गो-हिंसा पर राज्यों को केन्द्र की नसीहत बेमतलब दिखावा

संपादकीय
19 जुलाई 2017


केन्द्र सरकार ने राज्यों को आदेश या निर्देश दिया है कि गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा पर एफआईआर दर्ज की जाए। देश के लिए आज शर्मिंदगी की सबसे बुरी और सबसे बड़ी वजह बन चुकी यह गो-हिंसा क्या ऐसी कागजी बात से थमेगी? यह मामला शर्मनाक है लेकिन फिर भी केन्द्र सरकार के इस निर्देश पर हंसी आती है। इसे एक महान कार्रवाई कहा जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि ऐसी कोई भी हिंसा होने पर हर राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी पुराने चले आ रहे कानूनों के मुताबिक भी बनती ही है कि उन पर एफआईआर कायम हों, और मुजरिमों को पकड़कर केस चलाया जाए। ऐसी हिंसा के मामले में राज्य सरकारों का यह अधिकार ही नहीं है कि वे इसे अनदेखा कर सकें, या बिना कानूनी कार्रवाई मुजरिमों को छोड़ सकें। इसका मतलब यह हुआ कि केन्द्र सरकार का यह कागज महज रद्दी की टोकरी के लायक है। यह कुछ उसी तरह का है कि केन्द्र सरकार राज्यों को लिखकर भेजें कि उनके राज्य में सुबह सूरज निकलेगा, और शाम को डूब जाएगा, सरकारें इस बात का ध्यान रखें।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त संसद में एक बड़े वकील रहे हुए एक सांसद इस बात को उठा रहे हैं, और यही तर्क दे भी रहे हैं। केन्द्र सरकार को एक तो समय रहते अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही है। दूसरी तरफ अलग-अलग राज्यों में जब किसी हिंसा के लिए कोई राज्य सरकार या कोई राजनीतिक दल जिम्मेदार रहते हैं, तो केन्द्र सरकार का रूख ऐसे मामलों में अलग-अलग रहता है, और उसमें साफ-साफ भेदभाव दिखता है। अगर गो-हिंसा, गो-गुंडागर्दी, गो-हत्या, गो-अपराध होते हैं, और राज्य सरकारों के मंत्रियों के ऐसे बयान आते हैं जो कि मुजरिमों पर कार्रवाई के बजाय घुमा-फिराकर हिंसा के शिकार लोगों पर और हिंसा के लायक दिखते हैं, तो केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह राज्यों को फटकार लगाए। लेकिन खुद केन्द्र के मंत्री ऐसी गैरजिम्मेदारी करते दिखते हैं, और शब्दों से परे केन्द्र सरकार का रूख किसी कड़ी कार्रवाई का नहीं है।
जब सड़कों पर गौरक्षा के नाम पर हत्याएं हुए हफ्ते या महीने गुजर जाते हैं तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दार्शनिक अंदाज के कुछ मसीहाई शब्द सामने आते हैं, जो कि तब तक बेअसर हो चुके रहते हैं। लेकिन जब ऐसा चलते रहता है, जब कत्ल के बाद कफन-दफन के बीच का वक्त रहता है, तब प्रधानमंत्री का कोई बयान नहीं आता, उनकी कोई ट्वीट नहीं आती। ऐसे ही रूख के बारे में हम पहले भी यहां लिख चुके हैं कि जब हफ्तों-महीनों बाद वे कुछ कहते हैं, तो वह बहुत कम, और बहुत देर से कहा हुआ पूरी तरह बेअसर बयान रहता है। संसद का सत्र आने के ठीक पहले प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में इस बारे में अफसोस जाहिर करते हुए राज्यों से कार्रवाई के लिए कहा था, लेकिन यह तो वैसे भी राज्यों की जिम्मेदारी बनती थी। आज जब संसद में इस पर बहस चल रही है, तो उसी वक्त विश्व हिन्दू परिषद का एक बयान आ रहा है जिसमें वह गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से इस्तीफा मांग रही है क्योंकि पर्रिकर ने बीफ के बारे में अभी यह कहा था कि वे अपने प्रदेश में बीफ की कमी नहीं होने देंगे। पर्रिकर के अलावा तकरीबन पूरा उत्तर-पूर्व भी बीफ के हक को छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं, और इसके लिए वहां के भाजपा के नेता पार्टी भी छोड़ दे रहे हैं। इस बहस के बीच केन्द्र सरकार के सामने यह दिक्कत भी खड़ी है कि पशु कारोबार की उसकी अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक दिया है।
कुल मिलाकर बात यह है कि केन्द्र की सत्तारूढ़ भाजपा जिस अंदाज में देश भर में बीफ पर रोक को लागू कर रही है, उससे एक हिंसक हौसला पाकर गौरक्षा के नाम पर कत्ल करने वाले मुजरिम खुलकर सड़कों पर हैं, और करोड़ों दलित-अल्पसंख्यक बेरोजगार हो रहे हैं, दहशत में जी रहे हैं, हिंसा का शिकार हो रहे हैं। केन्द्र सरकार की गाय इस देश की अर्थव्यवस्था को दिक्कतों की वैतरणी पार कराते नहीं दिख रही है, बल्कि वह मंझधार में इस देश के साथ-साथ खुद भी डूब मर रही है। भूखे और आत्महत्या करते किसानों के पास अपने जानवरों को खिलाने का पैसा भी नहीं बचा है, क्योंकि वे आखिर में जाकर उन्हें अब बेच भी नहीं सकते। गो-हिंसा के तमाम मामले सरकारी रूख से उपजे हुए हैं, और राज्यों को एफआईआर की नसीहत देने का कोई असर होने वाला नहीं है, और इस दिखावे की कोई जरूरत भी नहीं है।

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