बुलबुले सी बड़ी हो रही डिजिटल व्यवस्था, बचाव के इंतजाम नहीं

संपादकीय
8 जून 2017


खाड़ी के देशों में अभी एकाएक एक बहुत छोटे और बहुत संपन्न देश कतर के खिलाफ चार देशों ने आतंक का आरोप लगाते हुए उससे रिश्ता तोड़ दिया। और इस बात को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की सऊदी अरब की यात्रा और वहां पर मुस्लिम देशों के शासकों से की गई बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी तरफ अमरीका के कुछ जानकार लोगों का, और वहां की खुफिया एजेंसी का यह मानना है कि ट्रंप ने कतर को आतंक-समर्थक और सहयोगी मानने की जो धारणा बनाई, वह एक ऐसी झूठी खबर पर आधारित थी जो कि रूसी हैकरों ने कतर की एक समाचार-एजेंसी की वेबसाईट पर पोस्ट की थी। इस खबर में कतर के शासकों के कुछ ऐसे बयान का हवाला दिया गया था, जिनका उन लोगों ने तुरंत ही खंडन कर दिया था। लेकिन तब तक नुकसान तो हो ही चुका था, और जिन लोगों को झूठे सुबूत गढ़कर दूसरे देशों पर हमले करने की आदत है, उनको तो मानो यह एक सुबूत मिल गया था। अब लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि इराक में सामूहिक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने की खुफिया जानकारी का दावा करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जिस तरह संयुक्त राष्ट्र तक की हेठी करते हुए हमला किया था, और लाखों लोगों को मार डाला था, वह पूरा का पूरा मामला झूठ पर टिका हुआ था, और इराक में रासायनिक हथियार तो दूर कोई रसायन तक नहीं मिले थे। बाद में अमरीकी हमले में साथ देने वाले दूसरे देशों ने भी यह महसूस किया था कि उन्हें झांसा देकर उनको साथ लिया गया था, और एक बेगुनाह देश पर हमला किया गया था।
अभी दुनिया भर में यह माना जा रहा है कि जिस तरह रूसी हैकरों ने पिछले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में एक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के ईमेल में घुसपैठ करके वहां की जानकारी उनके प्रतिद्वंद्वी डोनल्ड ट्रंप को दी थी, और फिर ऐसा ही खतरा फ्रांस और जर्मनी के चुनाव में भी सामने आया, तो इससे यह बात जाहिर होती है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में भी जनमत को तोडऩे-मरोडऩे के लिए हैकर एक हमलावर की तरह काम करते हैं, और एक देश दूसरे देश में चुनाव को तय करने, उसे किसी तरफ मोडऩे का काम भी कर सकता है। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि दुनिया अभी बड़े छोटे-छोटे साइबर हमलों के सामने बिल्कुल बेबस साबित हो रही है। अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं जब एक साइबर हमले में डेढ़ सौ देशों के करोड़ों कम्प्यूटरों को तबाह कर दिया गया था, और ब्रिटेन जैसे मजबूत देश में सरकारी इलाज थम गया था। इसके बाद कुछ दिनों के भीतर ही ब्रिटिश एयरवेज के कम्प्यूटरों में अंदरुनी खामी आई, और कई दिनों तक इस एयरलाइंस का काम ठप्प हो गया, और दसियों लाख लोगों की आवाजाही थम गई।
भारत आज पूरी तरह डिजिटल होने के लिए दौड़ रहा है, और खासी तेजी से दौड़ रहा है। यहां पर अगर बैंकों और आधार कार्ड के डेटाबेस में कोई घुसपैठ करे, तो हो सकता है हिन्दुस्तान की जिंदगी थम ही जाए। यह सिलसिला इस देश के रेल रिजर्वेशन तक भी जा सकता है, और विमान सेवाओं तक भी। इससे एक झटके में इंटरनेट और मोबाइल फोन भी ठप्प हो सकते हैं, और लोग अपने पैसे न निकाल पाने की वजह से भूखे मरने की नौबत में आ सकते हैं। आज ही एक खबर है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार अंतरराष्ट्रीय तनाव और उठा-पटक फिर से चरम पर है। तृतीय विश्वयुद्ध का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि इस बार विश्वयुद्ध ऑनलाइन लड़ा जाएगा, जिसे साइबर युद्ध की संज्ञा दी जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि यह साइबर विश्वयुद्ध पहले हो चुके दो विश्वयुद्धों से भी ज्यादा घातक साबित हो सकता है। इसमें हमलावर की पहचान कर पाना भी आसान नहीं है। महज अंदाजा लगाकर ही किसी पर आरोप लगाया जा सकता है। ऐसे में अमरीका समेत दुनिया के शक्तिशाली देशों के परमाणु हथियार भी धरे के धरे रह जाएंगे और हैकर दुनिया को तबाह कर देंगे। वर्तमान में कतर संकट और खाड़ी क्षेत्र में उपजे तनाव के लिए हैकिंग को जिम्मेदार बताया जा रहा है।
ऊपर की इन बातों को देखें तो लगता है कि देशों के बीच दुश्मनी करवाने, एक-दूसरे पर हमले करवाने, एक-दूसरे को जंग में उलझाने, एक-दूसरे की बैंकिंग को ठप्प करने जैसे कितने ही काम ऐसे हो सकते हैं जिनमें एक भी गोली न चले, और करोड़ों लोगों की जिंदगी थम जाए, उनकी अपने सरकार पर से उम्मीद खत्म हो जाए, और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने में लंबा वक्त लग जाए।
दुनिया में डिजिटल व्यवस्था एक फुलाए जा रहे बुलबुले की तरह बड़ी होती जा रही है, लेकिन इस बुलबुले को बचाकर रखने का इंतजाम कम से कम हिन्दुस्तान जैसे देश में तो नहीं दिखता है। दरअसल जब डिजिटल और साइबर ढांचा खड़ा किया जाता है, तो उसके साथ-साथ सावधानी के साधन भी खड़े किए जाने चाहिए, जो कि आज कहीं दिख नहीं रहे हैं।

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