जेएनयू में फौजी टैंक की सोच हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद

संपादकीय
25 जुलाई 2017


समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र जैसे बहुत से विषयों पर अपनी एक मौलिक और उदार सोच के साथ ऊंचे दर्जे की पढ़ाई और शोध कार्य के लिए विश्वविख्यात जेएनयू को उग्र राष्ट्रवाद का निशाना बनाया जा रहा है। एनडीए सरकार के आने के बाद वहां कुलपति बने जगदेश कुमार अब चाहते हैं कि विश्वविद्यालय कैंपस में भारतीय फौज का कोई रिटायर्ड युद्धक टैंक लाकर खड़ा किया जाए ताकि वहां के छात्रों के बीच फौज के लिए पे्रम उपज सके। जगदेश कुमार पिछले कुछ अरसे से वामपंथी रूझान वाले छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों से लगातार टकराव लिए हुए चल रहे हैं, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जेएनयू की पहचान एक वामपंथी रूझान वाले शिक्षा केंद्र के रूप में बनी हुई है। वहां के छात्र-छात्राओं को बदनाम करने के लिए दो बरस पहले छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को झूठे मामलों में झूठे वीडियो सुबूत गढ़कर फंसाया गया था, लेकिन ऐसी साजिश करने वाले दिल्ली पुलिस अदालत में खड़ी नहीं हो पाई। लेकिन तब तक पूरे देश में वामपंथ-विरोधियों ने कन्हैया कुमार और जेएनयू को देशद्रोही करार देने का अभियान छेड़ दिया था, जो कि अब तक जारी है, और विश्वविद्यालय ने फौजी टैंक खड़ा करने की सोच इस अभियान का ही एक हिस्सा है।
जेएनयू किसी भी कार्रवाई के लिए पुलिस और दूसरी एजेंसियों के सामने उतना ही खुला हुआ है जितना कि देश का कोई भी दूसरा विश्वविद्यालय। ऐसे में एक उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान को मौलिक सोच से परे करने का काम भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को भी चौपट करेगा, कर रहा है, क्योंकि देश के बाहर चाहे आईआईटी-आईआईएम के लोगों को रोजगार अधिक मिलता हो, सामाजिक विज्ञान से जुड़े तमाम पहलुओं पर देश की साख जेएनयू से ही है। अब वामपंथ-विरोधियों को यह भी सोचना चाहिए कि पूरी दुनिया में कहीं भी मौलिक सोच के लिए लोगों को वामपंथियों की ओर ही क्यों देखना पड़ता है? दक्षिणपंथियों में स्तर के विद्वान, लेखक, या प्राध्यापक क्यों नहीं पनप पाते हैं? इस आत्ममंथन से परे अगर देश के शिक्षा संस्थानों का हिंदूकरण या हिंदुत्वकरण करने, उन्हें राष्ट्रवाद के कारखाने बना देने का काम अगर किया जाएगा, तो हिंदुस्तानियों की पूरी पीढ़ी ही इसका नुकसान झेलेगी।
हम छत्तीसगढ़ में ही बनाए गए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को देखते हैं कि पिछले कई बरस से इस विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के बजाय राष्ट्रवादिता का अभियान चलते आया है, और उसी का नतीजा है कि देश के तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकारों के नाम पर बहुत ही औसत दर्जे के लोगों को बुला-बुलाकर गैरमीडिया मुद्दों पर राष्ट्रवादी कार्यक्रम करवाए गए, और यहां से मीडिया के पेशे में बहुत ही कम लोग आए पाए। नतीजा यह निकला कि इतने बरस गुजर जाने के बाद भी यह विश्वविद्यालय महज कुछ सौ छात्र-छात्राओं तक सीमित है, और राष्ट्रवादी इसे अपने रंग में रंगने के एक कारखाने की तरह चला रहे हैं जिसका मीडिया में योगदान शून्य है।
हर सत्तारूढ़ पार्टी की अपनी विचारधारा के मुताबिक बहुत से ओहदो को भरने का विशेषाधिकार रहता है। लेकिन न तो लोगों का कोई भला हो, और न ही संस्थान की साख बची रहे, ऐसे मनोनयन लोगों को पांच बरस की सहूलियत और मर्जी के लोगों को बाकी नौकरियां देने में तो काम आ सकती है, लेकिन इन संस्थानों की खोई हुई प्रतिष्ठा लंबे समय तक वापिस नहीं आ पाएगी, और बाकी की दुनिया के विद्वान लोग भारत को हिकारत की नजर से जरूर देखेंगे। जेएनयू में टैंक खड़ा करना एक हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद की सोच है, और इसमें यह देश झुलसकर रह जाएगा।

जुर्म करने की भड़ास निकालने का मौका देने वाली रोबो-डॉल!

आजकल
24 जुलाई 2017
जैसे-जैसे विज्ञान और टेक्नालॉजी अपनी सारी तरक्की लेकर लोगों की निजी जिंदगी को सहूलियतों से भरने में जुट गए हैं, समाज के तौर-तरीके और लोगों की अपनी सोच भी सामानों के साथ बदल रही है। एक वक्त जिन लोगों के बीच ओहदों या उम्र, या रिश्तों के फासलों का लिहाज रहता था, आज वे वॉट्सऐप पर एक-दूसरे को कोई उत्तेजक तस्वीर या फिल्म भेजने में पल भर भी नहीं सोचते। एक कमरे में बैठकर लोग टीवी पर ऐसे प्रोग्राम तो देखते हुए अब एक पीढ़ी गुजार चुके हैं जिन्हें किसी वक्त दो पीढिय़ां एक साथ नहीं देख पाती थीं। अब कम ही चीजें बिल्कुल अकेले वाली रह गई हैं।
टेक्नालॉजी ने बढ़ते-बढ़ते अब मशीनी इंसान बना लिए हैं, और मशीनी मजे की जिंदगी शुरू हो गई है। आज दुनिया भर में सेक्स-डॉल्स का बाजार खुल गया है और लोग बाजार से एक पुतला लेकर आ सकते हैं जो कि बड़े जटिल कम्प्यूटर से लैस भी है, और उससे अपने हमबिस्तर साथी की तरह मजा भी ले सकते हैं। अब यह मजा बढ़ते-बढ़ते इंसान की तमाम जरूरतों को पूरा करने जा रहा है। इन जरूरतों में लोगों की अपनी सेक्स की पसंद-नापसंद का ख्याल तो रखा ही जा रहा है, लेकिन इससे परे भी कुछ ऐसी बातों का भी ख्याल रखा जा रहा है जो कि जुर्म की दर्जे में आती हैं।
अभी कल की ही खबर है कि एक ट्रू कम्पेनियन नाम की कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर जो नए सेक्स रोबो बिक्री के लिए रखे हैं, उनमें उस रोबो के मूड की सेटिंग में एक ऐसी सेटिंग भी रखी गई है जो कि उसे सेक्स में दिलचस्पी न लेने वाली बना देती है। अब ऐसी गुडिय़ा जो बर्फीली मिजाज की कही जाएगी, उसके साथ सेक्स एक किस्म से बलात्कार जैसा होगा, और इसी मकसद से यह नई सेटिंग जोड़ी गई है। इस तरह इंसान की एक सामान्य सेक्स की जरूरत को पूरा करने के बाद अब उसके असामान्य और हिंसक सेक्स को पूरा करने के लिए उसे एक ऐसी मशीनी लड़की दी जा रही है जिससे वह बलात्कार की तरह का सेक्स कर सकता है।
आज हिन्दुस्तान जैसे देश सेक्स-अपराधों के शिकार हैं, और यह सिलसिला बढ़ते ही चलते दिख रहा है। दूसरी तरफ जिन देशों में इंसानी समाज ने अपने तौर-तरीके उदार रखे हैं, और लोगों को अपनी निजी जिंदगी के शारीरिक और मानसिक फैसले तय करने का पूरा हक दिया है, वहां पर सेक्स-जुर्म घटते भी जा रहे हैं, कहीं-कहीं खत्म सरीखे भी हैं। दूसरी तरफ जापान जैसे देश में निजी जिंदगी भी मशीनों पर इस कदर टिकती जा रही है कि लोग नए भावनात्मक या शारीरिक रिश्ते बनाने से डरने और कतराने लगे हैं, और उन्हें मशीनों से रिश्ता रखना ज्यादा महफूज लगने लगा है। लोग समाज में उठना-बैठना कम करने लगे हैं, शादियां घट गई हैं, प्रेम-संबंध और सेक्स-संबंध तेजी से घटते जा रहे हैं, और ऐसे ही समाज से मशीनी सेक्स की टेक्नालॉजी निकल रही है।
कुछ बरस पहले अमरीका के एक सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय एमआईटी के वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला था कि जिस रफ्तार से मशीनी इंसान बन रहे हैं, और वे असली इंसानों के करीब आ रहे हैं, सन् 2050 तक इंसानों और मशीनों में कानूनी शादियां होने लगेंगी। अभी इस दिन को 30 से अधिक बरस बचे हैं, और इंसान ने बलात्कार के लायक रोबो भी तैयार कर लिए हैं, और इस हद तक तैयार कर लिए हैं कि वे बाजार में हैं, महज प्रयोगशाला में नहीं। अब बाजार के अपने कायदे रहते हैं, और वह दिन भी अधिक दूर नहीं है जब कम उम्र के रोबो बनते-बनते ऐसे छोटे बच्चों जैसे रोबो सेक्स के लिए बनने लगेंगे जिस पर आज कड़ी सजा है। और फिर समाज यह सोचने लगेगा कि क्या सेक्स-रोबो की सहूलियत समाज में सेक्स-अपराधों को घटा भी सकती है? मशीनें निजी सोच और सामाजिक सोच को किस तरह बदलती हैं, यह टीवी और मोबाइल फोन ने दिखा दिया है, और आगे यह सिलसिला और भी देखने मिलते रहेगा।
दो और छोटी-छोटी खबरें अभी सामने आईं, एक खबर में न्यूयार्क में एक सुरक्षा-रोबो इमारत में बने पानी के एक टैंक में गिर गया, तो पल भर में पूरी दुनिया में उसकी तस्वीरें फैल गईं कि रोबो ने खुदकुशी कर ली। अधिकतर लोगों ने इसे मान भी लिया। लेकिन इसी के आसपास एक दूसरी खबर निकलकर आई कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से विकसित रोबो या मशीनें अगर किसी समय इंसानों को मारने पर उतारू हो जाएंगे, जैसे कि फिल्मों में आज हर दिन ही देखने मिलता है, तो इंसान उन्हें कैसे रोकेंगे? कैसे उन मशीनों के दिमाग को हिंसा से दूर रखने की कोशिश हो सकेगी? एक तीसरी खबर कुछ ही दिन पहले आई कि किस तरह एक घर में पति-पत्नी के बीच कुछ हिंसक बातें हो रही थीं, और उस घर में लगे हुए एक उपकरण ने उन बातों को सुनकर हिंसा रोकने के हिसाब से पुलिस के नंबर पर खुद ही फोन लगा लिया, पुलिस वक्त पर पहुंच गई, और हिंसा को रोक दिया। अब यह बात उठ रही है कि घर के मामूली काम करने के लिए, लाईट या टीवी शुरू-बंद करने के लिए लगे ऐसे उपकरण अगर आसपास की बात सुनकर खुद फोन लगाकर पुलिस या किसी और को खबर करने लगें, तो ऐसी टेक्नालॉजी कौन-कौन सी संभावनाएं, और कौन-कौन सी आशंकाएं खड़ी करती है।
एक बार फिर जापान की एक मिसाल देना ठीक है जहां पर बाजारों में ऐसे पार्लर बने हुए हैं जिनके भीतर जाकर लोग भुगतान करके अपनी भड़ास निकाल सकते हैं। वे कुछ सामान भी खरीद सकते हैं, और एक खाली कमरे में जाकर उन सामानों को तोड़कर अपना गुस्सा उतार सकते हैं, अपनी कुंठाओं से मुक्ति पा सकते हैं। दूसरी तरफ जापान में ही ऐसी सेक्स-सेवा मौजूद है जो सेक्स-कामगारों को स्कूली पोशाक में मौजूद रखती है क्योंकि बहुत से जापानी आदमी स्कूली छात्रा को अधिक उत्तेजक पाते हैं। इस तरह आज बाजार का कारोबार और टेक्नालॉजी इन दोनों की सोच लोगों की जरूरतों को पूरा करने की है। और जिस तरह आज लोगों की मोबाइल-ऑनलाईन जिंदगी के चलते निजी दोस्तों की जरूरत घट गई है, और दोस्ती की सामाजिकता कमजोर होती जा रही है, उसी तरह आज देह-सुख के लिए, और हो सकता है कुछ बरस जाकर मानसिक शांति के लिए भी लोग मशीनी साथियों के साथ हमबिस्तर होना बेहतर समझेंगे।
जापान पर अभी बनी एक गंभीर डॉक्यूमेंट्री फिल्म में वहां के बहुत से लोगों ने कहा कि उन्हें इंसानों से रिश्ते बनाने में जटिलताओं की वजह से घबराहट होती है। कई लोगों ने यह कहा कि रिश्तों का बोझ ढोना उन्हें मुमकिन नहीं लगता है। जाहिर है कि ऐसा समाज ही जीवन साथी जैसे रोबो बनाने में उत्साह दिखा रहा है, और यह सिलसिला जापान से परे भी हर उस समाज तक पहुंचेगा जो कि ऐसे रोबो खरीदने की ताकत रखेगी। मशीनों के साथ लोगों को यह सहूलियत होगी कि साथी का सच्चा या झूठा ऐसा बहाना सुनना नहीं पड़ेगा कि आज वे बहुत थक गए हैं, या कि सिर दर्द हो रहा है।

बीवी बेचने का फतवा देने वाले बददिमाग अफसर...

संपादकीय
24 जुलाई 2017


बिहार के एक कलेक्टर का एक वीडियो कल से टीवी चैनलों पर चल रहा है जिसमें वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच और माईक से गरीबों को लताड़ते हुए, गाली देने के अंदाज में चीखते हुए कह रहे हैं कि अगर शौचालय बनाने का पैसा न हो, तो बीवी को बेच दो, और शौचालय बनाओ। अगर इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो अक्सर अपनी कही बात को तोड़-मरोड़कर छापने या दिखाने की तोहमत लगा देता, और बच निकलता। हालांकि अभी तक राज्य सरकार ने इस अफसर पर कोई कार्रवाई नहीं की है, लेकिन ऐसी उम्मीद की जाती है कि गरीबों की ऐसी बेइज्जती करने वाले तानाशाह अफसर को तुरंत ही मैदानी कुर्सी से हटाकर पिछवाड़े के किसी दफ्तर में बिठाया जाएगा।
यह बात हर कुछ दिनों में किसी न किसी प्रदेश से सामने आती है कि किस तरह ताकत की कुर्सियों पर बैठे अफसर जनता को, या मातहत कर्मचारियों को अपना गुलाम मानकर उनके साथ सामंती सुलूक करते हैं। आमतौर पर जिला कलेक्टरों की कुर्सी पर बैठे हुए अफसरों के बीच से ऐसी बददिमागी कुछ अधिक दिखती है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण कहे जाने वाले जिले इंदौर के कलेक्टर पर बनी एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की खबर सामने आई है जिसमें उस अफसर की महानता की स्तुति भरी हुई है, और उसके गुणगान की बातों में उस अफसर और उसके परिवार से बातचीत भी शामिल है। जाहिर है कि उस अफसर की मर्जी और संभवत: उसकी पहल पर ही यह स्तुति तैयार हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हम इस तरह के बहुत से आत्ममुग्ध अफसरों को देखते हैं जो कि अपने प्रचार के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, और अपनी निजी बातों को भी सोशल मीडिया पर तस्वीरों सहित फैलाने में लगे रहते हैं। लोकतंत्र में इस तरह के प्रचार से बचकर अफसरों को अपने नाम और अपनी तस्वीरों को पीछे रखकर सरकार को आगे रखना चाहिए, लेकिन अफसर अपनी वाहवाही से बच नहीं पाते हैं, और बहुत से मामलों में तो वे सरकारी खर्च पर भी अपने और परिवार के प्रचार में लगे रहते हैं।
हमने पहले भी इसी कॉलम में यह सुझाया था कि अंग्रेजों के वक्त टैक्स कलेक्ट करने का काम होता था, और इसलिए जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अफसर को कलेक्टर कहा जाता था। अब तो सरकार जिलों से ऐसा कोई बड़ा टैक्स इकट्ठा करती नहीं है, और टैक्स इकट्ठा करने वाले विभाग अलग काम करते हैं। ऐसे में अंग्रेजों के वक्त का यह नाम खत्म करना चाहिए। लेकिन इससे परे इस कुर्सी के एक नाम और चलता है जिलाधीश, इस नाम से भी मठाधीश जैसी बू उठती है और यह नाम अफसरों में एक सामंती अहंकार पैदा कर देता है। छत्तीसगढ़ सरकार इस बात की पहल कर सकती है कि कलेक्टरों और जिलाधीशों के पदनाम बदलकर जिला जनसेवक जैसा एक नाम बनाएं ताकि अफसरों को हमेशा यह ध्यान रहे कि उनकी बुनियादी जिम्मेदारी क्या है। आज तो छत्तीसगढ़ के बहुत से अफसर अपने जिलों से अपनी ऐसी तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं जिनमें वे महंगी-निजी गाडिय़ों को किराए पर लेकर उस पर कलेक्टर या कमिश्नर के नाम की तख्ती लगाकर उसका इस्तेमाल करते हैं, और कहीं उसका किराया कोई अफसर घोषित या अघोषित रूप से देते हैं, या फिर कोई सरकारी ठेकेदार उसका भुगतान करते हैं। राज्य सरकार को अफसरों की ऐसी मनमानी को तुरंत खत्म करना चाहिए, वरना बिहार के इस कलेक्टर की तरह छत्तीसगढ़ का भी कोई अफसर गरीबों को बेटी-बहू या बीवी बेचने का फतवा इसी तरह मंच से देने लगेगा। लोकतंत्र में अफसरों की भूमिका नीति-निर्धारण करने वाले विधायकों और सांसदों, और उनमें से चुनकर मंत्री बने लोगों के मातहत ही होनी चाहिए। इसके अलावा अफसरों का अपना कोई एजेंडा नहीं होना चाहिए, सिवाय लोकतंत्र के संवैधानिक दायरे के भीतर आने वाली सत्तारूढ़ पार्टी की नीतियों पर बने सरकारी कार्यक्रमों पर अमल करने के। हर राज्य की सरकार को अपने-अपने प्रशासनिक ढांचे में तुरंत ही एक लोकतांत्रिक बर्ताव लाना चाहिए, वरना सत्तारूढ़ पार्टी को अगले चुनाव में हराने की पर्याप्त क्षमता बददिमाग अफसरों के बर्ताव में रहती है। 

