गंदी और प्रदूषित यमुना किनारे ताजमहल बनाने जैसी सोच है रायपुर में स्मार्ट सिटी बनाने की...

संपादकीय
1 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इन दिनों स्मार्ट सिटी की बड़ी खबरें आती हैं कि शहर को स्मार्ट बनाने के लिए क्या-क्या किया जा रहा है, और किस तरह से देश-विदेश के सलाहकार या विशेषज्ञ लाकर शहर को स्मार्ट बनाया जाएगा। बात सुनने में अच्छी लगती है कि हर शहर को स्मार्ट होना चाहिए, और खासकर जब पूरे प्रदेश की जनता की कमाई अनुपातहीन तरीके से शहरों पर अधिक खर्च हो रही हो, तब तो म्युनिसिपल की यह जिम्मेदारी बनती ही है कि शहरों को स्मार्ट बनाएं। लेकिन सवाल यह है कि शहर के कुछ हिस्सों को स्मार्ट बनाने के बाद बाकी हिस्सों का क्या होगा? क्या सरकार के और विशेषज्ञों के छांटे हुए हिस्सों को ताजमहल की तरह सजाया जाएगा, और बाकी शहर यमुना की गंदगी की तरह बर्दाश्त के बाहर का गंदा बना रहेगा? ऐसा कौन सा तरीका हो सकता है जिससे किसी शहर के कुछ हिस्से तो स्मार्ट हो जाएं, लेकिन बाकी हिस्से भोंदू बने रहें?
दरअसल शहरीकरण की और बहुत सी योजनाओं की तरह स्मार्ट सिटी की योजना केन्द्र सरकार की एक आभिजात्य और संपन्न-शहरी सोच है जो कि देश की एक व्यापक असलियत को अनदेखा करके विकसित हुई है। आज देश के सौ से अधिक शहरों के म्युनिसिपल स्मार्ट शहर बनाने में जुट गए हैं, और म्युनिसिपल की सदियों से जो बुनियादी जिम्मेदारी दुनिया भर में मानी जाती है, वह किनारे खिसका दी गई है। इन दिनों लगातार छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की गंदगी की तस्वीरें मीडिया में छाई हुई हैं, और नलों से पानी किस कदर गंदा आ रहा है, उसकी तस्वीरें देखते भी नहीं बनती हैं। सड़कों के किनारे के दुकानों के फैले हुए सामान, पुतलों और बोर्ड के अवैध कब्जे हटाने का बिना खर्च का काम म्युनिसिपल को पसंद नहीं है, लेकिन बड़े-बड़े विशेषज्ञ लाकर अरबों की नई निर्माण-योजनाएं बनाई जा रही हैं।
दरअसल बिना खर्च जो काम हो सकता है, महज सामान हटाकर सड़कों को चौड़ा किया जा सकता है, उसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है। यह पूरा का पूरा तरीका स्मार्ट नहीं, भोंदू है, या कि सोचा-समझा तरीका है जिसमें अधिक खर्च होने पर उससे अधिक कमाई होने का एक आम भारतीय सरकारी फार्मूला लागू होता है। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ में शहरीकरण के जानकार विशेषज्ञों की सहज समझ का कोई इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, यह एक अलग बात है कि यहां नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी चलता है, यहां मैनेजमेंट के दूसरे बड़े संस्थान चलते हैं, लेकिन सरकारी विभागों और म्युनिसिपलों की योजनाओं को मानो ठेकेदार बनाते हैं, ठेकेदार ही चलाते हैं। लगातार सैकड़ों करोड़ के खर्च की वजह से छत्तीसगढ़ के शहरों में काम होते दिखते हैं, लेकिन इन कामों में कितने खर्च की जरूरत थी, कितनी बर्बादी हो रही है, प्रदेश के गांव-गांव के हक का पैसा शहरों में किस तरह अनुपातहीन तरीके से खर्च हो रहा है, इस बात को समझदारी के साथ विपक्ष भी नहीं उठा रहा है।
स्मार्ट सिटी बनाने की पूरी सोच एक शहरी और संपन्न सोच है जिसमें बहुत बड़े खर्च के बिना कुछ भी नहीं होने जा रहा है। यह एक बहुत तकलीफदेह नौबत है कि नालियों को साफ करना, घूरों को खाली करना, और ठोस कचरे का निपटारा करना,साफ पानी पहुंचाना, सड़कों को अवैध कब्जों से खाली करवाना, ऐसी बुनियादी जरूरतों के लिए मानो म्युनिसिपल जवाबदेह ही नहीं रह गई हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है, क्योंकि यह शहर राजधानी होने के बावजूद ऐसी गंदगी को भुगत रहा है कि किसी दिन गुजरात के सूरत की तरह यहां प्लेग जैसी कोई बीमारी फैल जाए, तो भी हैरानी नहीं होगी। लेकिन बड़ी संक्रामक महामारी से कम की जो बीमारियां यहां लोगों में फैली हुई हैं, वे अभी सरकार की नींद नहीं तोड़ पा रही हैं, क्योंकि उनसे बड़ी संख्या में मौतें नहीं हो रही हैं। राज्य सरकार को और स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित पदाधिकारियों को अपनी स्थानीय जिम्मेदारियों को समझना चाहिए, वरना गंदगी के बीच ताजमहल जैसे छोटे-छोटे सजावटी टापू बनाकर किसी शहर को स्मार्ट सिटी बनाने की सोच बहुत ही अलोकतांत्रिक भी है, लेकिन दिक्कत यह है कि केन्द्र या राज्य सरकार से, या कि स्थानीय संस्थाओं के नेता-अफसरों से जवाब लेने वाले कोई नहीं रह गए हैं।

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