पर्यावरण बर्बादी के जिम्मेदार, कुछ अनदेखे पहलू

संपादकीय
5 जून 2017


हर बरस कुछ ऐसे दिन आते हैं जब किसी मुद्दे पर सोचा जाता है। हिन्दुस्तान में साल में कम से कम दो दिन आजादी के बारे में सोचा जाता है, एक दिन महिलाओं के हक के बारे में सोचा जाता है, और साल में एक दिन पर्यावरण के बारे में भी सोचा जाता है। दिक्कत यह है कि लोग पर्यावरण को या तो जंगलों से और पेड़ों से जोड़कर देखते हैं, या फिर वे प्रदूषण से इसका रिश्ता पाते हैं। हकीकत यह है कि इन दोनों से परे भी पर्यावरण को बचाने, या कि उसकी बर्बादी की एक बहुत बड़ी वजह खर्चीली जीवनशैली है जिसमें लोग बहुत से सामानों का इस्तेमाल करते हैं, और उनको बनाते हुए धरती पर कार्बन बढ़ते चलता है। अमरीका में वैसे तो मशीनें कम धुआं छोड़ती हैं, वह प्रदूषण फैलाने वाले काम दूसरे गरीब देशों में करवाता है, लेकिन फिर भी वह अगर पर्यावरण की बर्बादी के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार देश माना जाता है, तो उसकी वजह यह है कि वहां के लोगों की जिंदगी में सामानों की खपत इतनी अधिक है कि उससे सामान बनाते हुए प्रदूषण होता है, और फिर कचरे के ढेर से धरती पर बोझ बढ़ता है।
हम पर्यावरण दिवस के मौके पर जब यह देखते हैं कि लोग अपनी कमाई पर फिजूलखर्ची करके बहुत से सामानों का बोझ धरती पर बढ़ाते हैं, तो उनमें जागरूकता की कमी दिखती है। लेकिन दूसरी तरफ जब जनता के पैसों पर यही काम करने वाले नेता या अफसर, या कि सरकारी सहूलियतें पाने वाले दूसरे लोग यह काम करते हैं, तो एक तरफ वे जनता की छाती पर बोझ बनते हैं, और ऐसा करते हुए वे धरती पर बोझ बढ़ाते भी हैं। हमारा ख्याल है कि अगर सरकारों में बैठे हुए लोग अपनी खुद की जीवनशैली में किफायत बरतें, बंगले और दफ्तर छोटे करें, तो उनमें बिजली की खपत भी घट जाएगी, पानी की खपत भी घट जाएगी, और उनको बनाते हुए सामान की खपत घटेगी, तो धरती पर बोझ भी घटेगा। पर्यावरण को किफायत के नजरिए से देखना अधिक जरूरी है क्योंकि पेड़ों का कटना, या कि लगना तो समझ में आता है, लेकिन यह बात आमतौर पर समझ में नहीं आती कि बड़े-बड़े सरकारी निर्माण किस तरह लगातार पर्यावरण का नुकसान करते हैं।
इस मौके पर मीडिया में लगातार ऐसी खबरें आती हैं कि कारखाने कितना प्रदूषण बढ़ा रहे हैं, जंगल विभाग के लगाए हुए पेड़ किस तरह सूखकर गायब हो चुके हैं, और नदियों में कितना प्रदूषण हो चुका है। लेकिन इसके अलावा लोगों के बदन के भीतर कीटनाशकों और रसायनों का एक ऐसा प्रदूषण बढ़ते चल रहा है जो कि लोगों के जींस के रास्ते अगली पीढ़ी तक चले जाना तय है। इसलिए पर्यावरण दिवस के मौके पर लोगों को गिने-चुने और चर्चित पहलुओं से परे ऐसे दूसरे मुद्दों को भी देखना चाहिए जिससे कि धरती को बचाया जा सकता है। हिन्दुस्तान में गांधी जैसा इंसान हुआ जिसने कि कम से कम सामान इस्तेमाल करके किफायत का एक ऐसा उदाहरण सामने रखा जो कि पूरी दुनिया को बचा सकता है। लेकिन आज कारोबार से लेकर सरकार तक, हर किसी की दिलचस्पी इसमें रहती है कि खर्च कैसे अधिक से अधिक किया जाए क्योंकि उसी में अधिक से अधिक कमाई भी रहती है। इसलिए आज धरती का बचना या कि अपने खुद के लिए अधिक पैसों का बचना, इन दोनों के बीच एक बड़ा टकराव चल रहा है।

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