विशेषाधिकारों के खतरों की ताजा मिसाल है ट्रंप

संपादकीय
23 जुलाई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जिस तरह से जीतकर आए थे, उस पर भी अमरीका सहित दुनिया के बहुत से देशों के समझदार लोग हक्का-बक्का थे। लोगों को लग रहा था कि ऐसा नफरतजीवी और युद्धोन्मादी, सिद्धांतहीन, और बदसलूकी से भरा हुआ आदमी किस तरह चुनकर आ गया। अमरीकी जनता के एक मुखर हिस्से ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन भी किया था कि यह उनका राष्ट्रपति नहीं है। तब से लेकर अब तक लगातार ट्रंप के बारे में विचलित करने वाली बातें सामने आती रही हैं, और अब तो ट्रंप सरकारी, कानूनी, और संसदीय जांच से बुरी तरह घिरे हुए दिख रहे हैं कि उनके चुनाव अभियान के दौरान उनके बेटे, दामाद, और सहयोगियों ने रूस के उन लोगों के साथ मुलाकात की, और तालमेल बनाया जिन्होंने हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ नुकसान पहुंचाने वाली जानकारी देने का वादा किया था। अब जब यह लग रहा है कि ट्रंप परिवार जांच के ऐसे घेरे में है जो कि मजबूत दिखता है, और खुद ट्रंप ऐसे हाल में संसद में महाभियोग में घेरे जा सकते हैं, तो ऐसी खबरें आ रही हैं कि वे राष्ट्रपति के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके अपने परिवार को, सहयोगियों को, और अपने आपको भी क्षमादान दे सकते हैं।
यह एक बहुत ही भयानक सोच दिखती है जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति को मिले हुए इस विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल वह अपने ही परिवार को बचाने के लिए कर सकता है, और खुद अपने आपको बचाने के लिए। जब इस बारे में ट्रंप से पूछा गया तो उनका कहना है कि उन्हें किसी को भी माफी देने का पूरा हक है। अमरीकी संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति लोगों को उनका जुर्म साबित हो जाने के बाद, या उन पर कोई मुकदमा शुरू होने के पहले भी, किसी भी वक्त उन्हें माफी दे सकते हैं। आमतौर पर अमरीकी राष्ट्रपति कुछ बहुत ही चुनिंदा मामलों में, दूसरे देशों की सरकारों की अपील पर उन देशों के नागरिकों को माफी देते आए हैं, और कभी-कभी अमरीका के कुछ लोगों को भी। लेकिन ऐसी नौबत कभी नहीं आई कि इस अधिकार का उपयोग कोई अमरीकी राष्ट्रपति अपने परिवार और अपने खुद के जुर्म को खत्म करने के लिए करे, लेकिन आज अमरीका इसी मोड़ पर खड़ा हुआ दिख रहा है। अपने अनैतिक आचरण या गैरकानूनी काम के लिए संसद में महाभियोग का सामना करना अमरीका के लिए एकदम अनोखा भी नहीं है। दो चर्चित अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, और बिल क्लिंटन अपने सरकारी और निजी फैसलों की वजह से संसद में महाभियोग झेल चुके हैं, लेकिन किसी ने भी कभी अपने आपको माफ करने जैसा शायद सोचा भी नहीं था। यह कुछ उसी किस्म का होगा कि मानो भारत में राष्ट्रपति के परिवार ने, या खुद राष्ट्रपति ने कोई जुर्म किया, और फिर खुद ही उसे माफी दे दी। हालांकि भारतीय लोकतंत्र इस मामले में अमरीका के मुकाबले अधिक परिपक्व है, और यहां पर राष्ट्रपति को अदालत के आखिरी फैसले हो जाने के बाद, और वह भी महज मौत की सजा के मामलों में की गई रहम की अपील पर माफी देने का हक है, न उसके पहले, और न ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश के बिना। अमरीका ने अपने राष्ट्रपति को अधिक हक दिए हुए हैं, और अब वह इनके बेजा इस्तेमाल का गवाह भी बन सकता है।
दरअसल ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही अमरीका कई तरह के हितों के टकराव के खतरे में पड़ गया है। बहुत से देशों के साथ ट्रंप के परिवार के कारोबारी रिश्ते हैं, वहां के व्यापारियों से भी, और वहां की सरकारों से भी। खुद अमरीका के भीतर ट्रंप परिवार के कारोबार और सरकार के बीच हितों के टकराव के कई मामले सामने आए हैं, और इन पर ट्रंप को यह सफाई देनी पड़ी है कि ट्रंप-होटलों को सरकार से मिलने वाले किसी भी भुगतान की रकम वे दान में दे देंगे, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप के साथ औपचारिक रूप से उनके बेटे-बेटी-दामाद जुड़े हुए हैं, और उन सबके अपने-अपने कारोबारी हित हैं जो कि राष्ट्रपति भवन के प्रभाव का इस्तेमाल करते दिखते हैं, और जो ट्रंप के साथ दुनिया के दूसरे देशों में सफर भी करते हैं। अब ऐसी जटिलता के बीच आज ट्रंप अगर यह सोचते हैं कि वे अपने परिवार और सहयोगियों को उनके किसी जुर्म, या कि संभावित जुर्म से माफी दे देंगे, तो अमरीकी राष्ट्रपति के ओहदे की साख चौपट हो जाएगी, और अमरीकी जनता के बीच से यह मांग भी उठने लगेगी कि राष्ट्रपति का ऐसा संवैधानिक अधिकार खत्म किया जाए।
फिर अमरीका से परे बाकी देशों को भी सोचना चाहिए कि वे किसी भी पद को किए गए विशेषाधिकारों को किस तरह से खत्म करें। लोकतंत्र और विशेषाधिकार ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। लोकतंत्र को खत्म करने की कीमत पर कुछ चुनिंदा कुर्सियों को असीमित अधिकार देना एक भ्रष्ट और बुरी तानाशाही को खड़ा करना ही हो सकता है, और ट्रंप इसकी ताजा मिसाल हैं।

कार्टूनिस्ट की बनाई पार्टी को व्यंग्य जरा भी बर्दाश्त नहीं !

संपादकीय
22 जुलाई 2017


मुंबई में अभी स्थानीय म्युनिसिपल की असहिष्णुता का एक दूसरा चर्चित मामला सामने आया है। कुछ महीने पहले कॉमेडियन कपिल शर्मा ने म्युनिसिपल अफसरों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था, और जवाब में म्युनिसिपल ने उनका दफ्तर नापकर अवैध निर्माण निकाल दिया, और तोडऩे का नोटिस भेज दिया। अभी दूसरा मामला सामने आया है वहां एक रेडियो जॉकी मलिश्का मेंडोंसा ने शहर की सड़कों की गड्ढों को लेकर एक बड़ा मजेदार और मजाकिया गाना गाया और उसका वीडियो पोस्ट कर दिया। यह गाना एक लोकप्रिय मराठी गाने की धुन पर बनाया गया था और मुंबई की सड़कों के कुख्यात गड्ढों को लेकर म्युनिसिपल का मजाक था। नतीजा यह निकला कि मुंबई महानगरपालिका पर राज करने वाली शिवसेना ने इस वीडियो के आते ही मलिश्का के घर की जांच की, और वहां पर डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का लार्वा मिलना बताकर उसे एक नोटिस थमा दिया। शिवसेना के सत्तारूढ़ पार्षद इस रेडियो जॉकी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे की मांग करने लगे। महाराष्ट्र की राजनीति में राज्य में एक साथ सत्तारूढ़ भाजपा और शिवसेना के बीच तनातनी चलते रहती है, और शिवसेना के इस कदम पर भाजपा ने म्युनिसिपल पर हमला भी किया है और मलिश्का पर की गई कार्रवाई को व्यक्तिगत आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला भी बताया है।
शिवसेना के इस तरह आपा खो देने को देखते हुए यह याद पड़ता है कि इसके संस्थापक बाल ठाकरे एक वक्त कार्टूनिस्ट थे, और अच्छे तेज-तर्रार कार्टूनिस्ट थे। अब एक कार्टूनिस्ट की पार्टी भी एक व्यंग्य या मजाक पर इस तरह बौखलाकर कार्रवाई करती है तो यह उस पार्टी के लिए शर्मनाक बात है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान भारत की एक बहुत प्रतिष्ठित कार्टून पत्रिका शंकर्स-वीकली को उसके संपादक और कार्टूनिस्ट शंकर ने बंद कर दिया था कि जब लोगों की सहनशक्ति खत्म हो गई है, और सेंसरशिप लागू की जा रही है, तो वे इसे चलाने के बजाय बंद कर देना बेहतर समझते हैं। अब अगर देश की कारोबारी राजधानी की सड़कों पर वहां करोड़ों लोग भुगतते हैं, तो क्या लोगों को मजाक उड़ाने का भी हक नहीं है?
अमरीकी अखबारों को देखें और वहां पर ताजा मामलों पर बने हुए कॉमेडी के कार्यक्रमों को देखें तो समझ में आता है कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या होती है। देश के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति की बातों को लेकर जिस तरह की खिल्ली उनकी उड़ाई जाती है उसका एक फीसदी भी कोई हिन्दुस्तानी नेता शायद ही बर्दाश्त करे। और उसी से समझ में आता है कि जनता के बीच लोकतांत्रिक समझ कैसे विकसित होती है, और कैसे लोगों के बीच अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पनपती है। मुंबई के इस ताजा मामले को लेकर हमारा मानना है कि वहां के हाईकोर्ट को तुरंत इस मामले में दखल देना चाहिए और महानगरपालिका को पूछना चाहिए कि इस गायिका के घर पर डेंगू का लार्वा तलाशने के लिए जाने की उन्हें कैसे सूझी थी? मुंबई में दसियों लाख मकान हैं, और आनन-फानन किसी एक घर के भीतर का लार्वा म्युनिसिपल को अपने दफ्तर बैठे दिख गया? यह सरकारी गुंडागर्दी की एक मिसाल है, और हकीकत तो यह है कि ऐसी ओछी और अलोकतांत्रिक गुंडागर्दी से मुंबई महानगरपालिका ने अपनी ही नालायकी और निकम्मेपन को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
यह पूरा सिलसिला सिर्फ एक म्युनिसिपल का मानकर चलना ठीक नहीं है। देश में जहां-जहां ऐसी अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है, उसे तुरंत कुचलना जरूरी है, और अगर मुंबई का हाईकोर्ट इस पर पहल नहीं करता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ेगा।

बच्ची से बलात्कार और अनगिनत सवाल

संपादकीय
21 जुलाई 2017


चंडीगढ़ की एक अदालत ने दस बरस की एक बच्ची को गर्भपात की इजाजत नहीं दी है। उसका मामा उससे लगातार बलात्कार करते आया था, और अब वह 26 हफ्तों की गर्भवती है। भारत में कानून 20 हफ्तों से अधिक के गर्भ के बच्चे को खत्म करने की इजाजत नहीं देता। लेकिन इस मामले में अदालत के साफ रूख से परे, डॉक्टरों के सामने यह समझ नहीं है कि दस बरस की बच्ची का मां बनना मां-बच्चे दोनों की जिंदगी के लिए अधिक खतरनाक है, या उसका गर्भपात। दोनों ही मामलों में इस लड़की की जिंदगी और सेहत दोनों बहुत बुरी तरह खतरे में रहना तय है। अब इस सिलसिले में इस बच्ची के इलाके की जनता उबली पड़ी है कि इस बच्ची को बलात्कार के इस नतीजे को जिंदगी भर पालना पड़ेगा। हमारे सामने इस मामले से जुड़े कई पहलू हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं, लेकिन जिन पर दो-दो पल सोचने की जरूरत है।
सबसे पहली बात यह कि किसी परिवार में सबसे करीबी रिश्तेदारों से बच्चों को सुरक्षित मानना ठीक नहीं है। इसी हादसे की और जानकारी ढूंढने के लिए अभी हमने इंटरनेट पर इस खबर को ढूंढा तो इसके साथ-साथ अनगिनत ऐसी और खबरें आ गईं जिनमें मामा, चाचा, पिता और भाई जैसे करीबी रिश्तेदार बच्चों से बलात्कार करते आए हैं। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों मामलों में से कोई एक ही पुलिस और खबरों तक पहुंचता है। बाकी तमाम चीखें घर के भीतर ही दबा दी जाती है। इसलिए मां-बाप की पहली जिम्मेदारी अपने बच्चों को देह शोषण के बारे में जागरूक करना और उन्हें हिफाजत से रखना है। रिश्तों की जिम्मेदारी का नैतिक बोझ इंसानों के भीतर की हवस को हमेशा दबाकर नहीं रख पाती।
दूसरा पहलू कानून के बेअसर होने का है जिसके बारे में कल ही हमने इसी इलाके के एक पड़ोसी राज्य में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार और फिर उसकी हत्या को लेकर भारी तनाव बना हुआ है। जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक की कमजोरी और व्यापक भ्रष्टाचार के चलते लोगों को अब न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं रह गया है और लोग सड़कों पर इंसाफ चाहने लगे हैं। मुजरिम को सजा दिलाने का काम अगर बेहतर और असरदार नहीं हो पाएगा तो समाज में अराजकता भी बढ़ती जाएगी और मुजरिमों का हौसला भी।
भारत में जहां अब तकरीबन हर बच्चे को स्कूल भेजने की कोशिश होती है, वहां स्कूलों-बच्चों को देह शोषण के बारे में सावधान और जागरूक करने के लिए सबसे अच्छी जगह हो सकती है लेकिन पाखंडी सोच वाले इस देश में जैसे ही सेक्स-शिक्षा शब्द भी हवा में आता है, भारतीय संस्कृति के हिंसक ठेकेदार डंडे-झंडे लेकर इस शब्द को हवा में ही मारने में जुट जाते हैं। ऐसे में कोई बच्चे अपनी देह को लेकर जागरूक नहीं हो पाते। केन्द्र और राज्य सरकारें खुद होकर तो सेक्स-शिक्षा की सोचेंगी नहीं, किसी को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए ताकि सत्तारूढ़ पार्टियां अदालती आदेश की आड़ लेकर सेक्स-शिक्षा लागू कर सकें।
एक आखिरी सवाल हमें सुझाता है ईश्वर के बारे में। जो कण-कण में मौजूद माना जाता है, जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान माना जाता है, जो सबका भला करने वाला माना जाता है, जिसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह ईश्वर छोटे-छोटे बच्चों के साथ बलात्कार के वक्त कहां रहती है? क्या देखता है? क्या सोचता है? और कुछ करता क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि धर्म का नाम लेकर, धार्मिक चोगा पहनकर आसाराम से लेकर पादरियों तक और मौलवियों तक को बच्चों से बलात्कार में शामिल पाया जाता है। नास्तिक लोग तो ईश्वर की हकीकत जानते हैं और अपने बच्चों की खुद हिफाजत करते हैं। लेकिन जो आस्तिक और आस्थावान ईश्वर पर भरोसा करते हुए बैठे रहते हैं, उनको ऐसे मामलों को लेकर अपने-अपने ईश्वरों से सवाल जरूर करना चाहिए।

