद प्रियंका सिंह दिल्ली एयरपोर्ट पर चाकू लेकर विमान में चढऩे पर अड़ी रहीं, उन्होंने सुरक्षा कर्मचारियों पर पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाने की धमकी भी दी, और यह हंगामा चलते रहा।
इसके अलावा एक खबर सेना मुख्यालय से है जहां सीबीआई ने ट्रांसफर-पोस्टिंग में दलाली-रिश्वतखोरी के एक पूरे रैकेट का भांडाफोड़ किया है, और एक कर्नल सहित उसके दलाल को गिरफ्तार किया है। सेना में कर्नल का पद बड़े सम्मान का माना जाता है, और इस घटना से यह साफ होता है कि सेना भ्रष्टाचार से परे की कोई पवित्र संस्था नहीं है, और वह लोकतंत्र में किसी भी बाकी सरकारी या संवैधानिक संस्था की तरह ही, और उतनी ही बुरी या भ्रष्ट हो सकती है, और इसी वजह से उसे भी लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए, न कि उसके कामों पर सवाल उठाने को देशद्रोह मान लेना चाहिए।
भारत में दिक्कत यह है कि चाहे संसद हो या विधानसभा, सरकारी ओहदा हो या कि अदालती, फौज हो या खतरे उठाकर काम करने वाला कोई और तबका, इन सबको कई तरह के विशेषाधिकारों की हसरत रहती है, और इनमें से हर कोई जवाबदेही से बचना भी चाहते हैं। मध्यप्रदेश में इंदौर के पास महू नाम की जगह पर फौज का एक बड़ा संस्थान है। वहां आने वाले फौजी लोग पास की बस्तियों में जाकर हिंसा करने, और थाने में घुसकर पुलिस को पीटने के लिए जाने जाते हैं। हर बरस ऐसी घटनाएं होती हैं, लेकिन चूंकि मामला फौज से जुड़ा रहता है, उसे राज्य सरकार और केन्द्र सरकार मिलकर रफा-दफा कर देते हैं। बहुत से मौकों पर रेलवे स्टेशनों से ऐसी खबरें आती हैं कि मुसाफिरों को फेंककर फौजी डिब्बों पर कब्जा करके बैठ गए। वैसे तो फौज बहुत से अच्छे काम भी करती है, लोगों की जान बचाती है, लेकिन ऐसे कामों के लिए उसे तनख्वाह भी मिलती है, और हर सरकारी कर्मचारी, या हर नागरिक को अच्छा काम करना ही चाहिए। सवाल उठता है कि जब विशेषाधिकार प्राप्त लोग बुरे काम करने लगते हैं, आम लोगों पर हमले करने लगते हैं, आम लोगों को खतरे में डालते हुए अपने लिए खास हक मांगने लगते हैं, तो उन्हें क्यो बर्दाश्त किया जाए? छत्तीसगढ़ में हमने कई बार जजों के परिवारों के लिए तरह-तरह के इंतजाम होते देखे हैं, अभी साल-दो साल के भीतर ही एक ऐसी चिट्ठी आई थी जिसमें अदालत के एक अफसर ने जज के परिवार के लिए ट्रेन में सीट न मिल पाने पर रेलवे अफसरों को धमकी दी थी, और बाद में मीडिया में आने पर उसे वापिस लेना पड़ा।
आम और खास का फर्क  लोकतंत्र की बुनियादी सोच को खत्म करता है। आम तो आम ही हैं, और जैसा कि किसी ने सोशल मीडिया पर लिखा है, आम आदमी को आम इसलिए कहा जाता है कि जरूरत पडऩे पर उसे चूसा जा सके, और गुठली की तरह फेंका जा सके। भारतीय लोकतंत्र में खास दर्जा पाए हुए लोगों का जगह-जगह भांडाफोड़ होना चाहिए, और लोकतंत्र की बुनियादी सोच को फिर कायम करना चाहिए।

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