आतंकियों को कफन-दफन का हक न देना गलत होगा

संपादकीय
6 जून 2017


लंदन में आतंकी हमला करने वाले मुस्लिम नौजवानों के कफन-दफन के वक्त धार्मिक संस्कार करवाने से वहां के 130 इमाम मना कर चुके हैं। जाहिर है कि उनके मन में या तो ब्रिटिश समाज के भीतर नाराजगी का डर होगा, या कि वे सचमुच ही ऐसी आतंकी वारदात करने वालों के खिलाफ होंगे। लेकिन सवाल यह है कि चाहे कोई आतंकी ही क्यों न हो, क्या उनके धार्मिक या कानूनी अधिकार इस तरह खत्म करना ठीक है? और ऐसे मौके कई दूसरी जगहों पर भी आते हैं, जब बच्चों से बलात्कार की भयानक कहानियों के बीच जब आरोपियों को अदालत में पेश किया जाता है, तब भी ऐसी बात उठती है कि कोई वकील उनका केस ना ले। कई बार यह मांग भी उठती है कि बेकसूरों की हत्या करने वाले नक्सलियों को इलाज क्यों दिया जाए?
लेकिन यह बात समझनी चाहिए कि आतंकियों या दूसरी किस्म के मुजरिमों की सोच तो अलोकतांत्रिक रहती है, तभी वे ऐसे जुर्म करते हैं, लेकिन उनके साथ अस्पताल, कब्रिस्तान, या अदालत ने बर्ताव करने वाले लोग अगर लोकतांत्रिक हैं, तो उन्हें मुजरिमों को भी उनके नागरिक अधिकार देने से मना नहीं करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह याद होगा कि कुछ अरसा पहले जब बुरी तरह से घायल एक नक्सली को बचाने की नौबत आई, तो बस्तर में तैनात पुलिस के एक हैलिकॉप्टर से उसे रायपुर लाया गया। और वह नक्सली एक ऐसी मुठभेड़ में ही घायल हुआ था, जिसमें शायद कई सुरक्षाकर्मी मारे गए थे, या घायल हुए थे। ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें पुलिस जवानों ने घायल मुजरिमों या नक्सलियों को अस्पताल में खून दिया है। अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टरों तो वहां पहुंचने वाले सभी तरह के जख्मी मुजरिमों का इलाज भी करते हैं, और जरूरत पडऩे पर तुरंत अपना खून भी देते हैं।
लोगों को यह समझना चाहिए कि सभ्य समाज, लोकतांत्रिक समाज किसी को अपने अधिकार खोने को नहीं कहता। इसलिए मीडिया को भी यह चाहिए कि वह किसी टकराव या नाराजगी की वजह से, या कि विरोध करने के लिए किसी व्यक्ति या किसी संगठन की खबरों का बहिष्कार न करे। ऐसे संगठन तो मीडिया के खिलाफ अलोकतांत्रिक काम कर सकते हैं, लेकिन मीडिया चूंकि लोकतंत्र पर भरोसा रखता है, इसलिए उसे अपने पाठकों के जानने के हक का सम्मान करते हुए, और लोगों के बोलने के हक का सम्मान करने के लिए किसी भी तरह के बहिष्कार से बचना चाहिए। आतंकी को मजहबी कफन-दफन न मिले, यह बेइंसाफी होगी, क्योंकि मजहब और धर्म तो बहुत सी जगहों पर आतंक को बढ़ावा देने का काम करते ही रहते हैं, धर्म स्थल मुजरिमों से अधिक आबाद रहते हैं, शरीफों से कम। इसलिए एक भले नागरिक और बुरे नागरिक के बुनियादी अधिकारों में फर्क करना ठीक नहीं है।

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