हत्या-आत्महत्या जैसी घरेलू हिंसा थामने परामर्शदाताओं की जरूरत

संपादकीय
13 जुलाई 2017


पिछले दो दिनों में छत्तीसगढ़ के रायपुर के अखबार कुछ ऐसे हैं कि उन्हें निचोड़ें तो लहू टपकने लगेगा। और यह लहू भी किसी नक्सल या पेशेवर मुजरिमों के जुर्म से बहने वाला लहू नहीं है, यह परिवार के भीतर निजी जिंदगी में अपनों पर की गई हिंसा का ऐसा लहू है जो कि दिल दहला देता है। अभी कुछ दिन पहले ही किसी बड़ी अदालत ने यह कहा या लिखा था कि जब तक किसी महिला की दिमागी हालत सामान्य रहती है, वह कभी अपने बच्चों को नहीं मार सकतीं। लेकिन छत्तीसगढ़ में दो दिनों में अपनों पर ही ऐसे जुर्म हुए कि उन्हें ऐसी अदालती परिभाषा से नहीं समझा जा सकता।
एक महिला ने अपनी इकलौती संतान को अपने ही घर की छत पर पानी की टंकी में डुबाकर मार डाला, क्योंकि वह महिला एक स्कूली दोस्त से शादी के बाद भी प्रेम करती थी, और प्रेमी उसे संतान सहित मंजूर करने को तैयार नहीं था। प्रेमी के पास जाने के लिए उसने इकलौती बच्ची को डुबाकर मार डाला। कल ही एक मजदूर ने अपने दो बच्चों को इसलिए फावड़े से मार दिया क्योंकि पत्नी ने साथ में प्रदेश के बाहर के ईंट भ_े पर मजदूरी के लिए जाने से मना कर दिया था क्योंकि वहां पति नशे में उसे पीटता था, गुस्सा उतरा बच्चों पर और उन्हें बाप स्कूल ले जाने के नाम पर लेकर निकला और सोच-समझकर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। यह किसी क्षणिक आवेश का नतीजा नहीं था, बल्कि ठंडे दिल-दिमाग से सोचकर ऐसा किया गया। एक दूसरे मामले में पति की मौत से दुखी महिला ने छोटे बेटे के नाम चि_ी छोड़ी कि वह पति के बिना जी नहीं पा रही है, और वह छोटी बच्ची को लेकर फांसी पर झूल गई। इस किस्म की कुछ और घटनाएं भी हैं, जो कि एक साथ सामने आने की वजह से सोचने पर, और यहां लिखने पर मजबूर करती हैं।
छत्तीसगढ़ आमतौर पर कई किस्म के जुर्म से बचा हुआ प्रदेश माना जाता है। यहां पर पंजाब की तरह नशे की लत नहीं है जो कि वहां जानलेवा साबित हो रही है। इस राज्य में केरल की तरह राजनीतिक हिंसा भी नहीं होती कि आरएसएस और सीपीएम के लोग एक-दूसरे का कत्ल करते रहें। यह राज्य मजदूर हिंसा से भी आजाद है, और छत्तीसगढ़ के मजदूर जगत में अगर अकेली हत्या हुई है, तो वह मालिकों ने  एक मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की करवाई थी, उत्तर-पूर्व या हरियाणा की तरह यहां मजदूर मालिकों या मैनेजरों की हत्या नहीं करते। लेकिन निजी हिंसा और निजी जुल्म यहां पर कम नहीं हैं। इसकी वजह शायद यह है कि इंसानी मिजाज मोटे तौर पर अधिकतर जगहों पर एक सा रहता है, और पति-पत्नी के बीच तनाव में यह राज्य भी पीछे नहीं है। शादी से परे के अवैध कहे जाने वाले संबंध यहां बड़ी आम बात हैं, किसी भी दूसरे राज्य की तरह, और बहुत से मामलों में ऐसे संबंध कत्ल की अकेली वजह रहते हैं। समाज में वैसे तो शादीशुदा जिंदगी के भीतर वफादारी की उम्मीदें अव्यवहारिक होती हैं, और उनका टूटना बहुत से मामलों में सामने आते रहता है, ऐसे में कुछ शादियां टूट जाती हैं, और लोग अपनी-अपनी राह लग लेते हैं, लेकिन कुछ मामलों में लोगों को इतनी नाराजगी होती है, उनका खून इतना खौलता है कि मामला कत्ल तक पहुंच जाता है। ऐसे अधिकतर मामलों में सामान्य समझबूझ के मुजरिम भी यह अंदाज लगा सकते हैं कि कुछ ही दिनों में पुलिस उन तक जरूर पहुंच जाएगी, लेकिन फिर भी लोग ऐसा जुर्म करते हैं।
इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि समाज या सरकार, या दोनों मिलकर ऐसे परामर्श केन्द्र उपलब्ध कराएं जहां पर प्रेम संबंधों या वैवाहिक संबंधों के तनाव सुलझाए जा सकें। आज जुर्म के बाद तो पुलिस, अदालत, और जेल का सिलसिला ही रह जाता है, और कैद काटकर निकले हुए लोगों के लिए शायद ही कोई भविष्य बचता है। ऐसे में हत्या या आत्महत्या जैसे तनाव से बचाने के लिए लोगों को सहज-सुलभ परामर्श बहुत कारगर हो सकता है। ऐसे परामर्शदाता जरूरी नहीं है कि मनोचिकित्सक ही हों, क्योंकि उनकी संख्या ही मानसिक रोगियों की जरूरत पूरी नहीं कर पाती है। इनके लिए ऐसे मनोविश्लेषक और परामर्शदाता जरूरी हैं जो कि पारिवारिक संबंधों के भीतर के तनाव को कम करने के रास्ते सुझा सकें। आज जगह-जगह से इम्तिहान की नाकामयाबी के बाद की खुदकुशी सुनाई पड़ती है। हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर भी आ जाती है कि पसंदीदा मोबाइल फोन न मिल पाने पर घर के भीतर नाराज बच्चे ने खुदकुशी कर ली। प्रेम-प्रसंग में तो प्रेमी-जोड़े जगह-जगह पेड़ों पर टंगे दिख जाते हैं। वैध-अवैध प्रेम-संबंध और उसमें कत्ल भी बड़ी संख्या में हो रहे हैं। यह नौबत सरकार को खतरनाक नहीं भी लग सकती है, लेकिन सामाजिक तनाव को आज घटाना शुरू करेंगे, तो उसका असर दिखने में बरसों लग जाएंगे। इसलिए राज्य सरकार को राज्य के विश्वविद्यालयों में परामर्श के कोर्स शुरू करने चाहिए, और मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान के साथ परामर्श की तकनीक पढ़ाकर, सिखाकर समाज को ऐसे लोगों की सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए।

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