मनमोहन सिंह की रखी नींव पर खड़ा जीएसटी आज आधी रात से

संपादकीय
30 जून 2017


आजादी के बाद का देश का सबसे बड़ा टैक्स कानून, जीएसटी आज आधी रात से लागू होने जा रहा है, और केन्द्र सरकार संसद में इसे लेकर कुछ उसी तरह का जलसा कर रही है जैसा कि देश की आजादी की घोषणा के लिए नेहरू की मौजूदगी में इसी संसद में हुआ था। उस ऐतिहासिक मौके की नकल या बराबरी करने की नीयत का आरोप लगाते हुए कांग्रेस और वामपंथी जीएसटी समारोह का विरोध कर रहे हैं, लेकिन पारे की तरह हिलते-डुलते नीतीश कुमार की पार्टी इस समारोह में शामिल होने जा रही है। मजे की बात यह है कि इस जीएसटी के लिए पिछली मनमोहन सिंह सरकार ने बरसों तक कोशिश की थी, और उस वक्त भाजपा की सारी प्रदेश सरकारें इसके खिलाफ कमर कसकर टूट पड़ी थीं, डटी हुई थीं, और इसका अंधा विरोध किया था। वक्त बदला और भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार बनी, और उसके बाद जीएसटी को लागू करवाने के लिए इस सरकार ने खूब खून-पसीना एक किया, और विपक्ष के सहयोग से यह कानून बन पाया, और राज्यों की विधानसभाओं ने भी इसे पास किया।
जीएसटी आज से एक हकीकत बनने जा रहा है, और कल सुबह से देश का कारोबार बुरी तरह उथल-पुथल झेलने वाला है। मजे की बात यह है कि इसके लिए न सरकारी विभाग तैयार हैं, न कारोबार तैयार है, न उद्योग तैयार हैं, न ही टैक्स सलाहकार अभी इसे पूरी तरह समझ पाए हैं, कम्प्यूटर पर इसका सॉफ्टवेयर पूरी तरह तैयार नहीं है, बाजार में यह सॉफ्टवेयर मिल नहीं रहा है, लोगों के पास कम्प्यूटर लगे नहीं हैं, खुद सरकार का अंदाज है कि इससे एक लाख नए रोजगार पैदा होंगे, और ये एक लाख लोग भी न पहचाने गए हैं, न रखे गए हैं, और न ही प्रशिक्षण पाए हुए हैं। लेकिन मोदी सरकार की किस्मत बुलंद है कि बिना किसी तैयारी के इस देश पर नोटबंदी का हमला कर दिया गया था, और पूरे देश ने उसे देशप्रेम की भावना से झेल लिया। हो सकता है कि जीएसटी से आने वाली दिक्कतें की जनता और बाजार दोनों ही बर्दाश्त कर लें, और फिर मोदी सरकार को जिता दें, लेकिन आने वाले दिन कई तरह की अभूतपूर्व दिक्कतों के रहने वाले हैं, इतना तो तय है।
दरअसल पिछली पौन सदी की आजादी में इस देश ने दो नंबर की अर्थव्यवस्था, सामानों की कच्ची खरीदी, बिना बिल का धंधा, और टैक्स चोरी को इतना देखा हुआ है कि अब एकाएक देश के दसियों लाख कारोबारी किस तरह सब कुछ एक नंबर में करने लगेंगे, यह एक बड़ी पहेली है। दूसरी तरफ जनता भी टैक्स चोरी का सामान खरीदने की इतनी आदी हो चुकी थी कि अब वह रातों-रात टैक्स देने के लिए कैसे तैयार होगी, यह समझना भी मुश्किल है। दूसरी तरफ जो छोटे या मझले कारोबारी जीएसटी के दायरे में आएंगे, उनकी दुकानों में कम्प्यूटर लगाने की जगह भी नहीं है, उनके पास ऐसे प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं हैं, और व्यापार की उनकी संस्कृति भी सब कुछ बही-खातों में करने की नहीं रही है। नतीजा यह है कि आज देश में बहुत कम लोग जीएसटी के लिए तैयार हैं। और जैसा कि केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कहा है, कि अब देश के लोग कच्चा-पक्का भूल जाएं, तो यह बदलाव छोटा नहीं है। कारोबार की चर्बी पर इससे बड़ा जोर पड़ेगा, और जहां लोगों ने बड़े-बड़े कारोबार महज टैक्स चोरी के मुनाफे से खड़े किए हैं, वे लोग अब रातों-रात टैक्स के साथ कैसे काम करेंगे, कैसे वह कमाई जारी रह पाएगी, यह अंदाज लगाना अभी आसान नहीं है।
केन्द्र सरकार ने एक लाख नए रोजगार की बात तो कही है, लेकिन अगर बहुत सारे कारोबार टैक्स चोरी बंद होने से डूब जाएंगे, तो उनमें लगे हुए छोटे-छोटे कर्मचारी और मजदूर कहां जाएंगे? वे टैक्स चोरी तो नहीं करते थे, लेकिन टैक्स चोरी वाले कारोबार में नौकरी-मजदूरी जरूर करते थे। अब अगर कम्प्यूटर-जानकार कर्मचारियों की जरूरत बढ़ेगी, तो हो सकता है कि दूसरी तरह के कुछ कर्मचारियों की जरूरत कम भी होगी, जो कारोबार बंद होंगे, वहां पर छंटनी भी होगी। इसके अलावा जीएसटी से महंगे होने वाले सामानों का ग्राहकों पर कितना असर पड़ेगा यह भी अभी पूरी तरह साफ नहीं है। इसलिए अभी हम अपनी कोई अटकल यहां पर देने के बजाय इंतजार करेंगे कि आने वाले महीनों में सरकार, कारोबार, और जनता पर जीएसटी का कैसा असर पड़ेगा। टैक्स चोरी जारी रहे, इसकी हिमायत कोई जिम्मेदार नहीं कर सकते। अगर इससे टैक्स चोरी बंद होती है, तो हो सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था इससे सुधरे, और अगर जनता पर कोई बड़ा बोझ नहीं पड़ता है, तो ऐसा आधुनिकीकरण शायद अच्छा साबित हो।

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