पेड़ लगाने के साथ-साथ यह हिसाब गिनाने की जरूरत कि पिछले पेड़ों का क्या हुआ?

संपादकीय
18 जुलाई 2017


बारिश का मौसम आता है और पूरे हिंदुस्तान में जगह-जगह पेड़ लगाने का अभियान शुरू हो जाता है। साल में कभी पेड़ लगाने का अभियान चलता है तो कभी साल में एक बार पर्यावरण पर फिक्र का जलसा होता है। और साल के हर दिन उसको बर्बाद करने का सिलसिला चलता है। एक बड़ी अजीब सी बात है कि पर्यावरण की बात करें तो पहली तस्वीर दिमाग में जंगल की बनती है, और आज पर्यावरण सबसे अधिक बर्बाद इंसान के जंगली रूख से हो रहा है। जंगल का रूख जंगल के जानवरों के लिए ठीक रहता है। वहां पर सबसे ताकतवर अपने से नीचे के लोगों को काबू में रखते हैं, और अपनी जरूरत के मुताबिक उनको खाते-पीते हैं। जो जानवर दूसरे जानवरों को नहीं खाते, वे भी घास-पत्तों को खाते हैं, और उनकी बिरादरी में भी ताकत का बोलबाला होता है। इंसान ने जंगल के जानवरों से सबसे ताकतवर के राज वाला रूख तो ले लिया है, लेकिन उसे जब इंसानी हवस के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है, तो धरती तबाह हो जाती है, हो रही है, हो चुकी है।
आज सबसे संपन्न और सबसे ताकतवर देश और इंसान दुनिया के प्राकृतिक साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के सबसे गरीब और कमजोर देशों और लोगों का धरती पर जो बराबरी का हक होना चाहिए, उसे मानो जंगल के ताकतवर जानवरों के अंदाज में संपन्न लोग छीन लेते हैं, और धरती को निचोड़कर रख देते हैं। आज अमरीका में सामानों की प्रति व्यक्ति खपत को देखें, तो अफ्रीका और भारत जैसे देशों के सौ-सौ लोगों जितनी खपत अमरीका के एक-एक इंसान की होगी। और अब जंगलों को, तेल के कुओं को, जमीन और पानी को जंगल सरीखे बाहुबल से हासिल करने की जंग चल रही है, फर्क यही है कि जंगल के जानवर अपनी अगली पीढिय़ों के लिए इमारतें नहीं छोड़ जाते। इंसान अपने दिमाग का खूंखार इस्तेमाल करते हुए दूसरों से छीने हुए हकों से अपनी तिजोरियां भी भरते हैं।
पर्यावरण की सारी बातें अपने से नीचे के लोगों को पर्यावरण बचाने की नसीहत देने वाली होती है। अपने इस्तेमाल को कम करने वाले लोग कम ही होते हैं, कम से कम ताकतवर तबकों में तो बिल्कुल ही नहीं होते। नतीजा यह होता है कि ताकत से हासिल अधिक से अधिक साधन और सुविधाओं के अधिक से अधिक इस्तेमाल से खपत आसमान पर पहुंच जाती है, और धरती लहूलुहान हो जाती है। मुंबई में मुकेश अंबानी का 27 मंजिला घर बनता है और उसमें इतनी बिजली लगती है कि गरीबों की दर्जनों बस्तियां उतने में रौशन हो जाएं। भारत जैसे लोकतंत्र में जब कोई कारखानेदार कंपनियों के खर्च पर, तो सरकारों में बैठे लोग जनता की जेब से हिंसक अंदाज में अपने लिए साधन जुटाते हैं, तो वे जरूरत से कई गुना अधिक फिजूलखर्ची करते हैं। और यह सब दुनिया में फैल चुकी पूंजीवादी व्यवस्था के गुलाम बने लोकतंत्र में बढ़ते ही चल रहा है।
दुनिया के प्राकृतिक साधनों पर जब कोई देश फौजी हमले से फिल्म अवतार की तरह कब्जा करने में लगा हुआ है, तो ऐसी जंग के बाद कब्जे में आए प्राकृतिक साधनों को और अधिक बेदर्दी से खर्च किया जाएगा। अमरीका जैसे पर्यावरण के दुश्मन देश अपने फौजी विमानों से बमों के साथ जिस लोकतंत्र को दूसरे देशों पर बरसाते हैं, वे उन गरीब देशों, या असहमत देशों की कुदरती दौलत को कब्जाने की नीयत से ऐसा करते हैं। जंग के बाद भी लूट के माल को बेरहमी से ही खर्च किया जाता है। इसलिए आने वाले दिन कमजोर देश और लोग पर्यावरण की चर्चा करते गुजारेंगे, और बाहुबली देश और लोग पर्यावरण पर, प्राकृतिक साधनों पर दूसरों के हकों को छीनकर बेहिसाब फिजूलखर्ची के साथ गुजारेंगे।
इस माहौल में पर्यावरण की सालाना फिक्र के जलसे की क्या अहमियत है, और सजावटी पेड़ों को लगा-लगाकर उन्हें मरने के लिए छोड़कर क्या हासिल किया जा सकेगा? छत्तीसगढ़ में अभी सरकार पूरे प्रदेश में पेड़ लगाने का अभियान शुरू कर रही है। इस मौके पर उसे पहले तो एक श्वेतपत्र प्रकाशित करना चाहिए कि राज्य बनने के बाद से अलग-अलग बरस में कितने पेड़ लगाए, और आज उनमें से कितने बचे हैं? इसके साथ-साथ इंसानों को यह भी सोचना पड़ेगा कि सामानों की फिजूलखर्च और धरती की बर्बादी की उसकी रफ्तार को क्या तस्वीरें खिंचवाने के लिए लगाए जाते पेड़ रोक पाएंगे? इस मौके पर यह याद दिलाना भी गलत नहीं होगा कि सजावटी और बाहरी नस्लों के महंगे पेड़ लगाने के बजाय सरकार को सिर्फ देशी और स्थानीय नस्लों के बड़े पेड़ लगाने चाहिए जो रख-रखाव नहीं मांगते और लंबा जिंदा रहते हैं। यह भी सोचने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में जगह-जगह बनाए जा रहे ऑक्सीजोन नाम के सघन वृक्षारोपण से पैदा होने वाली ऑक्सीजन शहरी गाडिय़ों के अंतहीन धुएं के साथ कब तक मुकाबला कर पाएंगी?

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