देश की गंगा-जमुनी तहजीब को तबाह करने वाले नफरतजीवी

संपादकीय
12 जुलाई 2017


अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर आतंकी हमले की खबर देखें तो दिल को छू लेने वाली एक जानकारी सामने आती है कि गुजरात से लोगों को लेकर आए हुए एक मुस्लिम बस ड्राईवर ने आतंकी गोलियों के हमले के चलते हुए भी बस को वहां से भगाकर ले जाने की बहादुरी दिखाई, और उसी वजह से अधिकतर लोगों की जान बची। इस बहादुरी की तारीफ करते हुए गुजरात के भाजपा मुख्यमंत्री ने इस मुस्लिम ड्राईवर को पांच लाख रूपए ईनाम देने की घोषणा भी की है। कल ही केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान छपा था कि कश्मीर के तमाम लोगों ने बिना किसी हिचक और भेदभाव के इस हमले की निंदा की है और उन्होंने इस कश्मीरियत को सलाम किया। उन्होंने बहुत से शब्दों में कश्मीर की तारीफ की। कल ही ये खबरें भी आईं कि आतंकी हमले से घायल हिन्दू तीर्थयात्रियों को बचाने के लिए मुस्लिम आबादी के लोग टूट पड़े, और उन्हीं की मेहनत से घायलों की जिंदगियां बचीं। इस मौके पर ये पुरानी जानकारी और परंपरा दुबारा सामने आ रही है कि अमरनाथ के हिन्दू तीर्थयात्रियों को पालकी पर ढोकर ले जाने वाले सारे कुली वहां के स्थानीय मुस्लिम रहते हैं, घोड़े वाले तमाम लोग मुस्लिम रहते हैं, और पूजा का सारा सामान मुस्लिम ही इंतजाम करते हैं।
यह देश साम्प्रदायिकता की इस ताजा लहर के पहले तक बहुत लंबे सद्भाव का इतिहास दर्ज कर चुका है, और इसे भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति कहा गया था। आज भी जगह-जगह यही देखने मिलता है कि कहीं लोग नमाज पढऩे के लिए जगह नहीं पा रहे हैं, तो उनके लिए गुरूद्वारे खोल दिए जाते हैं, मंदिर के अहातों में उन्हें न्यौता देकर उनका रोजा तुड़वाया जाता है, उनके खाने का इंतजाम किया जाता है। दूसरी तरफ इसी देश में ऐसे घोर साम्प्रदायिक और नफरतजीवी लोग हैं जो कि ये ऐलान करते हैं कि ऐसे मंदिरों को गंगाजल से धोकर साफ करेंगे।
भारत में हिन्दुओं की कोई भी शादी नहीं हो सकती जिसमें घोड़ी वाले, बैंडबाजे वाले, रौशनी वाले, मेहंदी लगाने वाले, संगीत वाले, या और सौ किस्म के सामान बनाने वाले लोग मुस्लिम न हों। और सदियों से यह सामाजिक बर्ताव चले आ रहा था। आज से सौ बरस पहले भी हिन्दू समाज में ऐसे लोग थे जिनके घर शादियों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के दोस्तों के लिए दावतें होती थीं, और समझदार लोग पहली दावत मुस्लिमों के लिए करते थे, ताकि उन्हें यह न लगे कि एक दिन पहले का बचा हुआ खाना परोसा गया है। देश में सभी धर्मों के बीच सद्भाव की अनगिनत कहानियां हैं, और अनगिनत परंपराएं हैं, और भारत जितनी विविधता तो शायद ही दुनिया के किसी देश में रही हो, और अनेकता में एकता न सिर्फ भाषा का खेल रहा, बल्कि हकीकत में इस देश में अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के बीच सामाजिक समरसता हमेशा से रही।
आज अमरनाथ के दर्जनों मुसाफिर एक मुस्लिम ड्राईवर की वजह से जिंदा बचे हैं, लेकिन आज भी इस बीच भी लोग साम्प्रदायिक नफरत को फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। हरियाणा में बजरंग दल के गुंडों ने एक मस्जिद के इमाम को इस बात के लिए पीटा कि वे उससे भारत माता की जय कहलवाना चाहते थे। ऐसा करने वाले लोग न तो भारत माता की उस कल्पना का सम्मान करते हैं जो कि एक धर्मविशेष की सोच है, और न ही वे उस हिन्दू धर्म का सम्मान करते हैं जिसका डंडा-झंडा लेकर वे चलते हैं। आज देश में इस बात की जरूरत है कि चुनावी वोटों के लिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश खत्म हो, और लोगों के बीच एक वैज्ञानिक सोच विकसित की जाए, लोगों के बीच नफरत को घटाया जाए।
यह बात भी समझना चाहिए कि नफरत हटे बिना, साम्प्रदायिक तनाव घटे बिना इस देश की अर्थव्यवस्था भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं छू पाएगी। 

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