निराश हिंसक भीड़ का इंसाफ लोकतंत्र खारिज कर देता है

संपादकीय
20 जुलाई 2017


हिमाचल के शिमला में एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के आरोप में फंसे एक नौजवान ने इसी आरोप में फंसे दूसरे नौजवान की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी। लेकिन इससे परे भी हिमाचल का शांत इलाका इस बलात्कार-हत्या पर उबला हुआ है, कई दिनों से शिमला बंद चल रहा है, और लोग सड़कों पर हैं। देश में कई और जगहों पर बलात्कार के आरोप में फंसे लोगों पर भीड़ ने हमले किए हैं, कहीं-कहीं हत्या भी कर दी है, और सड़कों पर लोग फैसले कर रहे हैं।
यह पूरा सिलसिला भारत की निचली अदालतों की बेअसर व्यवस्था, और वहां पर मुकदमे ले जाने वाली जांच एजेंसियों की नाकामयाबी का बहुत बड़ा सुबूत है। आज किसी जुर्म को लेकर लोगों के मन में यह भरोसा ही नहीं रहता है कि मुजरिम को सजा हो पाएगी। जांच एजेंसियां भ्रष्ट हैं, उनका काम बहुत कमजोर है, और अदालतों में बिना शक किसी जुर्म को साबित करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह है कि बलात्कार के मामलों में कुछ फीसदी लोग ही सजा पाते हैं, और बाकी छूट जाते हैं। आम लोगों का, खासकर गरीब और कमजोर लोगों का भारत की निचली न्याय व्यवस्था पर कोई भरोसा नहीं है और इसीलिए लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं। कुछ हफ्ते पहले ही उत्तर भारत की ही एक खबर आई थी कि किस तरह बलात्कार की शिकार जब थाने पर शिकायत करने पहुंची तो उस पर कार्रवाई करने के लिए थाने के लोगों ने उससे सेक्स की मांग की। और यह घटना अकेली नहीं है, जुर्म के शिकार लोगों से रिश्वत की उम्मीद आम बात है, और लोग यह भी जानते हैं कि राज्यों की पुलिस आमतौर पर दोनों पक्षों से वसूली करने में लगी रहती है, और उसी हालत में वह कार्रवाई करती है जब सुबूत चीख-चीखकर बोल रहे हों, और उन्हें अनदेखा करना मुमकिन न हो। इसके बाद निचली अदालतों में खूब भ्रष्टाचार रहता है, और उनकी रफ्तार ऐसी धीमी रहती है कि बरसों तक चलने वाले मुकदमों में बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की लगातार मानसिक यातना चलती है।
जब कानून अपना काम नहीं कर पाता, तब भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है। राज्यों को यह देखना होगा कि उनकी पुलिस और जिला स्तर की अदालतें अपना काम ठीक से करें, वक्त पर करें, और जुर्म के शिकार लोगों को इंसाफ मिल सके, और मुजरिमों को सजा मिल सके। जब दस-बीस बरस तक मुजरिमों को सजा नहीं मिल पाती है, तो समाज के बाकी लोगों का भी हौसला जुर्म के लिए बढ़ जाता है। ऐसे में निराश हिंसक भीड़ का इंसाफ लोकतंत्र को खारिज कर देता है, यह एक खतरनाक नौबत है।

गो-हिंसा पर राज्यों को केन्द्र की नसीहत बेमतलब दिखावा

संपादकीय
19 जुलाई 2017


केन्द्र सरकार ने राज्यों को आदेश या निर्देश दिया है कि गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा पर एफआईआर दर्ज की जाए। देश के लिए आज शर्मिंदगी की सबसे बुरी और सबसे बड़ी वजह बन चुकी यह गो-हिंसा क्या ऐसी कागजी बात से थमेगी? यह मामला शर्मनाक है लेकिन फिर भी केन्द्र सरकार के इस निर्देश पर हंसी आती है। इसे एक महान कार्रवाई कहा जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि ऐसी कोई भी हिंसा होने पर हर राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी पुराने चले आ रहे कानूनों के मुताबिक भी बनती ही है कि उन पर एफआईआर कायम हों, और मुजरिमों को पकड़कर केस चलाया जाए। ऐसी हिंसा के मामले में राज्य सरकारों का यह अधिकार ही नहीं है कि वे इसे अनदेखा कर सकें, या बिना कानूनी कार्रवाई मुजरिमों को छोड़ सकें। इसका मतलब यह हुआ कि केन्द्र सरकार का यह कागज महज रद्दी की टोकरी के लायक है। यह कुछ उसी तरह का है कि केन्द्र सरकार राज्यों को लिखकर भेजें कि उनके राज्य में सुबह सूरज निकलेगा, और शाम को डूब जाएगा, सरकारें इस बात का ध्यान रखें।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त संसद में एक बड़े वकील रहे हुए एक सांसद इस बात को उठा रहे हैं, और यही तर्क दे भी रहे हैं। केन्द्र सरकार को एक तो समय रहते अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही है। दूसरी तरफ अलग-अलग राज्यों में जब किसी हिंसा के लिए कोई राज्य सरकार या कोई राजनीतिक दल जिम्मेदार रहते हैं, तो केन्द्र सरकार का रूख ऐसे मामलों में अलग-अलग रहता है, और उसमें साफ-साफ भेदभाव दिखता है। अगर गो-हिंसा, गो-गुंडागर्दी, गो-हत्या, गो-अपराध होते हैं, और राज्य सरकारों के मंत्रियों के ऐसे बयान आते हैं जो कि मुजरिमों पर कार्रवाई के बजाय घुमा-फिराकर हिंसा के शिकार लोगों पर और हिंसा के लायक दिखते हैं, तो केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह राज्यों को फटकार लगाए। लेकिन खुद केन्द्र के मंत्री ऐसी गैरजिम्मेदारी करते दिखते हैं, और शब्दों से परे केन्द्र सरकार का रूख किसी कड़ी कार्रवाई का नहीं है।
जब सड़कों पर गौरक्षा के नाम पर हत्याएं हुए हफ्ते या महीने गुजर जाते हैं तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दार्शनिक अंदाज के कुछ मसीहाई शब्द सामने आते हैं, जो कि तब तक बेअसर हो चुके रहते हैं। लेकिन जब ऐसा चलते रहता है, जब कत्ल के बाद कफन-दफन के बीच का वक्त रहता है, तब प्रधानमंत्री का कोई बयान नहीं आता, उनकी कोई ट्वीट नहीं आती। ऐसे ही रूख के बारे में हम पहले भी यहां लिख चुके हैं कि जब हफ्तों-महीनों बाद वे कुछ कहते हैं, तो वह बहुत कम, और बहुत देर से कहा हुआ पूरी तरह बेअसर बयान रहता है। संसद का सत्र आने के ठीक पहले प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में इस बारे में अफसोस जाहिर करते हुए राज्यों से कार्रवाई के लिए कहा था, लेकिन यह तो वैसे भी राज्यों की जिम्मेदारी बनती थी। आज जब संसद में इस पर बहस चल रही है, तो उसी वक्त विश्व हिन्दू परिषद का एक बयान आ रहा है जिसमें वह गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से इस्तीफा मांग रही है क्योंकि पर्रिकर ने बीफ के बारे में अभी यह कहा था कि वे अपने प्रदेश में बीफ की कमी नहीं होने देंगे। पर्रिकर के अलावा तकरीबन पूरा उत्तर-पूर्व भी बीफ के हक को छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं, और इसके लिए वहां के भाजपा के नेता पार्टी भी छोड़ दे रहे हैं। इस बहस के बीच केन्द्र सरकार के सामने यह दिक्कत भी खड़ी है कि पशु कारोबार की उसकी अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक दिया है।
कुल मिलाकर बात यह है कि केन्द्र की सत्तारूढ़ भाजपा जिस अंदाज में देश भर में बीफ पर रोक को लागू कर रही है, उससे एक हिंसक हौसला पाकर गौरक्षा के नाम पर कत्ल करने वाले मुजरिम खुलकर सड़कों पर हैं, और करोड़ों दलित-अल्पसंख्यक बेरोजगार हो रहे हैं, दहशत में जी रहे हैं, हिंसा का शिकार हो रहे हैं। केन्द्र सरकार की गाय इस देश की अर्थव्यवस्था को दिक्कतों की वैतरणी पार कराते नहीं दिख रही है, बल्कि वह मंझधार में इस देश के साथ-साथ खुद भी डूब मर रही है। भूखे और आत्महत्या करते किसानों के पास अपने जानवरों को खिलाने का पैसा भी नहीं बचा है, क्योंकि वे आखिर में जाकर उन्हें अब बेच भी नहीं सकते। गो-हिंसा के तमाम मामले सरकारी रूख से उपजे हुए हैं, और राज्यों को एफआईआर की नसीहत देने का कोई असर होने वाला नहीं है, और इस दिखावे की कोई जरूरत भी नहीं है।

पेड़ लगाने के साथ-साथ यह हिसाब गिनाने की जरूरत कि पिछले पेड़ों का क्या हुआ?

संपादकीय
18 जुलाई 2017


बारिश का मौसम आता है और पूरे हिंदुस्तान में जगह-जगह पेड़ लगाने का अभियान शुरू हो जाता है। साल में कभी पेड़ लगाने का अभियान चलता है तो कभी साल में एक बार पर्यावरण पर फिक्र का जलसा होता है। और साल के हर दिन उसको बर्बाद करने का सिलसिला चलता है। एक बड़ी अजीब सी बात है कि पर्यावरण की बात करें तो पहली तस्वीर दिमाग में जंगल की बनती है, और आज पर्यावरण सबसे अधिक बर्बाद इंसान के जंगली रूख से हो रहा है। जंगल का रूख जंगल के जानवरों के लिए ठीक रहता है। वहां पर सबसे ताकतवर अपने से नीचे के लोगों को काबू में रखते हैं, और अपनी जरूरत के मुताबिक उनको खाते-पीते हैं। जो जानवर दूसरे जानवरों को नहीं खाते, वे भी घास-पत्तों को खाते हैं, और उनकी बिरादरी में भी ताकत का बोलबाला होता है। इंसान ने जंगल के जानवरों से सबसे ताकतवर के राज वाला रूख तो ले लिया है, लेकिन उसे जब इंसानी हवस के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है, तो धरती तबाह हो जाती है, हो रही है, हो चुकी है।
आज सबसे संपन्न और सबसे ताकतवर देश और इंसान दुनिया के प्राकृतिक साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के सबसे गरीब और कमजोर देशों और लोगों का धरती पर जो बराबरी का हक होना चाहिए, उसे मानो जंगल के ताकतवर जानवरों के अंदाज में संपन्न लोग छीन लेते हैं, और धरती को निचोड़कर रख देते हैं। आज अमरीका में सामानों की प्रति व्यक्ति खपत को देखें, तो अफ्रीका और भारत जैसे देशों के सौ-सौ लोगों जितनी खपत अमरीका के एक-एक इंसान की होगी। और अब जंगलों को, तेल के कुओं को, जमीन और पानी को जंगल सरीखे बाहुबल से हासिल करने की जंग चल रही है, फर्क यही है कि जंगल के जानवर अपनी अगली पीढिय़ों के लिए इमारतें नहीं छोड़ जाते। इंसान अपने दिमाग का खूंखार इस्तेमाल करते हुए दूसरों से छीने हुए हकों से अपनी तिजोरियां भी भरते हैं।
पर्यावरण की सारी बातें अपने से नीचे के लोगों को पर्यावरण बचाने की नसीहत देने वाली होती है। अपने इस्तेमाल को कम करने वाले लोग कम ही होते हैं, कम से कम ताकतवर तबकों में तो बिल्कुल ही नहीं होते। नतीजा यह होता है कि ताकत से हासिल अधिक से अधिक साधन और सुविधाओं के अधिक से अधिक इस्तेमाल से खपत आसमान पर पहुंच जाती है, और धरती लहूलुहान हो जाती है। मुंबई में मुकेश अंबानी का 27 मंजिला घर बनता है और उसमें इतनी बिजली लगती है कि गरीबों की दर्जनों बस्तियां उतने में रौशन हो जाएं। भारत जैसे लोकतंत्र में जब कोई कारखानेदार कंपनियों के खर्च पर, तो सरकारों में बैठे लोग जनता की जेब से हिंसक अंदाज में अपने लिए साधन जुटाते हैं, तो वे जरूरत से कई गुना अधिक फिजूलखर्ची करते हैं। और यह सब दुनिया में फैल चुकी पूंजीवादी व्यवस्था के गुलाम बने लोकतंत्र में बढ़ते ही चल रहा है।
दुनिया के प्राकृतिक साधनों पर जब कोई देश फौजी हमले से फिल्म अवतार की तरह कब्जा करने में लगा हुआ है, तो ऐसी जंग के बाद कब्जे में आए प्राकृतिक साधनों को और अधिक बेदर्दी से खर्च किया जाएगा। अमरीका जैसे पर्यावरण के दुश्मन देश अपने फौजी विमानों से बमों के साथ जिस लोकतंत्र को दूसरे देशों पर बरसाते हैं, वे उन गरीब देशों, या असहमत देशों की कुदरती दौलत को कब्जाने की नीयत से ऐसा करते हैं। जंग के बाद भी लूट के माल को बेरहमी से ही खर्च किया जाता है। इसलिए आने वाले दिन कमजोर देश और लोग पर्यावरण की चर्चा करते गुजारेंगे, और बाहुबली देश और लोग पर्यावरण पर, प्राकृतिक साधनों पर दूसरों के हकों को छीनकर बेहिसाब फिजूलखर्ची के साथ गुजारेंगे।
इस माहौल में पर्यावरण की सालाना फिक्र के जलसे की क्या अहमियत है, और सजावटी पेड़ों को लगा-लगाकर उन्हें मरने के लिए छोड़कर क्या हासिल किया जा सकेगा? छत्तीसगढ़ में अभी सरकार पूरे प्रदेश में पेड़ लगाने का अभियान शुरू कर रही है। इस मौके पर उसे पहले तो एक श्वेतपत्र प्रकाशित करना चाहिए कि राज्य बनने के बाद से अलग-अलग बरस में कितने पेड़ लगाए, और आज उनमें से कितने बचे हैं? इसके साथ-साथ इंसानों को यह भी सोचना पड़ेगा कि सामानों की फिजूलखर्च और धरती की बर्बादी की उसकी रफ्तार को क्या तस्वीरें खिंचवाने के लिए लगाए जाते पेड़ रोक पाएंगे? इस मौके पर यह याद दिलाना भी गलत नहीं होगा कि सजावटी और बाहरी नस्लों के महंगे पेड़ लगाने के बजाय सरकार को सिर्फ देशी और स्थानीय नस्लों के बड़े पेड़ लगाने चाहिए जो रख-रखाव नहीं मांगते और लंबा जिंदा रहते हैं। यह भी सोचने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में जगह-जगह बनाए जा रहे ऑक्सीजोन नाम के सघन वृक्षारोपण से पैदा होने वाली ऑक्सीजन शहरी गाडिय़ों के अंतहीन धुएं के साथ कब तक मुकाबला कर पाएंगी?

सरकारी कॉलेज में यौन शोषण, सरकार, महिला आयोग चुप

संपादकीय
17 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी महिला महाविद्यालय में बहुत सी छात्राओं की यह शिकायत सामने आई है कि एक प्राध्यापक लगातार उनसे लंबे समय से अश्लील व्यवहार करते आ रहे हैं। अब बहुत सी छात्राओं की शिकायत के बाद जोगी कांग्रेस ने इसे एक आक्रामक आंदोलन के रूप में उठा लिया है, और रोज प्रदर्शन हो रहे हैं। दूसरी तरफ खबर है कि इस मुद्दे पर कॉलेज एक जनसुनवाई कर रहा है ताकि जिन लड़कियों को शिकायत हो वे सामने आ सकें।
लड़कियों या महिलाओं के यौन शोषण की शिकायतों पर कॉलेज का यह रूख समझ से परे है। पहली बात तो यह कि अगर लंबे समय से किसी एक प्राध्यापक के खिलाफ ऐसी शिकायतें चली आ रही थीं तो इसके पहले कॉलेज में कार्रवाई क्यों नहीं की? देश का कानून इस बारे में बड़ा ही सख्त है, और पहली शिकायत पर ही वह जांच कमेटी को अनिवार्य कर देता है। ऐसे में किसी मामले को महज इसलिए टालते जाना कि प्राध्यापक के बड़े ऊंचे राजनीतिक रिश्ते हैं, यह सत्तारूढ़ पार्टी के लिए एक बड़ी बदनामी और शर्मिंदगी की बात भी है। दूसरी हैरानी यह है कि सत्तारूढ़ भाजपा के छात्र संगठन, उसका महिला मोर्चा भी अब तक चुप बैठे हुए हैं। राज्य की महिला आयोग तक शिकायत पहुंचीं, लेकिन उसकी भी कोई कार्रवाई अब तक सुनाई नहीं पड़ी है। फिर अगर कॉलेज किसी प्राध्यापक द्वारा की जा रही यौन प्रताडऩा या यौन शोषण की शिकायतों को सच में ही सुनना चाहता है तो उसे तो गोपनीय रूप से बंद कमरे में ही सुना जा सकता है, ये शिकायतें बिजली-पानी की बिल की शिकायतें नहीं हैं जिसके लिए जनसुनवाई की जाए। ऐसी शिकायतों को कौन सी लड़की या महिला एक कार्यक्रम में पहुंचकर सामने रख सकती हैं, और कैसे कॉलेज इन शिकायतों को एक आयोजन में सुन सकता है? यह बताता है कि प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी महिला महाविद्यालय भी महिलाओं के शोषण के मामले में पूरी तरह से गैरजिम्मेदार है।
हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार, प्रदेश की हाईकोर्ट, और राष्ट्रीय स्तर पर महिला आयोग को दखल देना चाहिए, क्योंकि प्रदेश का महिला आयोग कुछ करते दिख नहीं रहा है। इस मामले को एक राजनीतिक आंदोलन की तरह कॉलेज के गेट पर रोज चलने देना शर्मनाक है। ऐसी शिकायतों पर कॉलेज को तुरंत ही प्राध्यापक को छुट्टी पर भेज देना चाहिए, और उच्च शिक्षा विभाग को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए प्राध्यापक को तुरंत हटा देना चाहिए। इसके बाद पुलिस और सरकार की दूसरी एजेंसियों की भी जिम्मेदारी है कि वे लड़कियों के इस हौसले को देखते हुए जरूरी कानूनी कार्रवाई करें। एक तो भारत में महिलाओं और लड़कियों के लिए ऐसा माहौल नहीं रहता कि वे इस तरह की शिकायतें करने का हौसला दिखाएं, और जब ऐसी शिकायत पर महज राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई नहीं होती है, तो उससे आगे फिर दूसरी लड़कियों या महिलाओं का शिकायत का हौसला खत्म हो जाता है। प्रदेश में महिला मुद्दों को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाने वाले लोगों को आगे की कानूनी पहल करनी चाहिए।

अंग्रेजों का मैला ढोती हिन्दुस्तान की गुलाम मानसिकता बदले...

संपादकीय
16 जुलाई 2017


कोलकाता से एक बार फिर खबर है कि धोती-कुर्ते में पहुंचे एक बुजुर्ग को वहां के एक मॉल में घुसने नहीं दिया गया। इसके पहले भी वहां के किसी क्लब में चप्पल में पहुंचे किसी भले व्यक्ति को रोक दिया गया था, तो किसी रेस्त्रां में भारतीय पोशाक में पहुंचे लोगों को रोक दिया जाता है। भारत के कुछ और शहरों में भी कभी-कभी ऐसा होता है, लेकिन कोलकाता में यह कुछ अधिक इसलिए होता है कि वहां अंग्रेजों की संस्कृति अब तक कुछ अधिक बची हुई है। यह एक अलग बात है कि जो बंगाली भद्रलोक अंग्रेजी संस्कृति को अधिक ढोता है, वही बार-बार अपनी भारतीय पोशाक के साथ इसका शिकार भी होता है।
यह देश पोशाक सहित बहुत से मामलों में अभी तक एक गुलाम सोच से उबर नहीं पाया है। और जिन पढ़े-लिखे, शहरी, संपन्न, और सवर्ण तबकों के हाथों आज बाकी तबकों के मुकाबले ताकत कुछ अधिक है, वे ही तबके गुलाम मानसिकता के शिकार भी अधिक हैं। मनोविज्ञान में गुलाम मानसिकता का बड़े खुलासे से ब्यौरा पढऩे मिलता है, और इसके शिकार लोग जब तक ऐसे लोगों के तलुए न चाट लें, जिन्हें कि वे मालिक मानते हैं, उनका जी नहीं भरता, उन्हें तसल्ली नहीं होती। जिन अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान को रौंदा है, गुलाम बनाकर रखा है, और लूटा है, उन्हीं की पोशाक को लोग गले में एक तमगे की तरह टांगकर रखते हैं। भारत में बड़े-बड़े लोग सारी गर्मी के बीच कोट और टाई के बिना हीनभावना के शिकार हो जाते हैं। यहां के गरीब दूल्हे भी कर्ज लेकर कोट और टाई जरूर टांग लेते हैं, फिर चाहे वे उसके भीतर मसखरे ही क्यों न दिखते हों। और तो और भारत की गर्म खौलती हुई रेलगाडिय़ों में टिकट जांच करने वाले कर्मचारी काले कोट को लादे रखने को बेबस किए जाते हैं, और दूसरी तरफ ऐसी ही खौलती अदालतों में वकीलों पर यह काला कोट लाद दिया जाता है जिन्हें पसीने से बनी हुई सफेद लकीरें गुलाम मानसिकता का दस्तावेज बना देती हैं। भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, किसी बड़े जज, या किसी विदेशी मेहमान के आने पर इस देश के बड़े-बड़े मंत्री-अफसर आग उबलती गर्मी में भी बंद गले के कोट पहनकर खड़े हो जाते हैं। और तो और देश के भीतर भी हिन्दुस्तानी वीवीआईपी के स्वागत में ऐसे कपड़े पहनने का नियम बनाया गया है, जिसे मार-मारकर लागू करवाया जाता है। मजे की बात यह है कि भरी गर्मी में कोट तो लाद दिया जाता है, लेकिन चिलचिलाती धूप में भी काले चश्मे को लगाने पर अफसर को नोटिस भी मिल जाता है।
किसी क्लब, किसी रेस्त्रां, किसी मॉल में आने-जाने के लिए अच्छी-भली पोशाक भी काफी नहीं होती, उसका विदेशी होना जरूरी होता है। चप्पलों पर रोक है, और अंग्रेजी बूट के लिए लाल कालीन बिछे रहते हैं। कुछ ऐसा ही हाल अंग्रेजों की छोड़ी हुई जुबान का भी है, और भारत में अंग्रेजी कई दरवाजे खोल देती है, और हिन्दी हिकारत पैदा करती है। यह देश आजादी की पौन सदी बाद भी न गुलाम मानसिकता से उबरा है, और न ही इसमें आत्मसम्मान की कोई चाह दिखती है। हाथों से खाए जाने वाले हिन्दुस्तानी व्यंजनों को भी इस देश के होटल-रेस्त्रां में कांटा-छुरी से खाने की अंग्रेजी तहजीब लाद दी जाती है। जो लोग भारतीय संस्कृति का झंडा-डंडा लेकर चलते हैं, उनसे लेकर, आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाने वाले लोगों तक, जब कभी किसी का मौका आता है, तो वे अपने को गुलाम साबित करते हुए कतार में खड़े हो जाते हैं।
इसके खिलाफ एक सामाजिक वैचारिक-बगावत की जरूरत है। एक ऐसी अराजक सोच की जरूरत है जो कि गैरहिन्दुस्तानी और इस देश के लिए अनफिट ऐसी तमाम चीजों को खारिज करने का हौसला दिखाए, और अपनी मर्जी की एक आजाद संस्कृति को इस्तेमाल करने की जिंदादिली दिखाए। भारत में अंग्रेजों के छोड़े गए मैले का टोकरा सिर पर ढोकर, कंधों पर और गले में टांगकर चलने वाले देसी-गुलामों के खिलाफ एक हिन्दुस्तानी सोच को बढ़ावा देना चाहिए। आज जनता के पैसों पर सरकारी एयरकंडीशनिंग भोगते हुए लोग अंग्रेजी दासता के टाई-कोट की गर्मी ढोते हैं, और इसका खर्च जनता के माथे पड़ता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

रूपा गांगुली का बयान बंगाल की इज्जत के साथ एक बलात्कार

संपादकीय
15 जुलाई 2017


पश्चिम बंगाल से भाजपा की सांसद रूपा गांगुली ने कैमरों के सामने बयान दिया है कि बंगाल के बाहर के जो लोग तृणमूल कांग्रेस सरकार का बचाव कर रहे हैं, उन्हें अपनी बीवी, बहन और बेटी बंगाल भेजनी चाहिए, और अगर वे यहां पन्द्रह दिन बलात्कार की शिकार हुए बिना गुजार सकें तो वे आकर उन्हें बताएं। एक सांसद होने के अलावा वे एक बंगाली भी हैं, और महिला भी हैं, इसलिए उनसे दो बातों की उम्मीद की जाती है कि वे संसदीय गरिमा के मुताबिक बात करें, एक बंगाली होने के नाते अपने प्रदेश को झूठा अपमानित करने वाली बात न करें, और एक महिला होने के नाते बलात्कार शब्द का ऐसा संवेदनाशून्य इस्तेमाल न करें। लेकिन उन्होंने इन तमाम उम्मीदों को खारिज करते हुए बहुत ही ओछी और घटिया जुबान में यह हमला किया है, जो कि वे करना तो ममता बैनर्जी पर चाहती हैं, लेकिन उन्होंने पूरे बंगाल पर यह हमला किया है।
लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि लोग जैसा बोते हैं, वैसी ही फसल पाते हैं। ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिनों के भीतर ही कोलकाता में हुए एक चर्चित बलात्कार के बारे में आनन-फानन यह बयान दिया था कि यह उनकी सरकार को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश है। ममता बैनर्जी भी न केवल निर्वाचित सांसद-विधायक रही हुई हैं, बल्कि जिस दिन यह घटना हुई उस दिन वे बंगाल के राजकाज के लिए जिम्मेदार मुख्यमंत्री भी थीं, और वे एक महिला तो हैं ही। ऐसे में बलात्कार की शिकार एक महिला की पुलिस में कराई गई रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री का ऐसा कहना सीधे-सीधे जांच और इंसाफ में दखल के बराबर था। खैर, उनके मुंह पर तमाचा लगाने जैसी नौबत आई, और उन्हीं की पुलिस ने न सिर्फ इस महिला की शिकायत को सही पाया, मामले को अदालत तक पहुंचाया, बल्कि कुछ महीनों के भीतर ही बलात्कारी को सजा भी हो गई। अब जब बलात्कार के एक सही आरोप पर राज्य की महिला मुख्यमंत्री का यह रूख था, तो फिर उस मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा की विपक्षी नेता का रूख संसदीय या सही होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? नतीजा यह हुआ कि रूपा गांगुली ने अपने ही प्रदेश बंगाल के खिलाफ ऐसी बेहूदी बात कह दी कि जिसे उनकी पार्टी भी शायद ही सही ठहरा पाएगी।
सांसद रूपा गांगुली को केन्द्र सरकार के कम्प्यूटरों में दर्ज ये आंकड़े बड़ी आसानी से हासिल होंगे कि 2015-16 के बरस में देश में दर्ज 34600 बलात्कारों में से सबसे अधिक उनकी ही पार्टी भाजपा के राज वाले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए हैं, और उनके ही लेफ्टिनेंट गवर्नर के पुलिसराज वाले दिल्ली-प्रदेश में हुए हैं। अकेले मप्र में 4391 बलात्कार हुए, और दिल्ली में 2199 बलात्कार दर्ज हुए। इसके बाद रूपा गांगुली की पार्टी की सरकार वाले महाराष्ट्र में 4144, उन्हीं की पार्टी की सरकार वाले राजस्थान में 3644 बलात्कार दर्ज हुए। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में 1129 बलात्कार दर्ज हुए, और आकार-आबादी में बंगाल के एक चौथाई हरियाणा में भाजपा की सरकार के तहत 1070 बलात्कार दर्ज हुए। इसलिए रूपा गांगुली ने एक बहुत ही गैरजिम्मेदार सांसद और बंगाली बनकर दिखाया है कि उन्होंने दूसरे देश-प्रदेश के लोगों को बंगाल आने के लिए एक तरह से मना ही कर दिया है।
दरअसल बलात्कार को लेकर इस देश में खबरों का ऐसा सैलाब हर दिन रहता है कि धीरे-धीरे बेरहम और बेशर्म नेताओं के बीच इसे लेकर संवेदना शून्य ही हो जाती है। हमने अलग-अलग कई पार्टियों के नेताओं के ऐसे बयान पढ़े हैं जो कि बलात्कार की शिकार महिला पर एक और बलात्कार की तरह रहते हैं। उत्तरप्रदेश के बकवासी समाजवादी पार्टी नेता आजम खां को ऐसी ही हिंसक बकवास के लिए सुप्रीम कोर्ट की लताड़ पड़ी और बिना शर्त माफी मांगकर ही वे जेल जाने से बचे। यह सिलसिला थमना चाहिए। हमारा मानना है कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने आजम खां को अदालती कटघरे में घसीटा था, ठीक वैसे ही पश्चिम बंगाल के हाईकोर्ट को रूपा गांगुली को नोटिस भेजकर बुलवाना चाहिए और यह पूछना चाहिए कि इस प्रदेश का ऐसा नुकसान करने के झूठ पर उन्हें क्या सजा दी जाए? लोगों को याद होगा कि रूपा गांगुली ने टीवी सीरियल महाभारत में द्रोपदी की भूमिका की थी। उस भूमिका में द्रोपदी के साथ कौरवों की तरफ से जिस तरह की बदसलूकी की गई थी, कम से कम उसका दर्द तो उन्हें याद रहना चाहिए कि ज्यादती की शिकार एक महिला के मन पर क्या गुजरती है। रूपा गांगुली का बंगाल के बलात्कारों की संस्कृति पर जो कहना है, वह बंगाल में रहने वाली हर लड़की या महिला के लिए बहुत बड़ी बेइज्जती की बात भी है, और शर्मिंदगी की बात भी है कि क्या बंगाल में कोई भी लड़की या महिला बलात्कार की शिकार हुए बिना है ही नहीं। रूपा गांगुली अदालत के अलावा भी महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग में घसीटी जानी चाहिए।

