अंग्रेजों का मैला ढोती हिन्दुस्तान की गुलाम मानसिकता बदले...

संपादकीय
16 जुलाई 2017


कोलकाता से एक बार फिर खबर है कि धोती-कुर्ते में पहुंचे एक बुजुर्ग को वहां के एक मॉल में घुसने नहीं दिया गया। इसके पहले भी वहां के किसी क्लब में चप्पल में पहुंचे किसी भले व्यक्ति को रोक दिया गया था, तो किसी रेस्त्रां में भारतीय पोशाक में पहुंचे लोगों को रोक दिया जाता है। भारत के कुछ और शहरों में भी कभी-कभी ऐसा होता है, लेकिन कोलकाता में यह कुछ अधिक इसलिए होता है कि वहां अंग्रेजों की संस्कृति अब तक कुछ अधिक बची हुई है। यह एक अलग बात है कि जो बंगाली भद्रलोक अंग्रेजी संस्कृति को अधिक ढोता है, वही बार-बार अपनी भारतीय पोशाक के साथ इसका शिकार भी होता है।
यह देश पोशाक सहित बहुत से मामलों में अभी तक एक गुलाम सोच से उबर नहीं पाया है। और जिन पढ़े-लिखे, शहरी, संपन्न, और सवर्ण तबकों के हाथों आज बाकी तबकों के मुकाबले ताकत कुछ अधिक है, वे ही तबके गुलाम मानसिकता के शिकार भी अधिक हैं। मनोविज्ञान में गुलाम मानसिकता का बड़े खुलासे से ब्यौरा पढऩे मिलता है, और इसके शिकार लोग जब तक ऐसे लोगों के तलुए न चाट लें, जिन्हें कि वे मालिक मानते हैं, उनका जी नहीं भरता, उन्हें तसल्ली नहीं होती। जिन अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान को रौंदा है, गुलाम बनाकर रखा है, और लूटा है, उन्हीं की पोशाक को लोग गले में एक तमगे की तरह टांगकर रखते हैं। भारत में बड़े-बड़े लोग सारी गर्मी के बीच कोट और टाई के बिना हीनभावना के शिकार हो जाते हैं। यहां के गरीब दूल्हे भी कर्ज लेकर कोट और टाई जरूर टांग लेते हैं, फिर चाहे वे उसके भीतर मसखरे ही क्यों न दिखते हों। और तो और भारत की गर्म खौलती हुई रेलगाडिय़ों में टिकट जांच करने वाले कर्मचारी काले कोट को लादे रखने को बेबस किए जाते हैं, और दूसरी तरफ ऐसी ही खौलती अदालतों में वकीलों पर यह काला कोट लाद दिया जाता है जिन्हें पसीने से बनी हुई सफेद लकीरें गुलाम मानसिकता का दस्तावेज बना देती हैं। भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, किसी बड़े जज, या किसी विदेशी मेहमान के आने पर इस देश के बड़े-बड़े मंत्री-अफसर आग उबलती गर्मी में भी बंद गले के कोट पहनकर खड़े हो जाते हैं। और तो और देश के भीतर भी हिन्दुस्तानी वीवीआईपी के स्वागत में ऐसे कपड़े पहनने का नियम बनाया गया है, जिसे मार-मारकर लागू करवाया जाता है। मजे की बात यह है कि भरी गर्मी में कोट तो लाद दिया जाता है, लेकिन चिलचिलाती धूप में भी काले चश्मे को लगाने पर अफसर को नोटिस भी मिल जाता है।
किसी क्लब, किसी रेस्त्रां, किसी मॉल में आने-जाने के लिए अच्छी-भली पोशाक भी काफी नहीं होती, उसका विदेशी होना जरूरी होता है। चप्पलों पर रोक है, और अंग्रेजी बूट के लिए लाल कालीन बिछे रहते हैं। कुछ ऐसा ही हाल अंग्रेजों की छोड़ी हुई जुबान का भी है, और भारत में अंग्रेजी कई दरवाजे खोल देती है, और हिन्दी हिकारत पैदा करती है। यह देश आजादी की पौन सदी बाद भी न गुलाम मानसिकता से उबरा है, और न ही इसमें आत्मसम्मान की कोई चाह दिखती है। हाथों से खाए जाने वाले हिन्दुस्तानी व्यंजनों को भी इस देश के होटल-रेस्त्रां में कांटा-छुरी से खाने की अंग्रेजी तहजीब लाद दी जाती है। जो लोग भारतीय संस्कृति का झंडा-डंडा लेकर चलते हैं, उनसे लेकर, आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाने वाले लोगों तक, जब कभी किसी का मौका आता है, तो वे अपने को गुलाम साबित करते हुए कतार में खड़े हो जाते हैं।
इसके खिलाफ एक सामाजिक वैचारिक-बगावत की जरूरत है। एक ऐसी अराजक सोच की जरूरत है जो कि गैरहिन्दुस्तानी और इस देश के लिए अनफिट ऐसी तमाम चीजों को खारिज करने का हौसला दिखाए, और अपनी मर्जी की एक आजाद संस्कृति को इस्तेमाल करने की जिंदादिली दिखाए। भारत में अंग्रेजों के छोड़े गए मैले का टोकरा सिर पर ढोकर, कंधों पर और गले में टांगकर चलने वाले देसी-गुलामों के खिलाफ एक हिन्दुस्तानी सोच को बढ़ावा देना चाहिए। आज जनता के पैसों पर सरकारी एयरकंडीशनिंग भोगते हुए लोग अंग्रेजी दासता के टाई-कोट की गर्मी ढोते हैं, और इसका खर्च जनता के माथे पड़ता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

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