कामकाजी महिला के शोषण का अंत नहीं और कार्रवाई का ठिकाना नहीं

संपादकीय
14 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ के एक बड़े उद्योग, जिंदल में एक महिला ने वहां के दो बड़े अफसरों के खिलाफ देह शोषण की रिपोर्ट दर्ज कराई है। इसके एक हफ्ते पहले ही रायपुर में इसी उद्योग के एक बड़े अफसर का मामला पुलिस तक पहुंचा जो कि अपनी कॉलोनी की एक महिला की कार में लगातार अश्लील तस्वीरें डाल रहा था, और फिर सीसीटीवी फुटेज से वह पकड़ में आया, और माफी मांगने के बाद मामला रफा-दफा हुआ। इन दिनों ही छत्तीसगढ़ पुलिस के एक बड़े अफसर के खिलाफ तरह-तरह की जांच चल रही है कि उसने अपनी मातहत एक सिपाही का शोषण किया, और उसे रात-बिरात फोन कर-करके उसका जीना हराम कर दिया है। इस मामले की जांच हो चुकी है, लेकिन आगे की कार्रवाई की फाईल छत्तीसगढ़ सरकार के अलग-अलग दफ्तरों के बीच फुटबॉल की तरह फेंकी जा रही है।
कुछ महीने पहले राजधानी रायपुर में रेलवे के एक बड़े दफ्तर के कर्मचारियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम में जब देर रात एक महिला कर्मचारी ने एक बड़ी अफसर के साथ गाना गाने से यह कहकर इंकार किया कि इस गाने की उसकी तैयारी नहीं है, तो उसे अनुशासनहीनता मानकर नोटिस दिया गया, और उसका तबादला कर दिया गया। इस नोटिस की जुबान देखें तो ऐसा लगता है कि उस महिला ने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया। उसे यह गिनाया गया कि उसे सांस्कृतिक कोटे से नौकरी मिली थी, इसलिए वह गाना गाने से मना नहीं कर सकती। अभी तक की जो खबरें हैं उनमें ऐसी चर्चा है कि इस महिला को रेलवे के सबसे बड़े एक अफसर के साथ एक बहुत ही अश्लील और फूहड़ गाना गाने के लिए मजबूर किया जा रहा था, और उसने इससे इंकार कर दिया। यह बात मीडिया मेें आई तो अफसरों के हाथ-पांव फूले, और आनन-फानन इस कार्रवाई को रद्द किया गया।
राज्य के महिला आयोग ने इस घटना का नोटिस लेने में बहुत देर की, जबकि उसे जितने साधन-सुविधा मिले हुए हैं, उसे तुरंत ही इस महिला तक पहुंचना था, और उसका साथ देना था। दूसरी बात यह कि रेलवे के इस अफसर के खिलाफ कई तरह के जुर्म दर्ज होने चाहिए। महिला आयोग को तो जुर्म दर्ज करना ही चाहिए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को भी इस मामले पर इन अफसरों को अदालत में खड़ा करना चाहिए, और इन पर प्रताडऩा का मुकदमा अदालत को खुद को शुरू करना चाहिए। इस महिला के मामले में तो रेलवे बुरी तरह फंस गया है, और उसे तुरंत अपने तौर-तरीके सुधारने पड़े, और कार्रवाई वापिस लेनी पड़ी, लेकिन महिला कर्मचारियों के साथ केन्द्र के संस्थानों मेें, राज्य सरकार के संस्थानों मेें, और निजी संस्थानों में भी शोषण और ज्यादती एक आम बात है। अफसरों द्वारा यौन शोषण के मामलों की फाइलें एक टेबिल से दूसरे टेबिल पर जिस तरह जा रही हैं, और इससे राज्य की महिला कर्मचारियों के बीच संदेश यही जाता है कि उनकी शिकायत से किसी बड़े अफसर का आसानी से कुछ बिगडऩे वाला नहीं है। ऐसी कितनी महिला कर्मचारी हो सकती हैं जो कि ऐसी लंबी और कड़ी चढ़ाई वाली लड़ाई लडऩे का दमखम रखती हों?
राज्य सरकार को महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपनी नीति एकदम साफ करनी चाहिए। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और इससे कामकाजी महिलाओं के बीच आत्मविश्वास पैदा नहीं हो सकेगा। एक तरफ तो राज्य सरकार महिलाओं के सरकारी नौकरी में दाखिले की उम्र सीमा में बहुत बड़ी छूट देकर उन्हें बढ़ावा देना चाहती है, दे रही है, दूसरी तरफ महिलाओं की प्रताडऩा करने वाले मंत्री, विधायक, या अफसर खुले घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं दिखने पर सामाजिक असमानता बढ़ते चलती है। हमारा तो यह भी मानना है कि महिला कर्मचारी पर ऐसी ज्यादती की खबर आने पर राज्य सरकार को भी इस बारे मेें सीधे कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, न कि ऐसे मामलों को लटकाकर रखा जाए। लेकिन पहले राज्य सरकार अपने पास दर्ज मामलों पर कार्रवाई कर चुकी होती, तो उसे ऐसा नैतिक अधिकार भी होता। फिलहाल सामाजिक मोर्चों पर भी ऐसे मामलों को उठाने की जरूरत है ताकि महिलाएं अकेली न रह जाएं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें