किसानों की खुदकुशी रोकना सिर्फ कर्जमाफी से नहीं...

संपादकीय
3 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में लगातार किसानों की आत्महत्याएं देश की आज की हालत बताती है। और ऐसे में मध्यप्रदेश के कुछ मंत्रियों ने जिस तरह की संवेदनाशून्य जुबान में किसानों के बारे में भद्दी बातें कही हैं, वे हैरान करती हैं कि जो पार्टी पूरे देश से कांग्रेस को बेदखल करने के नारे के साथ चल रही है, क्या वह गरीब और कर्ज से लदे हुए किसानों के जख्मों पर इस तरह नमक-मिर्च छिड़क सकती है? लेकिन राजनीतिक दलों के चुनावी भविष्य से परे आज का मुद्दा यह है कि किसानों की कर्जमाफी, या किसानों को और दूसरी तरफ की मदद कैसे दी जा सकती है जिससे कि वे जिंदा रह सकें।
आज देश में लोगों को महंगी कारें लेने में दिक्कत नहीं है, सोने के महंगे गहनों और हीरों के जवाहरातों के नए शोरूम खुलते जा रहे हैं। लोग खाली वक्त गुजारने के लिए किसी मॉल चले जाते हैं, और हजारों रूपए खर्च करके लौट आते हैं। लेकिन आलू-प्याज से लेकर गेहूं-चावल तक के दाम अगर बढ़ें, तो आबादी महंगाई का रोना रोने लगती है। दरअसल लोगों को महंगाई का सबसे बड़ा अहसास किसान की उपज को लेकर होता है, और घरेलू कामकाज करने वाले नौकरों की मजदूरी को लेकर होता है। बाकी लोगों को न केबल महंगा होने से उतना दर्द होता, न टीवी या गाड़ी महंगी होने से। देश के लोग तो किसानों के लिए बेरूखी वाले हैं ही क्योंकि वे अनाज को खेतों से नहीं पाते, दुकानों से पाते हैं। लोग एक रूपए किलो में खेत से निकलने वाली सब्जी को दस-बीस रूपए किलो में शहरी दुकानों से पाते हैं। इसलिए आम जनता, आम ग्राहक किसान के दुख-दर्द को नहीं समझ सकते, और यह सरकार की सीधी जिम्मेदारी बनती है कि वह खेती को फायदे का धंधा बनाने में सरकार की मदद करे।
हम कहीं भी किसानी कर्ज की माफी को सबसे अच्चा इलाज नहीं मान रहे हैं। लेकिन हमारा यह जरूर मानना है कि खेती को एक फायदे का काम बनाए रखना जरूरी है क्योंकि कारखाने कभी भी अनाज और फल-सब्जी नहीं उगा पाएंगे, कभी भी दूध पैदा नहीं कर पाएंगे। भारत की खेती आज भी सबसे कम तकनीक, सबसे कम बिजली, सबसे कम प्रदूषण से चलने वाला काम है जो कि सबसे अधिक रोजगार देता है, और लोगों को जिंदा रहने में मदद करता है। लेकिन जिंदगी की इस लड़ाई में किसान कर्ज से दबकर जब मर जाता है, तो नेताओं में से बहुत से लोग हिंसक जुबान में उसके कर्ज को अनदेखा करते हुए खुदकुशी की दूसरी वजहें गिनाने लगते हैं।
हमारा यह भी मानना है कि किसानी अपने आप में फायदे का काम बनने में वक्त ले सकती है। सरकार को समर्थन मूल्य जरूर बढ़ाना चाहिए, पर्याप्त बढ़ाना चाहिए, और शहरी विकास जैसे फिजूल के बजट को घटाकर धान पर बोनस देने सरीखे काम भी करने चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरी बातें भी हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है तभी लंबे समय तक किसानी चल पाएगी। खेती-किसानी के साथ-साथ बागवानी, डेयरी, फूल या फल की खेती, मशरूम की खेती, मधुमक्खी पालन, सिल्क के कीड़ों को पालना, पशु-पक्षी पालना, मछली पालना, ऐसे सैकड़ों काम अलग-अलग इलाकों के लिए हो सकते हैं जिनमें किसानों को लगाने पर खाली वक्त में उनकी कमाई हो सकती है, और वे आत्महत्या से बच सकते हैं। गांव में किसानों के पास वक्त और मेहनत दोनों की थोड़ी सी गुंजाइश रहती है और वे ऐसे काम कर सकते हैं बशर्ते सरकार उनके लिए तकनीक, प्रशिक्षण, और कच्चा माल देने में मदद करे। इनमें से सारे के सारे ग्रामीण और कुटीर उद्योग के काम देश की अर्थव्यवस्था को बहुत ऊपर ले जा सकते हैं, और सरकार को इस मेहनत के काम को आगे बढ़ाना चाहिए।
दूसरी तरफ केन्द्र सरकार और बाकी राज्य सरकारों को यह भी समझना चाहिए कि गाय और गोवंश, भैंसों और दूसरे जानवरों को लेकर एक धार्मिक और साम्प्रदायिक अंदाज में जितने तरह की रोकटोक लगाई गई है, कानून बनाए गए हैं और हिंसा के साथ गैरकानूनी काम किए जा रहे हैं, उन सबको अगर रोका नहीं गया, तो किसानों का मरना नहीं रूक पाएगा। सरकार को यह तय करना पड़ेगा कि वह इंसान और जानवर इन दोनों में से किसकी जिंदगी को अधिक महत्वपूर्ण मानती है? आज अगर महाराष्ट्र में या मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में जानवरों की खरीदी-बिक्री को कानूनी और गैरकानूनी दोनों तरीकों से इस कड़ाई से रोका न गया होता, तो किसान शायद कुछ दिन और जिंदा रह पाते। किसानों की दिक्कत महज कर्जमाफी, या महज समर्थन मूल्य की नहीं है, वह जानवरों से सीधे जुड़ी हुई है, आज बूढ़े हो चुके जानवरों  को किसान न खिला पा रहा है, न बेच पा रहा है, और न खुद जिंदा रह पा रहा है। इस बारे में सरकार को धार्मिक-साम्प्रदायिक तरीके से सोचना जारी रखने के बजाय यह देखना होगा कि किसान से परे भी दलित समाज के लाखों लोगों की जिंदगी मरे हुए जानवरों के शरीर पर जिंदा रहती है, और इन सबको भी रोजगार से बेदखल किया जा रहा है।

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