कामकाजी महिला के शोषण का अंत नहीं और कार्रवाई का ठिकाना नहीं

संपादकीय
14 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ के एक बड़े उद्योग, जिंदल में एक महिला ने वहां के दो बड़े अफसरों के खिलाफ देह शोषण की रिपोर्ट दर्ज कराई है। इसके एक हफ्ते पहले ही रायपुर में इसी उद्योग के एक बड़े अफसर का मामला पुलिस तक पहुंचा जो कि अपनी कॉलोनी की एक महिला की कार में लगातार अश्लील तस्वीरें डाल रहा था, और फिर सीसीटीवी फुटेज से वह पकड़ में आया, और माफी मांगने के बाद मामला रफा-दफा हुआ। इन दिनों ही छत्तीसगढ़ पुलिस के एक बड़े अफसर के खिलाफ तरह-तरह की जांच चल रही है कि उसने अपनी मातहत एक सिपाही का शोषण किया, और उसे रात-बिरात फोन कर-करके उसका जीना हराम कर दिया है। इस मामले की जांच हो चुकी है, लेकिन आगे की कार्रवाई की फाईल छत्तीसगढ़ सरकार के अलग-अलग दफ्तरों के बीच फुटबॉल की तरह फेंकी जा रही है।
कुछ महीने पहले राजधानी रायपुर में रेलवे के एक बड़े दफ्तर के कर्मचारियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम में जब देर रात एक महिला कर्मचारी ने एक बड़ी अफसर के साथ गाना गाने से यह कहकर इंकार किया कि इस गाने की उसकी तैयारी नहीं है, तो उसे अनुशासनहीनता मानकर नोटिस दिया गया, और उसका तबादला कर दिया गया। इस नोटिस की जुबान देखें तो ऐसा लगता है कि उस महिला ने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया। उसे यह गिनाया गया कि उसे सांस्कृतिक कोटे से नौकरी मिली थी, इसलिए वह गाना गाने से मना नहीं कर सकती। अभी तक की जो खबरें हैं उनमें ऐसी चर्चा है कि इस महिला को रेलवे के सबसे बड़े एक अफसर के साथ एक बहुत ही अश्लील और फूहड़ गाना गाने के लिए मजबूर किया जा रहा था, और उसने इससे इंकार कर दिया। यह बात मीडिया मेें आई तो अफसरों के हाथ-पांव फूले, और आनन-फानन इस कार्रवाई को रद्द किया गया।
राज्य के महिला आयोग ने इस घटना का नोटिस लेने में बहुत देर की, जबकि उसे जितने साधन-सुविधा मिले हुए हैं, उसे तुरंत ही इस महिला तक पहुंचना था, और उसका साथ देना था। दूसरी बात यह कि रेलवे के इस अफसर के खिलाफ कई तरह के जुर्म दर्ज होने चाहिए। महिला आयोग को तो जुर्म दर्ज करना ही चाहिए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को भी इस मामले पर इन अफसरों को अदालत में खड़ा करना चाहिए, और इन पर प्रताडऩा का मुकदमा अदालत को खुद को शुरू करना चाहिए। इस महिला के मामले में तो रेलवे बुरी तरह फंस गया है, और उसे तुरंत अपने तौर-तरीके सुधारने पड़े, और कार्रवाई वापिस लेनी पड़ी, लेकिन महिला कर्मचारियों के साथ केन्द्र के संस्थानों मेें, राज्य सरकार के संस्थानों मेें, और निजी संस्थानों में भी शोषण और ज्यादती एक आम बात है। अफसरों द्वारा यौन शोषण के मामलों की फाइलें एक टेबिल से दूसरे टेबिल पर जिस तरह जा रही हैं, और इससे राज्य की महिला कर्मचारियों के बीच संदेश यही जाता है कि उनकी शिकायत से किसी बड़े अफसर का आसानी से कुछ बिगडऩे वाला नहीं है। ऐसी कितनी महिला कर्मचारी हो सकती हैं जो कि ऐसी लंबी और कड़ी चढ़ाई वाली लड़ाई लडऩे का दमखम रखती हों?
राज्य सरकार को महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपनी नीति एकदम साफ करनी चाहिए। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और इससे कामकाजी महिलाओं के बीच आत्मविश्वास पैदा नहीं हो सकेगा। एक तरफ तो राज्य सरकार महिलाओं के सरकारी नौकरी में दाखिले की उम्र सीमा में बहुत बड़ी छूट देकर उन्हें बढ़ावा देना चाहती है, दे रही है, दूसरी तरफ महिलाओं की प्रताडऩा करने वाले मंत्री, विधायक, या अफसर खुले घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं दिखने पर सामाजिक असमानता बढ़ते चलती है। हमारा तो यह भी मानना है कि महिला कर्मचारी पर ऐसी ज्यादती की खबर आने पर राज्य सरकार को भी इस बारे मेें सीधे कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, न कि ऐसे मामलों को लटकाकर रखा जाए। लेकिन पहले राज्य सरकार अपने पास दर्ज मामलों पर कार्रवाई कर चुकी होती, तो उसे ऐसा नैतिक अधिकार भी होता। फिलहाल सामाजिक मोर्चों पर भी ऐसे मामलों को उठाने की जरूरत है ताकि महिलाएं अकेली न रह जाएं।

हत्या-आत्महत्या जैसी घरेलू हिंसा थामने परामर्शदाताओं की जरूरत

संपादकीय
13 जुलाई 2017


पिछले दो दिनों में छत्तीसगढ़ के रायपुर के अखबार कुछ ऐसे हैं कि उन्हें निचोड़ें तो लहू टपकने लगेगा। और यह लहू भी किसी नक्सल या पेशेवर मुजरिमों के जुर्म से बहने वाला लहू नहीं है, यह परिवार के भीतर निजी जिंदगी में अपनों पर की गई हिंसा का ऐसा लहू है जो कि दिल दहला देता है। अभी कुछ दिन पहले ही किसी बड़ी अदालत ने यह कहा या लिखा था कि जब तक किसी महिला की दिमागी हालत सामान्य रहती है, वह कभी अपने बच्चों को नहीं मार सकतीं। लेकिन छत्तीसगढ़ में दो दिनों में अपनों पर ही ऐसे जुर्म हुए कि उन्हें ऐसी अदालती परिभाषा से नहीं समझा जा सकता।
एक महिला ने अपनी इकलौती संतान को अपने ही घर की छत पर पानी की टंकी में डुबाकर मार डाला, क्योंकि वह महिला एक स्कूली दोस्त से शादी के बाद भी प्रेम करती थी, और प्रेमी उसे संतान सहित मंजूर करने को तैयार नहीं था। प्रेमी के पास जाने के लिए उसने इकलौती बच्ची को डुबाकर मार डाला। कल ही एक मजदूर ने अपने दो बच्चों को इसलिए फावड़े से मार दिया क्योंकि पत्नी ने साथ में प्रदेश के बाहर के ईंट भ_े पर मजदूरी के लिए जाने से मना कर दिया था क्योंकि वहां पति नशे में उसे पीटता था, गुस्सा उतरा बच्चों पर और उन्हें बाप स्कूल ले जाने के नाम पर लेकर निकला और सोच-समझकर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। यह किसी क्षणिक आवेश का नतीजा नहीं था, बल्कि ठंडे दिल-दिमाग से सोचकर ऐसा किया गया। एक दूसरे मामले में पति की मौत से दुखी महिला ने छोटे बेटे के नाम चि_ी छोड़ी कि वह पति के बिना जी नहीं पा रही है, और वह छोटी बच्ची को लेकर फांसी पर झूल गई। इस किस्म की कुछ और घटनाएं भी हैं, जो कि एक साथ सामने आने की वजह से सोचने पर, और यहां लिखने पर मजबूर करती हैं।
छत्तीसगढ़ आमतौर पर कई किस्म के जुर्म से बचा हुआ प्रदेश माना जाता है। यहां पर पंजाब की तरह नशे की लत नहीं है जो कि वहां जानलेवा साबित हो रही है। इस राज्य में केरल की तरह राजनीतिक हिंसा भी नहीं होती कि आरएसएस और सीपीएम के लोग एक-दूसरे का कत्ल करते रहें। यह राज्य मजदूर हिंसा से भी आजाद है, और छत्तीसगढ़ के मजदूर जगत में अगर अकेली हत्या हुई है, तो वह मालिकों ने  एक मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की करवाई थी, उत्तर-पूर्व या हरियाणा की तरह यहां मजदूर मालिकों या मैनेजरों की हत्या नहीं करते। लेकिन निजी हिंसा और निजी जुल्म यहां पर कम नहीं हैं। इसकी वजह शायद यह है कि इंसानी मिजाज मोटे तौर पर अधिकतर जगहों पर एक सा रहता है, और पति-पत्नी के बीच तनाव में यह राज्य भी पीछे नहीं है। शादी से परे के अवैध कहे जाने वाले संबंध यहां बड़ी आम बात हैं, किसी भी दूसरे राज्य की तरह, और बहुत से मामलों में ऐसे संबंध कत्ल की अकेली वजह रहते हैं। समाज में वैसे तो शादीशुदा जिंदगी के भीतर वफादारी की उम्मीदें अव्यवहारिक होती हैं, और उनका टूटना बहुत से मामलों में सामने आते रहता है, ऐसे में कुछ शादियां टूट जाती हैं, और लोग अपनी-अपनी राह लग लेते हैं, लेकिन कुछ मामलों में लोगों को इतनी नाराजगी होती है, उनका खून इतना खौलता है कि मामला कत्ल तक पहुंच जाता है। ऐसे अधिकतर मामलों में सामान्य समझबूझ के मुजरिम भी यह अंदाज लगा सकते हैं कि कुछ ही दिनों में पुलिस उन तक जरूर पहुंच जाएगी, लेकिन फिर भी लोग ऐसा जुर्म करते हैं।
इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि समाज या सरकार, या दोनों मिलकर ऐसे परामर्श केन्द्र उपलब्ध कराएं जहां पर प्रेम संबंधों या वैवाहिक संबंधों के तनाव सुलझाए जा सकें। आज जुर्म के बाद तो पुलिस, अदालत, और जेल का सिलसिला ही रह जाता है, और कैद काटकर निकले हुए लोगों के लिए शायद ही कोई भविष्य बचता है। ऐसे में हत्या या आत्महत्या जैसे तनाव से बचाने के लिए लोगों को सहज-सुलभ परामर्श बहुत कारगर हो सकता है। ऐसे परामर्शदाता जरूरी नहीं है कि मनोचिकित्सक ही हों, क्योंकि उनकी संख्या ही मानसिक रोगियों की जरूरत पूरी नहीं कर पाती है। इनके लिए ऐसे मनोविश्लेषक और परामर्शदाता जरूरी हैं जो कि पारिवारिक संबंधों के भीतर के तनाव को कम करने के रास्ते सुझा सकें। आज जगह-जगह से इम्तिहान की नाकामयाबी के बाद की खुदकुशी सुनाई पड़ती है। हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर भी आ जाती है कि पसंदीदा मोबाइल फोन न मिल पाने पर घर के भीतर नाराज बच्चे ने खुदकुशी कर ली। प्रेम-प्रसंग में तो प्रेमी-जोड़े जगह-जगह पेड़ों पर टंगे दिख जाते हैं। वैध-अवैध प्रेम-संबंध और उसमें कत्ल भी बड़ी संख्या में हो रहे हैं। यह नौबत सरकार को खतरनाक नहीं भी लग सकती है, लेकिन सामाजिक तनाव को आज घटाना शुरू करेंगे, तो उसका असर दिखने में बरसों लग जाएंगे। इसलिए राज्य सरकार को राज्य के विश्वविद्यालयों में परामर्श के कोर्स शुरू करने चाहिए, और मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान के साथ परामर्श की तकनीक पढ़ाकर, सिखाकर समाज को ऐसे लोगों की सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए।

देश की गंगा-जमुनी तहजीब को तबाह करने वाले नफरतजीवी

संपादकीय
12 जुलाई 2017


अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर आतंकी हमले की खबर देखें तो दिल को छू लेने वाली एक जानकारी सामने आती है कि गुजरात से लोगों को लेकर आए हुए एक मुस्लिम बस ड्राईवर ने आतंकी गोलियों के हमले के चलते हुए भी बस को वहां से भगाकर ले जाने की बहादुरी दिखाई, और उसी वजह से अधिकतर लोगों की जान बची। इस बहादुरी की तारीफ करते हुए गुजरात के भाजपा मुख्यमंत्री ने इस मुस्लिम ड्राईवर को पांच लाख रूपए ईनाम देने की घोषणा भी की है। कल ही केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान छपा था कि कश्मीर के तमाम लोगों ने बिना किसी हिचक और भेदभाव के इस हमले की निंदा की है और उन्होंने इस कश्मीरियत को सलाम किया। उन्होंने बहुत से शब्दों में कश्मीर की तारीफ की। कल ही ये खबरें भी आईं कि आतंकी हमले से घायल हिन्दू तीर्थयात्रियों को बचाने के लिए मुस्लिम आबादी के लोग टूट पड़े, और उन्हीं की मेहनत से घायलों की जिंदगियां बचीं। इस मौके पर ये पुरानी जानकारी और परंपरा दुबारा सामने आ रही है कि अमरनाथ के हिन्दू तीर्थयात्रियों को पालकी पर ढोकर ले जाने वाले सारे कुली वहां के स्थानीय मुस्लिम रहते हैं, घोड़े वाले तमाम लोग मुस्लिम रहते हैं, और पूजा का सारा सामान मुस्लिम ही इंतजाम करते हैं।
यह देश साम्प्रदायिकता की इस ताजा लहर के पहले तक बहुत लंबे सद्भाव का इतिहास दर्ज कर चुका है, और इसे भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति कहा गया था। आज भी जगह-जगह यही देखने मिलता है कि कहीं लोग नमाज पढऩे के लिए जगह नहीं पा रहे हैं, तो उनके लिए गुरूद्वारे खोल दिए जाते हैं, मंदिर के अहातों में उन्हें न्यौता देकर उनका रोजा तुड़वाया जाता है, उनके खाने का इंतजाम किया जाता है। दूसरी तरफ इसी देश में ऐसे घोर साम्प्रदायिक और नफरतजीवी लोग हैं जो कि ये ऐलान करते हैं कि ऐसे मंदिरों को गंगाजल से धोकर साफ करेंगे।
भारत में हिन्दुओं की कोई भी शादी नहीं हो सकती जिसमें घोड़ी वाले, बैंडबाजे वाले, रौशनी वाले, मेहंदी लगाने वाले, संगीत वाले, या और सौ किस्म के सामान बनाने वाले लोग मुस्लिम न हों। और सदियों से यह सामाजिक बर्ताव चले आ रहा था। आज से सौ बरस पहले भी हिन्दू समाज में ऐसे लोग थे जिनके घर शादियों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के दोस्तों के लिए दावतें होती थीं, और समझदार लोग पहली दावत मुस्लिमों के लिए करते थे, ताकि उन्हें यह न लगे कि एक दिन पहले का बचा हुआ खाना परोसा गया है। देश में सभी धर्मों के बीच सद्भाव की अनगिनत कहानियां हैं, और अनगिनत परंपराएं हैं, और भारत जितनी विविधता तो शायद ही दुनिया के किसी देश में रही हो, और अनेकता में एकता न सिर्फ भाषा का खेल रहा, बल्कि हकीकत में इस देश में अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के बीच सामाजिक समरसता हमेशा से रही।
आज अमरनाथ के दर्जनों मुसाफिर एक मुस्लिम ड्राईवर की वजह से जिंदा बचे हैं, लेकिन आज भी इस बीच भी लोग साम्प्रदायिक नफरत को फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। हरियाणा में बजरंग दल के गुंडों ने एक मस्जिद के इमाम को इस बात के लिए पीटा कि वे उससे भारत माता की जय कहलवाना चाहते थे। ऐसा करने वाले लोग न तो भारत माता की उस कल्पना का सम्मान करते हैं जो कि एक धर्मविशेष की सोच है, और न ही वे उस हिन्दू धर्म का सम्मान करते हैं जिसका डंडा-झंडा लेकर वे चलते हैं। आज देश में इस बात की जरूरत है कि चुनावी वोटों के लिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश खत्म हो, और लोगों के बीच एक वैज्ञानिक सोच विकसित की जाए, लोगों के बीच नफरत को घटाया जाए।
यह बात भी समझना चाहिए कि नफरत हटे बिना, साम्प्रदायिक तनाव घटे बिना इस देश की अर्थव्यवस्था भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं छू पाएगी। 

