अमरनाथ-यात्रा पर आतंकी हमले को धर्म, देश, प्रदेश से हड़बड़ी में न जोड़ें

संपादकीय
11 जुलाई 2017


हिंदुस्तान में सबसे कड़ी सुरक्षा के साथ हर बरस होने वाली अमरनाथ यात्रा पर कल हुए आतंकी हमले से अभी कश्मीर और दिल्ली संभल भी नहीं पाए हैं कि बहुत से राजनीतिक दलों ने राजनीति शुरू कर दी है। विपक्ष जिम्मेदारी की याद दिला रहा है, और भाजपा के बड़े नेता राम माधव तुरंत यह बयान दे रहे हैं कि सुरक्षा दलों से कोई चूक नहीं हुई है। अभी जांच को कोसों दूर है, और केंद्र और राज्य सरकारें, केंद्रीय सुरक्षा बल सब मिलकर मारे गए लोगों के शव और घायलों को कश्मीर से गुजरात पहुंचाने में लगे हैं, और ऐसे में किसी पार्टी या किसी नेता को न तो भड़काऊ बातें करनी चाहिए, और न ही गैरजिम्मेदारी से तोहमत लगानी चाहिए, या सर्टिफिकेट बांटना चाहिए। देश में आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान जरूर तारीफ के लायक है जिसमें उन्होंने इस हमले के बाद कश्मीर की तमाम जनता द्वारा की गई मदद की सराहना करते हुए कश्मीरियों को उनकी कश्मीरियत के लिए सलाम किया है। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी अपनी तरफ से पूरी जिम्मेदारी की बात करते हुए यह कहा है कि आज पूरा कश्मीर और कश्मीरियत शर्म से झुक गए हैं।
पहली नजर में जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक गुजरात की यह पर्यटन बस अमरनाथ यात्रा के लिए कड़ाई से दर्ज किए जाने वाले मुसाफिरों की तरह दर्ज नहीं थी, और इस यात्रा का इंतजाम करने वाले सुरक्षा बलों को भी इसकी जानकारी नहीं थी। गुजरात से चलकर बिना हिफाजत के इंतजाम के, और बिना सरकार को खबर किए यह बस अमरनाथ तक पहुंच गई, और लौटते में यह बिना किसी सुरक्षा काफिले के घूमते-फिरते अकेले ही लौट रही थी, और आतंकी हमले का शिकार हो गई। इस पूरे सिलसिले में कई जगहों पर चूक हुई दिखती है, और सैलानी-तीर्थयात्रियों की तरफ से बस के आयोजकों ने एक बड़ी गैरजिम्मेदारी भी दिखाई है। नतीजा यह हुआ कि बहुत से बेकसूर मारे गए, बहुत से घायल हुए, और भारत की एकता-सद्भावना पर भी चोट लगी है।
आज दिक्कत यह है कि हिंदुस्तान में आतंक को धर्म से जोड़े बिना नहीं देखा जा रहा, और न ही देखा जा सकता है। ऐसे में सोशल मीडिया पर इस देश के नफरतजीवी लोग टूट पड़े हैं, और वे इसका बदला लेने के भड़काऊ नारे लगा रहे हैं। बेचेहरा आतंकी जब ऐसे हमले करते हैं, तो उनका कोई पता-ठिकाना तो रहता नहीं कि मोदी सरकार या कश्मीर सरकार उन पर आनन-फानन हमले कर दे। फिर यह बात भी समझना जरूरी है कि ऐसे हर हमले के पीछे जांच और सुबूत से गुजरे बिना, तर्कसंगत और न्यायसंगत निष्कर्ष निकाले बिना सीधे-सीधे पाकिस्तान पर तोहमत लगा देने का मतलब यह भी होगा कि हम अपने देश के भीतर के आतंकी संगठनों को अनदेखा कर देंगे, और ऐसा करना देश की आगे की हिफाजत के लिए बहुत बुरी बात होगी। आज ही यह खबर भी कश्मीर से आ रही है कि वहां पुलिस ने एक ऐसे लश्कर आतंकी नौजवान को गिरफ्तार किया है जो उत्तरप्रदेश के एक हिंदू ब्राम्हण परिवार का है, और वह जाकर मुस्लिम बनकर लश्कर में शामिल हो गया था। इसलिए ऐसे आतंकी हमले को न किसी प्रदेश से जोडऩा चाहिए, न किसी धर्म से, और न ही किसी देश से, जब तक कि उसके पुख्ता सुबूत न मिल जाएं।
अमरनाथ यात्रा हमेशा से खतरे के साए में होती है, और हिंदुओं के इस एक सबसे बड़े तीर्थ में उनका वजन ढोने के काम से लेकर उनके रीति-रिवाज के हर सामान तक का इंतजाम कश्मीर के मुस्लिम ही करते हैं। अभी कल जो हमला हुआ, उसके बाद भी घायलों को बचाने और लोगों की मदद करने का काम वहां के मुस्लिमों ने ही किया। और इस बात के लिए राजनाथ सिंह ने दिल खोलकर उनकी तारीफ भी की है। आज देश को भीतरी और बाहरी आतंकी हमलों से बचाने के लिए ऐसी ही दरियादिली की जरूरत है, क्योंकि नफरत फैलाने वाले भड़काऊ साम्प्रदायिक और हिंसक लोग आतंक को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। केंद्र सरकार के सामने यह मौका बहुत सी प्रशासनिक और राजनीतिक दिक्कतें लेकर आया है। केंद्र के साथ-साथ कश्मीर में भी एनडीए की सरकार है, और जिस गुजरात के लोग मारे गए हैं, वह गुजरात भी भाजपा के राज वाला है, और चुनावों में जा रहा है। ऐसे में कश्मीर में लोकतंत्र को असफल करार देने का काम भी कई लोग करेंगे, लेकिन हमारा यह मानना है कि कश्मीर में निर्वाचित सरकार को हटाकर राष्ट्रपति-शासन लगाना एक गलत फैसला होगा, क्योंकि सेना की तैनाती से लेकर केंद्रीय बलों को मिले हुए घोषित-अघोषित अधिकारों तक, कश्मीर सरकार मोटे तौर पर दिल्ली की मोदी सरकार से मिलकर ही चल रही है, और दोनों के बीच कोई बुनियादी टकराव नहीं है। लेकिन एक बात तय दिख रही है कि बहुत बरसों बाद कश्मीर में हालात इतने खराब हुए हैं, और केंद्र सरकार का सबसे बड़ा हिस्सा इस नौबत की जिम्मेदारी में रहेगा ही।

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