निराश हिंसक भीड़ का इंसाफ लोकतंत्र खारिज कर देता है

संपादकीय
20 जुलाई 2017


हिमाचल के शिमला में एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के आरोप में फंसे एक नौजवान ने इसी आरोप में फंसे दूसरे नौजवान की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी। लेकिन इससे परे भी हिमाचल का शांत इलाका इस बलात्कार-हत्या पर उबला हुआ है, कई दिनों से शिमला बंद चल रहा है, और लोग सड़कों पर हैं। देश में कई और जगहों पर बलात्कार के आरोप में फंसे लोगों पर भीड़ ने हमले किए हैं, कहीं-कहीं हत्या भी कर दी है, और सड़कों पर लोग फैसले कर रहे हैं।
यह पूरा सिलसिला भारत की निचली अदालतों की बेअसर व्यवस्था, और वहां पर मुकदमे ले जाने वाली जांच एजेंसियों की नाकामयाबी का बहुत बड़ा सुबूत है। आज किसी जुर्म को लेकर लोगों के मन में यह भरोसा ही नहीं रहता है कि मुजरिम को सजा हो पाएगी। जांच एजेंसियां भ्रष्ट हैं, उनका काम बहुत कमजोर है, और अदालतों में बिना शक किसी जुर्म को साबित करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह है कि बलात्कार के मामलों में कुछ फीसदी लोग ही सजा पाते हैं, और बाकी छूट जाते हैं। आम लोगों का, खासकर गरीब और कमजोर लोगों का भारत की निचली न्याय व्यवस्था पर कोई भरोसा नहीं है और इसीलिए लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं। कुछ हफ्ते पहले ही उत्तर भारत की ही एक खबर आई थी कि किस तरह बलात्कार की शिकार जब थाने पर शिकायत करने पहुंची तो उस पर कार्रवाई करने के लिए थाने के लोगों ने उससे सेक्स की मांग की। और यह घटना अकेली नहीं है, जुर्म के शिकार लोगों से रिश्वत की उम्मीद आम बात है, और लोग यह भी जानते हैं कि राज्यों की पुलिस आमतौर पर दोनों पक्षों से वसूली करने में लगी रहती है, और उसी हालत में वह कार्रवाई करती है जब सुबूत चीख-चीखकर बोल रहे हों, और उन्हें अनदेखा करना मुमकिन न हो। इसके बाद निचली अदालतों में खूब भ्रष्टाचार रहता है, और उनकी रफ्तार ऐसी धीमी रहती है कि बरसों तक चलने वाले मुकदमों में बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की लगातार मानसिक यातना चलती है।
जब कानून अपना काम नहीं कर पाता, तब भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है। राज्यों को यह देखना होगा कि उनकी पुलिस और जिला स्तर की अदालतें अपना काम ठीक से करें, वक्त पर करें, और जुर्म के शिकार लोगों को इंसाफ मिल सके, और मुजरिमों को सजा मिल सके। जब दस-बीस बरस तक मुजरिमों को सजा नहीं मिल पाती है, तो समाज के बाकी लोगों का भी हौसला जुर्म के लिए बढ़ जाता है। ऐसे में निराश हिंसक भीड़ का इंसाफ लोकतंत्र को खारिज कर देता है, यह एक खतरनाक नौबत है।

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