अमरनाथ-यात्रा पर आतंकी हमले को धर्म, देश, प्रदेश से हड़बड़ी में न जोड़ें

संपादकीय
11 जुलाई 2017


हिंदुस्तान में सबसे कड़ी सुरक्षा के साथ हर बरस होने वाली अमरनाथ यात्रा पर कल हुए आतंकी हमले से अभी कश्मीर और दिल्ली संभल भी नहीं पाए हैं कि बहुत से राजनीतिक दलों ने राजनीति शुरू कर दी है। विपक्ष जिम्मेदारी की याद दिला रहा है, और भाजपा के बड़े नेता राम माधव तुरंत यह बयान दे रहे हैं कि सुरक्षा दलों से कोई चूक नहीं हुई है। अभी जांच को कोसों दूर है, और केंद्र और राज्य सरकारें, केंद्रीय सुरक्षा बल सब मिलकर मारे गए लोगों के शव और घायलों को कश्मीर से गुजरात पहुंचाने में लगे हैं, और ऐसे में किसी पार्टी या किसी नेता को न तो भड़काऊ बातें करनी चाहिए, और न ही गैरजिम्मेदारी से तोहमत लगानी चाहिए, या सर्टिफिकेट बांटना चाहिए। देश में आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान जरूर तारीफ के लायक है जिसमें उन्होंने इस हमले के बाद कश्मीर की तमाम जनता द्वारा की गई मदद की सराहना करते हुए कश्मीरियों को उनकी कश्मीरियत के लिए सलाम किया है। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी अपनी तरफ से पूरी जिम्मेदारी की बात करते हुए यह कहा है कि आज पूरा कश्मीर और कश्मीरियत शर्म से झुक गए हैं।
पहली नजर में जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक गुजरात की यह पर्यटन बस अमरनाथ यात्रा के लिए कड़ाई से दर्ज किए जाने वाले मुसाफिरों की तरह दर्ज नहीं थी, और इस यात्रा का इंतजाम करने वाले सुरक्षा बलों को भी इसकी जानकारी नहीं थी। गुजरात से चलकर बिना हिफाजत के इंतजाम के, और बिना सरकार को खबर किए यह बस अमरनाथ तक पहुंच गई, और लौटते में यह बिना किसी सुरक्षा काफिले के घूमते-फिरते अकेले ही लौट रही थी, और आतंकी हमले का शिकार हो गई। इस पूरे सिलसिले में कई जगहों पर चूक हुई दिखती है, और सैलानी-तीर्थयात्रियों की तरफ से बस के आयोजकों ने एक बड़ी गैरजिम्मेदारी भी दिखाई है। नतीजा यह हुआ कि बहुत से बेकसूर मारे गए, बहुत से घायल हुए, और भारत की एकता-सद्भावना पर भी चोट लगी है।
आज दिक्कत यह है कि हिंदुस्तान में आतंक को धर्म से जोड़े बिना नहीं देखा जा रहा, और न ही देखा जा सकता है। ऐसे में सोशल मीडिया पर इस देश के नफरतजीवी लोग टूट पड़े हैं, और वे इसका बदला लेने के भड़काऊ नारे लगा रहे हैं। बेचेहरा आतंकी जब ऐसे हमले करते हैं, तो उनका कोई पता-ठिकाना तो रहता नहीं कि मोदी सरकार या कश्मीर सरकार उन पर आनन-फानन हमले कर दे। फिर यह बात भी समझना जरूरी है कि ऐसे हर हमले के पीछे जांच और सुबूत से गुजरे बिना, तर्कसंगत और न्यायसंगत निष्कर्ष निकाले बिना सीधे-सीधे पाकिस्तान पर तोहमत लगा देने का मतलब यह भी होगा कि हम अपने देश के भीतर के आतंकी संगठनों को अनदेखा कर देंगे, और ऐसा करना देश की आगे की हिफाजत के लिए बहुत बुरी बात होगी। आज ही यह खबर भी कश्मीर से आ रही है कि वहां पुलिस ने एक ऐसे लश्कर आतंकी नौजवान को गिरफ्तार किया है जो उत्तरप्रदेश के एक हिंदू ब्राम्हण परिवार का है, और वह जाकर मुस्लिम बनकर लश्कर में शामिल हो गया था। इसलिए ऐसे आतंकी हमले को न किसी प्रदेश से जोडऩा चाहिए, न किसी धर्म से, और न ही किसी देश से, जब तक कि उसके पुख्ता सुबूत न मिल जाएं।
अमरनाथ यात्रा हमेशा से खतरे के साए में होती है, और हिंदुओं के इस एक सबसे बड़े तीर्थ में उनका वजन ढोने के काम से लेकर उनके रीति-रिवाज के हर सामान तक का इंतजाम कश्मीर के मुस्लिम ही करते हैं। अभी कल जो हमला हुआ, उसके बाद भी घायलों को बचाने और लोगों की मदद करने का काम वहां के मुस्लिमों ने ही किया। और इस बात के लिए राजनाथ सिंह ने दिल खोलकर उनकी तारीफ भी की है। आज देश को भीतरी और बाहरी आतंकी हमलों से बचाने के लिए ऐसी ही दरियादिली की जरूरत है, क्योंकि नफरत फैलाने वाले भड़काऊ साम्प्रदायिक और हिंसक लोग आतंक को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। केंद्र सरकार के सामने यह मौका बहुत सी प्रशासनिक और राजनीतिक दिक्कतें लेकर आया है। केंद्र के साथ-साथ कश्मीर में भी एनडीए की सरकार है, और जिस गुजरात के लोग मारे गए हैं, वह गुजरात भी भाजपा के राज वाला है, और चुनावों में जा रहा है। ऐसे में कश्मीर में लोकतंत्र को असफल करार देने का काम भी कई लोग करेंगे, लेकिन हमारा यह मानना है कि कश्मीर में निर्वाचित सरकार को हटाकर राष्ट्रपति-शासन लगाना एक गलत फैसला होगा, क्योंकि सेना की तैनाती से लेकर केंद्रीय बलों को मिले हुए घोषित-अघोषित अधिकारों तक, कश्मीर सरकार मोटे तौर पर दिल्ली की मोदी सरकार से मिलकर ही चल रही है, और दोनों के बीच कोई बुनियादी टकराव नहीं है। लेकिन एक बात तय दिख रही है कि बहुत बरसों बाद कश्मीर में हालात इतने खराब हुए हैं, और केंद्र सरकार का सबसे बड़ा हिस्सा इस नौबत की जिम्मेदारी में रहेगा ही।

मौसम की मुसीबतों से निपटने की तैयारी हो

संपादकीय
10 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ वैसे तो बड़ी कुदरती मुसीबतों से बचा हुआ प्रदेश है क्योंकि यह समंदर से दूर है और यहां समुद्री तूफान य सुनामी जैसे खतरे नहीं है। यह पहाड़ी इलाका भी नहीं है इसलिए यहां भूस्खलन नहीं होता, और उत्तराखंड जैसी बाढ़ नहीं आती, इस इलाके में भूकंप की तबाही भी नहीं होती, और इन्हीं सब वजहों से यहां पर जनता और सरकार इन दिनों का चौकन्नापन प्राकृतिक विपदाओं के लिए नहीं रह जाता। यहां सिर्फ एक किस्म की दिक्कत आती है, मानसून में अधिक पानी गिरने से शहरों के भीतर बस्तियों में पानी भर जाता है, और शहरों के बीच कहीं-कहीं पर पुल डूब जाते हैं, कहीं पर सड़कें बह जाती हैं। लेकिन हर राज्य को अपनी छोटी या बड़ी हर किस्म की दिक्कत से जूझने की बेहतर तैयारी करनी चाहिए।
चूंकि छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक विपदा में बड़ी संख्या में मौतें नहीं होती हैं, इसलिए लोगों का अधिक ध्यान बाकी छोटी दिक्कतों की तरफ नहीं जाता है। शहरी बस्तियों में जब पानी भरता है तो गरीबों के घर बहुत तबाह होते हैं। उनके सामान की बर्बादी की कोई भरपाई भी नहीं हो पाती है, और उनकी रोजी-कमाई भी खत्म होती है। दूसरी तरफ सरकार की अपनी योजनाओं का सामान गांव-गांव तक अगर बारिश के पहले पहुंच नहीं जाता है, तो बारिश के महीनों में लोगों को राशन या मिट्टीतेल, और अब गैस सिलेंडर की दिक्कत भी होती है, खेती में खाद और बीज वक्त पर न पहुंचे तो उससे भी बड़ा नुकसान होता है। इसलिए छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की सरकार को जिलों के स्तर पर अपनी इसी तैयारी में ताकत झोंकनी चाहिए कि बारिश की वजह से आने वाली दिक्कतों का यथासंभव इलाज पहले से कैसे ढूंढ लिया जाए।
दूसरी तरफ स्कूलों का हाल है जहां पर इमारत खराब रहती है, फर्नीचर टूटे रहते हैं, और बच्चों को वक्त पर सरकारी मुफ्त-पोशाक नहीं मिल पाती है। सरकार को अपने अमले को कमर कसकर ऐसे काम में भी लगाना चाहिए। स्कूलों में अगर समय पर पढ़ाई नहीं हो पाती है, तो देश की उत्पादकता के उस नुकसान का कोई हिसाब नहीं लग पाता लेकिन वह नुकसान होता तो है। एक दूसरी बड़ी जरूरत ईलाज की रहती है, इस मौसम में होने वाली बीमारियों के साथ-साथ सांप के काट लेने से बहुत मौतें होती हैं, और सरकारी अस्पतालों में इसके लिए जरूरी दवाईयां नहीं रहतीं। वैसे तो सरकार बहुत सी बैठकें करती है, लेकिन सरकारी अमला या तो पूरी जिम्मेदारी के साथ काम करने का आदी नहीं रहता है, या फिर कहीं बजट की कमी, तो कहीं अफसरों की कमी से काम समय पर नहीं हो पाता।
राज्य सरकार को बारिश के मौसम में ही साल भर की दिक्कतों को झेलना पड़ता है, लेकिन ये दिक्कतें हर बरस तकरीबन एक सी रहती हैं, और इनसे जूझने का पुख्ता इंतजाम कर लेना चाहिए।

सोशल मीडिया पर भड़काना और सरकारों की चुप्पी जारी

संपादकीय
9 जुलाई 2017


एक भोजपुरी फिल्म में एक महिला से बदसलूकी के एक दृश्य को हरियाणा की एक बड़ी भाजपा नेता ने बंगाल में हिंदू महिलाओं के साथ किए जा रहे जुल्म का नजारा बताते हुए बंगाल की तृणमूल सरकार के खिलाफ बहुत कुछ लिखा। लेकिन यह झूठ तुरंत पकड़ आ गया और लगातार इसे सोशल मीडिया पर उजागर भी किया गया। दूसरी तरफ बांग्लादेश की कुछ तस्वीरों को लेकर, दुनिया के किसी और हिस्से के वीडियो को लेकर उन्हें बंगाल में हिंदुओं पर अत्याचार बताते हुए एक बड़ा अभियान छेड़ा गया है। और जाने-पहचाने चेहरों ने अपने नाम के असली सोशल मीडिया खातों पर यह अभियान चला रखा है। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र के तहत मिली हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का और कितना बेजा इस्तेमाल केंद्र और राज्य सरकारें बर्दाश्त करेंगी? अभी इसी पल यह खबर भी आ रही है कि दिल्ली के करीब उत्तरप्रदेश में ट्रेन में मुस्लिम नौजवान की हत्या के एक और आरोपी को पुलिस ने महाराष्ट्र में गिरफ्तार किया है। देश में अल्पसंख्यक को, दलित को, और आदिवासी को अलग-अलग फर्जी वजहें बताकर जिस तरह नफरत का शिकार बनाया जा रहा है, उस अभियान की आग में घी डालने के लिए सोशल मीडिया पर लोग पूरे हौसले के साथ और खुले मकसद के साथ जो भड़काऊ अभियान चला रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि अगर कार्रवाई में देर होगी, तो आग जंगल की आग की तरह फैलती चली जाएगी।
हमारा ख्याल है कि आज देश में कई अलग-अलग कोनों से ऐसी साजिशों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत है। सबसे पहली बात तो यह कि राजनीतिक दल और धार्मिक-सामाजिक संगठन अपने लोगों की ऐसी हरकतों पर उनको तुरंत बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है, और आग लगाऊ लोगों को अधिक महत्व मिल रहा है। दूसरी तरफ केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत ऐसे भड़कावे पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, और उसके लिए देश में बहुत कड़ा कानून भी बना हुआ है, लेकिन उसका इस्तेमाल छांट-छांटकर होता है। तीसरी बात यह कि देश की बड़ी अदालतें खुद होकर भी बहुत से मामलों में पहल करती हैं, कार्रवाई करती हैं, और सोशल मीडिया पर भड़कावे के ये मामले ऐसे हैं कि जिन पर अगर सरकारें तुरंत कार्रवाई नहीं करें तो अदालतों को खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए। भारत के हाईकोर्ट और यहां की सुप्रीम कोर्ट बहुत से ऐसे मामलों में अपनी सक्रियता दिखाते रहते हैं, और यह एक मामला ऐसा है कि लोकतंत्र को जलने से बचाने के लिए अदालतों को खुद होकर यह पहल करनी होगी।
आज समझदार लोग सोशल मीडिया और मीडिया में भी चाहे कम संख्या में हों, मौजूद तो हैं। उन्हें यह पहल करनी चाहिए कि ऐसी हर साजिश का भांडाफोड़ करते चलें, और सोशल मीडिया चलाने वाली कंपनियों को लगातार शिकायतें भेजें ताकि दंगाईयों के अकाउंट ब्लॉक होते रहें।

आत्मगौरव का भारतीय पाखंड छोड़े बिना निजी हिंसा न घटेगी

संपादकीय
8 जुलाई 2017


हिन्दुस्तान से लेकर दुनिया के बाकी बहुत से देशों तक निजी और पारिवारिक हिंसा की दिल दहलाने वाली खबरें आती हैं। हमारे आसपास भी कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब परिवार के भीतर हत्या और आत्महत्या जैसे मामले सामने न आते हों। हिन्दुस्तान में जहां पर कि लोगों को मानसिक परामर्शदाता या मानसिक चिकित्सक उपलब्ध नहीं है, वहां से लेकर दुनिया के विकसित या संपन्न देशों में जहां पर मानसिक चिकित्सा आसानी से हासिल है, सभी जगहों पर निजी हिंसा होती है, और लोग या तो खुद को मार डालते हैं, या कि अपने प्रेमी-प्रेमिका को, परिवार के लोगों को, या सहकर्मियों को। ऐसे बहुत से मामलों में जब हिंसा हो चुकी रहती है, तब अगर आसपास के लोगों से पूछा जाता है तो पता लगता है कि मुजरिम के ऐसे हिंसक मिजाज का उन्हें अंदाज ही नहीं था।
ऐसे में दुनिया के कुछ ऐसे देश हैं जहां पर ऐसी हिंसा बहुत कम है, न के बराबर है। योरप में स्कैंडेनेवियाई कहे जाने वाले देश बहुत से सर्वे में सबसे सुखी देशों में पाए गए हैं, और वहां के लोग अपने जीवन से, अपने कामकाज से, और परिवार के अपने किस्म के ढांचे से संतुष्ट हैं, सुखी हैं, और खुश हैं। वहां पर शादी का रिवाज है भी,  और लोग उसके बिना भी रह लेते हैं। परिवार के लोगों के लिए, और समाज के लिए यह बात मायने ही नहीं रखती कि वहां शादी के पहले बच्चे हो रहे हैं, या कि लोग अपने ही सेक्स के लोगों से समलैंगिक विवाह कर रहे हैं। न शादी का महत्व, और न तलाक का, लेकिन लोग खुश हैं। दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान में देखते हैं तो यहां के लोग एक झूठे आत्मगौरव में जीने का मजा लेते हैं कि पश्चिम बहुत ही तनाव और कुंठा में जीता है, और मानसिक शांति के लिए वह भारत की तरफ देखता है। ऐसा धोखा शायद इसलिए भी होता है कि पश्चिम से आए कुछ गोरे या काले लोग भारत के कुछ शहरों में योग करते, या बाबा लोगों की चिलम से गांजा पीते दिख जाते हैं, और आम हिन्दुस्तानी यह मान लेते हैं कि ये लोग वहां अपने देश में मानसिक अशांति के शिकार हैं, और शांति के लिए भारत आए हैं।
यह धोखा लोगों को अपने रीति-रिवाजों से, अपने पाखंडों से चिपके रहने में मजा देता है, और लोगों को लगता है कि भारतीय संस्कृति में कोई ऐसी चीज है, या कि सारी की सारी संस्कृति ऐसी है कि लोग यहां आते हैं, और वे लोग अपने खुद के जीवन में बड़े दुखी हैं। ऐसा झूठा गौरव लोगों को भारत में प्रेम के खिलाफ हिंसा, दूसरी जाति में शादी के खिलाफ हिंसा, दूसरे धर्म में शादी के खिलाफ हिंसा के लिए उतारू करता है। फिर यहां नालों और घूरों पर जो नवजात शिशु मिलते हैं वे तमाम हिन्दुस्तानी किसी मानसिक शांत देश की संतानें नहीं रहते, वे एक पाखंडी देश की औलाद रहते हैं जो कि अविवाहित या अकेली महिला को मां बनने का हक नहीं देता। इस झूठे आत्मगौरव और दंभ से मुक्त हुए बिना भारत में हिंसक तौर-तरीके खत्म होने वाले नहीं हैं। यहां की पारिवारिक हिंसा दुनिया के कुछ दूसरे देशों की हिंसा से अलग इस तरह है कि यहां प्रेम के खिलाफ खूब हत्याएं होती हैं, जो कि दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में नहीं होतीं। हम पहले भी कई बार इसी जगह लिख चुके हैं कि हत्या और आत्महत्या तो खबरों में आ जाती है, लेकिन इनके पहले तक की कुंठा और निराशा खबरों में नहीं आतीं। भारत में जो लोग निजी पसंद और प्रेम की आजादी नहीं पाते हैं, उनका समाज के लिए योगदान भी कम रहता है, ऐसे लोग हिंसक भी अधिक हो सकते हैं, चाहे दूसरों के प्रति, चाहे अपनों के प्रति। भारत को यह मानना होगा कि यह एक बेहद हिंसक समाज है, और यहां कोई शांति की तलाश में नहीं आते, यहां पर धर्म और आध्यात्म का जो तिलस्म दिखता है, उस फेर में सैलानी आते हैं, और वे अपनी जिंदगी में यहां के मुकाबले अधिक खुश हैं, अधिक प्रेम से जीते हैं, और कम हिंसा करते हैं।

राजनीतिक बदले के आरोपों से बचने चोरों को क्यों बख्शें?

संपादकीय
7 जुलाई 2017


बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के पति, और एक वर्तमान उपमुख्यमंत्री के पिता लालू यादव के ठिकानों पर सीबीआई के छापे पड़े हैं, और उन पर आरोप है कि रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने यूपीए सरकार के वक्त ठेके देने में गड़बड़ी की थी, और ठेके पाने वाली कंपनी से इसके एवज में बड़ी महंगी जमीनों के तोहफे एक बेनामी रास्ते से हासिल किए। जैसा कि आमतौर पर होता है लालू यादव और उनकी पार्टी ने इसे केन्द्र सरकार की मनमानी और बदनीयत कहा है, और दावा किया है कि लालू यादव ऐसी कार्रवाई से और अधिक ताकतवर होकर उभरेंगे। लालू यादव का सीबीआई से यह वास्ता नया नहीं है, और भ्रष्टाचार के आरोपों के दाग उन पर नए नहीं हैं। उनका पूरा कुनबा आज तरह-तरह की जांच से घिरा हुआ है, और ऐसी कार्रवाईयां उनके खिलाफ दशकों से चल रही हैं, एक अदालत से वे सजा भी पा चुके हैं, और बड़ी अदालत में अपील करके अभी जेल के बाहर हैं।
यह पूरा सिलसिला बड़ा निराश करने वाला है। जो लालू यादव साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई की बड़ी मुनादी करके सिर्फ साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर देश के तमाम गैरभाजपाई विपक्ष को एक करने का झंडा लेकर चलते हैं, उनके झंडे का डंडा ही बेईमानी से हासिल किया हुआ दिखता है। चारा घोटाले से लेकर परले दर्जे की कुनबापरस्ती तक, और अब उनकी सांसद बेटी के अपने पति सहित सैकड़ों करोड़ की अघोषित संपत्ति की जांच में घिरने तक, कौन सी ऐसी बात है जो लालू यादव की साख को चोट न पहुंचाती हो? लेकिन महज साम्प्रदायिकता-विरोध के नाम पर लालू यादव वामपंथियों से लेकर कांग्रेस तक के बीच एक स्वीकार्य नेता बने हुए हैं, और धर्मनिरपेक्षता को बचाने की मुहिम में लालू की बाकी तमाम खामियों को अनदेखा कर दिया जाता है। लेकिन लालू ने अपने कुनबे के साथ बिहार पर राज करते हुए बिहार को जिस बदहाल में पहुंचाया, उसे कोई भुला नहीं है, और आज नीतीश की बिहार सरकार लालू के साथ ही जिस तरह की मोहताज है, उसके चलते लालू के कुनबे का भ्रष्टाचार बिहार में जारी दिखता है।
कई बार यह हैरानी होती है कि किसी एक नेता, या किसी एक पार्टी, या नेता के कुनबे को आखिर कितनी दौलत की जरूरत होती है? और एक तरफ ममता बैनर्जी भी हैं जिन पर भ्रष्टाचार के इस तरह के आरोप नहीं लगते, और जो सादगी के साथ सरकार चलाती हैं। खुद लालू के भागीदार नीतीश कुमार पर ऐसे कोई आरोप नहीं लगे, और दूसरी तरफ जयललिता, बादल परिवार, मुलायम परिवार, ऐसी कई मिसालें हैं कि एक कुनबे की पार्टी किस कदर भ्रष्ट हो जाती है, और एक राजनीतिक विचारधारा का पाखंड दिखाते हुए किस तरह प्रदेश को लूटती है। इसी सिलसिले में हरियाणा का नाम गिनाना जरूरी है जहां के मुख्यमंत्री रह चुके देवीलाल के मुख्यमंत्री रह चुके बेटे ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार के आरोप में लंबी कैद काट रहे हैं। मायावती के कुनबे पर सैकड़ों-हजारों करोड़ की काली कमाई के आरोप लगे हुए हैं, और झारखंड में एक विधायक वाली पार्टी के मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा जेल काटकर अभी बाहर हैं।
दरअसल भारत में धर्मनिरपेक्षता को जितना नुकसान भाजपा या उसके साथियों ने नहीं पहुंचाया, उतना नुकसान साम्प्रदायिकता-विरोधी होने का दावा करने वाले भ्रष्ट नेताओं ने पहुंचाया है जिन्होंने यह जनधारणा बनाई कि साम्प्रदायिकता-विरोध तो नाम है, और महज भ्रष्टाचार काम है। भारतीय लोकतंत्र में यह एक बहुत ही निराशाजनक और तकलीफदेह तस्वीर है कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ, या कि समाजवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग परले दर्जे के भ्रष्ट हैं, परले दर्जे के कुनबापरस्त हैं, और वे लोकतंत्र की साख भी चौपट कर रहे हैं।
जहां तक विपक्षी नेताओं पर सीबीआई की कार्रवाई की बात है, तो हम इसके खिलाफ नहीं हैं। मोदी दस से अधिक बरस तक गुजरात में मुख्यमंत्री रहे, और उस पूरे दौर में दिल्ली में यूपीए की सरकार थी। सीबीआई भी यूपीए के पास थी, आयकर भी, और ईडी भी। लेकिन अगर उस पूरे दौर में मोदी को कटघरे तक ले जाने जैसा कोई भ्रष्टाचार, कोई जुर्म यूपीए नहीं पकड़ पाया, तो आज मोदी को उसकी रियायत तो मिलनी ही चाहिए। मोदी पर कोई कुनबापरस्ती की तोहमत नहीं लगा सकते, जाहिर तौर पर उनके कोई निजी भ्रष्टाचार नहीं दिखते, और यही वजह है कि उनके मुकाबले जब दागी और भ्रष्ट नेता अभियान चलाते हैं, तो वैसे अभियान की साख बहुत ही कमजोर रहती है। भारत के भाजपा-विरोधी विपक्ष को यह तय करना होगा कि या तो वह भ्रष्टाचार के साथ अपनी राजनीति करे, और मोदी को अधिक साख बनाने दे, या फिर मोदी का मुकाबला करने के लिए कुनबे और कालेधन को छोड़े। लेकिन कुनबे और कालेधन की बात को छोडऩे की बात अगर करें, तो कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लालू यादव, और ऐसे बहुत से लोग तो बाहर ही हो जाएंगे। लालू यादव पर अभी सीबीआई की जो कार्रवाई हुई है, चाहे वह बदले की भावना से हुई हो, लेकिन लालू की बेईमानी और उनके भ्रष्टाचार के बारे में देश की जनता को जरा भी शक नहीं है। और ऐसी कार्रवाई जारी रहना चाहिए। राजनीतिक बदले के आरोपों से बचने के लिए चोरों को क्यों बख्शा जाए?

आजादी के पहले की गांधी, भारत की फिलीस्तीन नीति मोदी ने पूरी तरह छोड़ दी

संपादकीय
6 जुलाई 2017


पिछले दो दिनों से भारतीय मीडिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इजराइल प्रवास की खबरों को लेकर कुछ इस तरह उतावला दिख रहा है कि भारत को कुंभ के मेले में खोया हुआ उसका भाई मिल गया है, और अब दोनों भाई मिलकर बाकी दुनिया को ठीक कर लेंगे। इजराइल के लिए भारत के इस ताजा और अभूतपूर्व दर्जे के प्रेम को कुछ मिनटों की जिंदगी वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो बावलेपन के साथ देख सकता है, लेकिन गांधी के वक्त से छपे हुए अखबारों की जो परंपरा रही है, वह गंभीरता इस बात को अनदेखा नहीं कर रही है कि हिन्दुस्तान की विदेश नीति और उसकी अंतरराष्ट्रीय सोच ने कभी भी इजराइल के साथ रिश्तों को फिलीस्तीन के साथ अपने रिश्तों से अलग करके नहीं देखा था जो कि आज हो रहा है। आज भारतीय प्रधानमंत्री महज इजराइल की खातिरदारी के बाद लौट जा रहे हैं, और बगल में उन फिलीस्तीनियों से उन्होंने बात भी नहीं की है जो कि एक ऐतिहासिक बेइंसाफी के शिकार होकर इजराइल की हिंसा और गुंडागर्दी के सामने रोज मर रहे हैं, और रोज हौसले से उठकर खड़े भी हो रहे हैं। मोदी के इजराइल दौरे को अगर देखें तो ऐसा लगता है कि फिलीस्तीन को इतना अनदेखा तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी नहीं किया है, जबकि अमरीका की शह पर इजराइल दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी और हमलावर देश बना हुआ है।
दरअसल एक विश्व-सोच के दिन अब औसत दर्जे के अदूरदर्शी नेताओं के चलते हुए लग रहे हैं। अब एक हिंसक और उग्र राष्ट्रवाद की लहरों पर सवार नेता अपने देश के तात्कालिक और संकुचित फायदों से परे न इंसानियत की सोच पा रहे हैं, न ही इंसाफ की। ऐसे में भारत के इजराइल से रिश्ते कुछ अलग किस्म की बुनियाद पर अब पनप रहे हैं, इनमें से एक तो यह है कि दोनों देशों की सरकारों का धार्मिक नजरिया एक किस्म का है, दूसरी बात यह कि इजराइल निर्यात पर जिंदा देश है, और उसके कुल निर्यात का आधे से अधिक भारत में आयात हो रहा है। अभी इजराइल में मोदी के लिए जो कालीन बिछा है, और इजराइली प्रधानमंत्री जिस तरह मोदी का साया बनकर तीन दिन बिना कुछ और किए मोदी के साथ रहे हैं, वह सबसे बड़े कारोबारी का सबसे बड़े ग्राहक के साथ बर्ताव भी है। इजराइली दुनिया में जहां भी बसे हैं, वे सबसे चतुर कारोबारी हैं, सबसे कामयाब भी, और मोदी तो जाहिर है कि कारोबारियों के प्रदेश गुजरात से आए हैं, और कारोबार के लिए उनके मन में बड़ा सम्मान और महत्व है।
आज हिन्दुस्तान मोदी की अगुवाई में दुनिया का ऐसा अकेला देश नहीं है जो कि अपनी विश्व-जिम्मेदारियों को पूरी तरह अनदेखा करके महज अपने देश के तात्कालिक हितों के लिए काम कर रहा है। अमरीका में ट्रंप ठीक यही काम कर रहे हैं। और ऐसे में जुल्म के दुनिया के सबसे बड़े शिकार फिलीस्तीनियों की मदद से किसी देश की अर्थव्यवस्था, उसके कारोबार, उसकी फौजी ताकत में कोई इजाफा होने वाला नहीं है। नतीजा यह है कि फिलीस्तीनियों को आज हिन्दुस्तान में पूरी तरह इजराइली रहमो-करम पर छोड़ दिया है, और अगर पिछले तीन दिनों के भारतीय प्रधानमंत्री के बयान और भाषण देखें, तो ऐसा लगेगा कि हिन्दुस्तान को यह पता ही नहीं है कि फिलीस्तीन नाम का कोई लहूलुहान देश भी धरती के नक्शे पर है। कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि किसी देश को नैतिकता और महानता की बातें अपने राष्ट्रीय हित की कीमत पर नहीं करनी चाहिए, तो फिर ऐसी बातें तो देश के भीतर, अपने शहर में, अपने मुहल्ले भी की जा सकती हैं कि सड़क किनारे के किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाने से अगर हमारा कोई भला नहीं होता, तो फिर हमें यह जहमत क्यों उठानी चाहिए। भारतीय प्रधानमंत्री का इजराइली दौरा भारत की आजादी के पहले से चली आ रही गांधी और नेहरू की नीति, और अभी तक की भारत सरकार की स्थाई और निरंतर विदेश नीति से बिल्कुल परे का दौरा रहा है, और यह आज की कारोबारी दुनिया के मतलबपरस्त तौर-तरीकों के मुताबिक दो कारोबारी देशों के बीच का प्रेम है, और शायद राष्ट्रवाद को ऐसा ही तात्कालिक फायदा काफी लगता है। लेकिन इतिहास भारतीय विदेश नीति के इस फेरबदल को उदारता से दर्ज नहीं करेगा।

अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता जिम्मेदारी बिना नहीं हो सकती

संपादकीय
5 जुलाई 2017


बंगाल में एक फेसबुक पोस्ट को लेकर बड़ा तनाव खड़ा हो गया है और वहां पर केन्द्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ा है। सोशल मीडिया की बातों को लेकर ऐसा तनाव नया नहीं है, और करीब-करीब हर प्रदेश में इस तरह के तनाव सामने आ चुके हैं। भारत में लोगों की सहनशीलता धर्म के मामले में बहुत ही कम हो चुकी है, और इससे चाहे किसी धर्म या जाति के लोगों का राजनीतिक ध्रुवीकरण आसानी से हो जाए, इससे देश का माहौल जितना बिगड़ता है, जितनी जल्दी बिगड़ता है, उसके सुधरने की कोई संभावना उतनी रफ्तार से नहीं बनाई जा सकती।
अब सवाल यह है कि जिस देश में अब हर बच्चे के हाथ में मोबाइल फोन हो, और अधिकतर आबादी किसी न किसी धर्म या जाति को लेकर उत्तेजना से भरी हुई है, उस देश में सोशल मीडिया जैसे आसान औजार के चलते आग लगने से कब तक बचा जा सकेगा? और यह देश पढ़ाई-लिखाई के दौर से गुजरने के बाद, अपने आपको समझदार समझने की खुशफहमी में डूबा हुआ एक बार फिर कट्टर-अज्ञान के गड्ढे में गिरा जा रहा है। और मजे की बात यह है कि गड्ढे में इस गिरने को देशप्रेम, राष्ट्रवाद, और अपनी संस्कृति की जड़ों से जुडऩा भी समझा जा रहा है। बारूद के ढेर पर बैठे हुए ऐसे देश में सोशल मीडिया की एक पोस्ट से कोई शहर जल सकता है, किसी प्रदेश में बवाल खड़ा हो सकता है, और न तो सोशल मीडिया तक लोगों की पहुंच आसानी से रोकी जा सकती है, और न ही इस नए औजार के बेजा इस्तेमाल को रोकने का कोई जरिया किसी सरकार के पास है।
दरअसल यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में सोशल मीडिया जैसे अधिकार एक जिम्मेदारी के साथ ही हासिल किए जा सकते हैं, और यह जिम्मेदारी लोगों की दूसरों के प्रति संवेदनशील होने की जिम्मेदारी भी है, और लोगों के अपने बर्दाश्त की जिम्मेदारी भी है। सहिष्णुता लोगों में अगर दो किस्म से न हो, तो लोकतंत्र नहीं चल सकता, पहली तो यह कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने की सहिष्णुता, और दूसरी यह कि अपनी भावनाओं पर किसी के कुछ कहने को बर्दाश्त करने की सहिष्णुता। दुनिया के जो देश अधिक सभ्य हैं, जहां पर लोगों को कहने की अधिक आजादी है, जहां पर लोगों का बर्दाश्त अधिक है, वहां पर सोशल मीडिया हो, या कि फ्रांस की विख्यात या कुख्यात, जो भी कहें, कार्टून-पत्रिका हो, उन सबका हक लोगों को रहता है। हिन्दुस्तान में हक ही हक हैं, जिम्मेदारियां नहीं हैं।
हमने कुछ दिन पहले इसी जगह सोशल मीडिया के झूठ और उसकी भड़काऊ अफवाहों को लेकर, उस पर लिखी जा रही अश्लील और हिंसक बातों को लेकर यह सुझाव दिया था कि केन्द्र और राज्य सरकारों को तुरंत ही ऐसी बातों पर कार्रवाई करनी चाहिए, और रोज देश में दो-चार लोग जब तक ऐसी हिंसक बातों पर जेल जाना शुरू न होंगे, बाकी जनता को उसकी जिम्मेदारी समझ नहीं आएगी। आज सरकार ने इंटरनेट की सुविधा तो जनता को दे दी है, लेकिन उसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी न खुद होकर लोगों में आई है, और न ही कानून आज असरदार तरीके से यह जिम्मेदारी सिखा पा रहा है। ऐसे में किसी दिन संगठित रूप से देश में अफवाहों के रास्ते बहुत बड़ा तनाव खड़ा किया जा सकता है, पूरे देश को खेमों में बांटा जा सकता है, ऐसे में जनता तो ठीक है, लेकिन बुनियादी जिम्मेदारी सरकार की है, और उसे कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।

भारत और पड़ोसी देशों से ताजा रिश्तों की जटिलता

संपादकीय
4 जुलाई 2017


अमरीका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के चलते दुनिया के कई देशों के साथ अमरीका के संबंधों में खासा फर्क आया है। इसी तरह भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुत से देशों के साथ रिश्तों में इतनी उथल-पुथल हुई है कि जब पानी ठहरेगा तो भारत किसके साथ कैसा रहेगा, यह अंदाज लगाना कुछ मुश्किल है। इस बीच रूस के साथ भारत के पुराने और परंपरागत संबंधों पर कुछ आंच आई दिखती है, हालांकि भारत और रूस दोनों ही इस बात को उजागर करते नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ चीन को अगर देखें तो भारत के साथ उसके संबंध लगातार तनावपूर्ण होते चल रहे हैं, और सरहद पर शायद 1962 के बाद से पहली बार भारत-चीन तनाव इतना बढ़ा हुआ है।
भारत की विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ चीन के संबंध देखें, तो पाकिस्तान चीन के पाले में है, और भारत से उसके रिश्ते दुश्मनी सरीखे हैं। दूसरी तरफ नेपाल के साथ भारत के संबंध पहले सरीखे नहीं रहे, और इस नौबत में नेपाल और चीन कई मामलों में करीब भी आए हैं। बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका तक, और बर्मा से लेकर भूटान तक, इन तमाम देशों के साथ चीन ने अपने रिश्ते सुधारे हैं, और भारत के लिए यह एक फिक्र की बात है कि उसके इर्दगिर्द एक ऐसी माला तैयार हो रही है जिसका हर मोती भारत के मुकाबले चीन के अधिक करीब है।
जब तक कोई जंग न हो, तब तक तो सब ठीक है, लेकिन किसी जंग की हालत में यह बात मायने रखती है कि सरहदी देश किसके साथ हैं। यही वजह है कि अमरीका दुनिया के हर इलाके में अपने ऐसे फौजी ठिकाने, या ऐसे पि_ू देश तैयार रखता है जहां की जमीन का इस्तेमाल करके वह अपनी फौजों को कुछ घंटों में ही दुनिया के हर हिस्से पर हमले के लिए तैनात कर सके। यह तो एक अलग बात है कि मुस्लिम-आतंक के चलते ट्रंप ने दुनिया के कई देशों के साथ अपने रिश्ते कम किए हैं, और ऐसा ही कुछ अमरीका और पाकिस्तान के बीच भी हुआ है। लेकिन भारत के पक्ष में कुल मिलाकर यही एक राहत की बात पिछले दो-तीन बरस में सरहद पर दिखती है कि दुनिया की नजरों में, और अमरीका से आर्थिक मदद के मामले में पाकिस्तान नीचे गिरा है, और खुद पाकिस्तान अपनी हरकतों से कमजोर और खोखला हो गया है। लेकिन भारत के दीर्घकालीन हित में यह होगा कि सरहद के सभी देशों के साथ उसके संबंध अच्छे रहें, और इस मामले में हम पाकिस्तान को भी शामिल करके चल रहे हैं क्योंकि भारत का सबसे बड़ा फौजी खर्च पाकिस्तान के खिलाफ तैयारी पर लगता है।
नरेन्द्र मोदी दुनिया भर में दौरे करके अपनी एक मजबूत सार्वजनिक मौजूदगी से कुछ इस तरह के दिखते हैं कि भारत की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी अधिक मजबूत हो गई है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई मौका नहीं आया है कि यह लुभावनी और लोकप्रिय जनधारणा सही साबित होते दिखे। अतिसक्रियता देश के हित में भी है, ऐसा अभी साबित नहीं हुआ है। इसलिए विदेश नीति के बहुत से जानकारों का मानना है कि हिंद महासागर के इस क्षेत्र में भारत को बड़ा देश होने के नाते बड़प्पन दिखाते हुए तनाव घटाने का जिम्मा भी पूरा करना होगा। पाकिस्तान या किसी और पड़ोसी देश से टकराव और तनाव भारत के हित में नहीं है, फिर चाहे यह टकराव पाकिस्तान का ही खड़ा किया हुआ ही क्यों न हो।

किसानों की खुदकुशी रोकना सिर्फ कर्जमाफी से नहीं...

संपादकीय
3 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में लगातार किसानों की आत्महत्याएं देश की आज की हालत बताती है। और ऐसे में मध्यप्रदेश के कुछ मंत्रियों ने जिस तरह की संवेदनाशून्य जुबान में किसानों के बारे में भद्दी बातें कही हैं, वे हैरान करती हैं कि जो पार्टी पूरे देश से कांग्रेस को बेदखल करने के नारे के साथ चल रही है, क्या वह गरीब और कर्ज से लदे हुए किसानों के जख्मों पर इस तरह नमक-मिर्च छिड़क सकती है? लेकिन राजनीतिक दलों के चुनावी भविष्य से परे आज का मुद्दा यह है कि किसानों की कर्जमाफी, या किसानों को और दूसरी तरफ की मदद कैसे दी जा सकती है जिससे कि वे जिंदा रह सकें।
आज देश में लोगों को महंगी कारें लेने में दिक्कत नहीं है, सोने के महंगे गहनों और हीरों के जवाहरातों के नए शोरूम खुलते जा रहे हैं। लोग खाली वक्त गुजारने के लिए किसी मॉल चले जाते हैं, और हजारों रूपए खर्च करके लौट आते हैं। लेकिन आलू-प्याज से लेकर गेहूं-चावल तक के दाम अगर बढ़ें, तो आबादी महंगाई का रोना रोने लगती है। दरअसल लोगों को महंगाई का सबसे बड़ा अहसास किसान की उपज को लेकर होता है, और घरेलू कामकाज करने वाले नौकरों की मजदूरी को लेकर होता है। बाकी लोगों को न केबल महंगा होने से उतना दर्द होता, न टीवी या गाड़ी महंगी होने से। देश के लोग तो किसानों के लिए बेरूखी वाले हैं ही क्योंकि वे अनाज को खेतों से नहीं पाते, दुकानों से पाते हैं। लोग एक रूपए किलो में खेत से निकलने वाली सब्जी को दस-बीस रूपए किलो में शहरी दुकानों से पाते हैं। इसलिए आम जनता, आम ग्राहक किसान के दुख-दर्द को नहीं समझ सकते, और यह सरकार की सीधी जिम्मेदारी बनती है कि वह खेती को फायदे का धंधा बनाने में सरकार की मदद करे।
हम कहीं भी किसानी कर्ज की माफी को सबसे अच्चा इलाज नहीं मान रहे हैं। लेकिन हमारा यह जरूर मानना है कि खेती को एक फायदे का काम बनाए रखना जरूरी है क्योंकि कारखाने कभी भी अनाज और फल-सब्जी नहीं उगा पाएंगे, कभी भी दूध पैदा नहीं कर पाएंगे। भारत की खेती आज भी सबसे कम तकनीक, सबसे कम बिजली, सबसे कम प्रदूषण से चलने वाला काम है जो कि सबसे अधिक रोजगार देता है, और लोगों को जिंदा रहने में मदद करता है। लेकिन जिंदगी की इस लड़ाई में किसान कर्ज से दबकर जब मर जाता है, तो नेताओं में से बहुत से लोग हिंसक जुबान में उसके कर्ज को अनदेखा करते हुए खुदकुशी की दूसरी वजहें गिनाने लगते हैं।
हमारा यह भी मानना है कि किसानी अपने आप में फायदे का काम बनने में वक्त ले सकती है। सरकार को समर्थन मूल्य जरूर बढ़ाना चाहिए, पर्याप्त बढ़ाना चाहिए, और शहरी विकास जैसे फिजूल के बजट को घटाकर धान पर बोनस देने सरीखे काम भी करने चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरी बातें भी हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है तभी लंबे समय तक किसानी चल पाएगी। खेती-किसानी के साथ-साथ बागवानी, डेयरी, फूल या फल की खेती, मशरूम की खेती, मधुमक्खी पालन, सिल्क के कीड़ों को पालना, पशु-पक्षी पालना, मछली पालना, ऐसे सैकड़ों काम अलग-अलग इलाकों के लिए हो सकते हैं जिनमें किसानों को लगाने पर खाली वक्त में उनकी कमाई हो सकती है, और वे आत्महत्या से बच सकते हैं। गांव में किसानों के पास वक्त और मेहनत दोनों की थोड़ी सी गुंजाइश रहती है और वे ऐसे काम कर सकते हैं बशर्ते सरकार उनके लिए तकनीक, प्रशिक्षण, और कच्चा माल देने में मदद करे। इनमें से सारे के सारे ग्रामीण और कुटीर उद्योग के काम देश की अर्थव्यवस्था को बहुत ऊपर ले जा सकते हैं, और सरकार को इस मेहनत के काम को आगे बढ़ाना चाहिए।
दूसरी तरफ केन्द्र सरकार और बाकी राज्य सरकारों को यह भी समझना चाहिए कि गाय और गोवंश, भैंसों और दूसरे जानवरों को लेकर एक धार्मिक और साम्प्रदायिक अंदाज में जितने तरह की रोकटोक लगाई गई है, कानून बनाए गए हैं और हिंसा के साथ गैरकानूनी काम किए जा रहे हैं, उन सबको अगर रोका नहीं गया, तो किसानों का मरना नहीं रूक पाएगा। सरकार को यह तय करना पड़ेगा कि वह इंसान और जानवर इन दोनों में से किसकी जिंदगी को अधिक महत्वपूर्ण मानती है? आज अगर महाराष्ट्र में या मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में जानवरों की खरीदी-बिक्री को कानूनी और गैरकानूनी दोनों तरीकों से इस कड़ाई से रोका न गया होता, तो किसान शायद कुछ दिन और जिंदा रह पाते। किसानों की दिक्कत महज कर्जमाफी, या महज समर्थन मूल्य की नहीं है, वह जानवरों से सीधे जुड़ी हुई है, आज बूढ़े हो चुके जानवरों  को किसान न खिला पा रहा है, न बेच पा रहा है, और न खुद जिंदा रह पा रहा है। इस बारे में सरकार को धार्मिक-साम्प्रदायिक तरीके से सोचना जारी रखने के बजाय यह देखना होगा कि किसान से परे भी दलित समाज के लाखों लोगों की जिंदगी मरे हुए जानवरों के शरीर पर जिंदा रहती है, और इन सबको भी रोजगार से बेदखल किया जा रहा है।

हर जानकारी तो डिजिटल हो गई लेकिन उसकी हिफाजत का क्या?

संपादकीय
2 जुलाई 2017


जीएसटी, आधार कार्ड, पैन नंबर के साथ अब सारे बैंक खातों, सारे टैक्स खातों, और सारी संपत्तियों को जोडऩे की तैयारी भारत सरकार के हाथ में लोगों की निजी और कारोबारी जिंदगी की सारी छुपी और निजी बातें तश्तरी पर रखकर पेश करने जा रही हैं। लोगों के मोबाइल नंबर भी आधार कार्ड से जुड़ रहे हैं, और सरकार की पहुंच टेलीफोन कॉल या इंटरनेट की हर जानकारी तक अभी भी है। यह पूरी तस्वीर दो वजहों से बड़ी फिक्र पैदा करती है।
आज से पन्द्रह बरस पहले अमरीका की एक फिल्म आई थी कि जब सरकार अपनी खुफिया निगरानी की पूरी ताकत झोंककर किसी बेकसूर नागरिक को फंसाने और खत्म करने की कोशिश करती है, तो क्या होता है। उस तैयारी में उपग्रह से मिली जानकारी, और सार्वजनिक जगहों पर लगे हुए कैमरों से जुड़ी हुई जानकारी और शामिल हो जाती है। इसमें से कुछ भी विज्ञान कथा की तरह का भविष्य का मामला नहीं है, और यह पूरे का पूरा आज सरकार के हाथ मौजूद साज-सामान से मुमकिन निगरानी है। आज बैंक के खातों के अलावा क्रेडिट या डेबिट कार्ड से होने वाली खरीदी, या उससे होने वाले किसी भी भुगतान की जानकारी भी सरकार के कम्प्यूटरों पर दर्ज है, और घर बैठे सरकारी जांच एजेंसियां, खुफिया एजेंसियां लोगों की निजी जिंदगी में पूरी तरह, और बुरी तरह झांक सकती हैं, और लोगों को अपने शिकंजे में रख सकती हैं।
एक देश एक टैक्स का नारा टैक्स के नजरिए से अच्छा है, लेकिन इसके साथ-साथ सरकार के पास हर कारोबार की जानकारी कम्प्यूटर की एक बटन दबाने से हासिल होने जा रही है। निजी और कारोबारी दोनों तरह की सारी बातों को लेकर जब हम सोचते हैं, और उसके साथ हम दुनिया के कम्प्यूटर-घुसपैठियों की ताकत को देखते हैं, तो लगता है कि कल दुनिया में कहीं भी बैठे हुए साइबर-अपराधी भारत के हर नागरिक की हर बात को जान सकते हैं, और सरकारी रिकॉर्ड में अगर छेडख़ानी करना उनके बस में हो, तो वे ये रिकॉर्ड बदल भी सकते हैं। इस बात को सोचें कि हर हिन्दुस्तानी की उंगलियों के निशान अपराधियों के पास मानो पहुंच ही चुके हैं, हर हिन्दुस्तानी के ट्रेन या प्लेन के रिजर्वेशन उनके पास पहुंच ही चुके हैं, लोगों की खरीदी की आदतें उनके पास पहुंच चुकी है, तो फिर ये किस-किस तरह की साजिशें नहीं कर सकते? लोगों की बायोमैट्रिक जानकारी पल भर में पूरी दुनिया के अपराधियों के पास रहेगी, और लोगों के फिंगरप्रिंट से ऐसे लोग अपने घर बैठे हिन्दुस्तानियों के फोन या कम्प्यूटर के पासवर्ड फिंगरप्रिंट से खोल सकेंगे।
देश की इतनी जानकारी कम्प्यूटर और इंटरनेट पर रहना सरकार के लिए तो सहूलियत की बात हो सकती है, लेकिन दूसरी तरफ इतनी संवेदनशील और नाजुक जानकारी की हिफाजत का भी कोई जरिया हो सकता है? अभी हमने योरप के बहुत से देशों में साइबर-घुसपैठ को देखा है और विकसित-संपन्न देश भी अपने सरकारी कम्प्यूटरों को भी ऐसी सेंधमारी से नहीं बचा पाए। भारत में आज भी आधार कार्ड को लेकर बहुत से लोगों के मन में यह शक है कि इतनी निजी जानकारी पाकर उसे सुरक्षित रखने का सरकार के पास कोई जरिया नहीं है। और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट में इसका मुकदमा चल रहा है। जीएसटी से कारोबारी और ग्राहक की हर जानकारी सरकारी कम्प्यूटरों पर आ जाएगी, और उसका बेजा इस्तेमाल भी आसान हो जाएगा। सरकार को देश के डिजिटलीकरण के साथ-साथ सुरक्षा को बढ़ाना चाहिए।