बच्ची से बलात्कार और अनगिनत सवाल

संपादकीय
21 जुलाई 2017


चंडीगढ़ की एक अदालत ने दस बरस की एक बच्ची को गर्भपात की इजाजत नहीं दी है। उसका मामा उससे लगातार बलात्कार करते आया था, और अब वह 26 हफ्तों की गर्भवती है। भारत में कानून 20 हफ्तों से अधिक के गर्भ के बच्चे को खत्म करने की इजाजत नहीं देता। लेकिन इस मामले में अदालत के साफ रूख से परे, डॉक्टरों के सामने यह समझ नहीं है कि दस बरस की बच्ची का मां बनना मां-बच्चे दोनों की जिंदगी के लिए अधिक खतरनाक है, या उसका गर्भपात। दोनों ही मामलों में इस लड़की की जिंदगी और सेहत दोनों बहुत बुरी तरह खतरे में रहना तय है। अब इस सिलसिले में इस बच्ची के इलाके की जनता उबली पड़ी है कि इस बच्ची को बलात्कार के इस नतीजे को जिंदगी भर पालना पड़ेगा। हमारे सामने इस मामले से जुड़े कई पहलू हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं, लेकिन जिन पर दो-दो पल सोचने की जरूरत है।
सबसे पहली बात यह कि किसी परिवार में सबसे करीबी रिश्तेदारों से बच्चों को सुरक्षित मानना ठीक नहीं है। इसी हादसे की और जानकारी ढूंढने के लिए अभी हमने इंटरनेट पर इस खबर को ढूंढा तो इसके साथ-साथ अनगिनत ऐसी और खबरें आ गईं जिनमें मामा, चाचा, पिता और भाई जैसे करीबी रिश्तेदार बच्चों से बलात्कार करते आए हैं। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों मामलों में से कोई एक ही पुलिस और खबरों तक पहुंचता है। बाकी तमाम चीखें घर के भीतर ही दबा दी जाती है। इसलिए मां-बाप की पहली जिम्मेदारी अपने बच्चों को देह शोषण के बारे में जागरूक करना और उन्हें हिफाजत से रखना है। रिश्तों की जिम्मेदारी का नैतिक बोझ इंसानों के भीतर की हवस को हमेशा दबाकर नहीं रख पाती।
दूसरा पहलू कानून के बेअसर होने का है जिसके बारे में कल ही हमने इसी इलाके के एक पड़ोसी राज्य में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार और फिर उसकी हत्या को लेकर भारी तनाव बना हुआ है। जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक की कमजोरी और व्यापक भ्रष्टाचार के चलते लोगों को अब न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं रह गया है और लोग सड़कों पर इंसाफ चाहने लगे हैं। मुजरिम को सजा दिलाने का काम अगर बेहतर और असरदार नहीं हो पाएगा तो समाज में अराजकता भी बढ़ती जाएगी और मुजरिमों का हौसला भी।
भारत में जहां अब तकरीबन हर बच्चे को स्कूल भेजने की कोशिश होती है, वहां स्कूलों-बच्चों को देह शोषण के बारे में सावधान और जागरूक करने के लिए सबसे अच्छी जगह हो सकती है लेकिन पाखंडी सोच वाले इस देश में जैसे ही सेक्स-शिक्षा शब्द भी हवा में आता है, भारतीय संस्कृति के हिंसक ठेकेदार डंडे-झंडे लेकर इस शब्द को हवा में ही मारने में जुट जाते हैं। ऐसे में कोई बच्चे अपनी देह को लेकर जागरूक नहीं हो पाते। केन्द्र और राज्य सरकारें खुद होकर तो सेक्स-शिक्षा की सोचेंगी नहीं, किसी को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए ताकि सत्तारूढ़ पार्टियां अदालती आदेश की आड़ लेकर सेक्स-शिक्षा लागू कर सकें।
एक आखिरी सवाल हमें सुझाता है ईश्वर के बारे में। जो कण-कण में मौजूद माना जाता है, जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान माना जाता है, जो सबका भला करने वाला माना जाता है, जिसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह ईश्वर छोटे-छोटे बच्चों के साथ बलात्कार के वक्त कहां रहती है? क्या देखता है? क्या सोचता है? और कुछ करता क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि धर्म का नाम लेकर, धार्मिक चोगा पहनकर आसाराम से लेकर पादरियों तक और मौलवियों तक को बच्चों से बलात्कार में शामिल पाया जाता है। नास्तिक लोग तो ईश्वर की हकीकत जानते हैं और अपने बच्चों की खुद हिफाजत करते हैं। लेकिन जो आस्तिक और आस्थावान ईश्वर पर भरोसा करते हुए बैठे रहते हैं, उनको ऐसे मामलों को लेकर अपने-अपने ईश्वरों से सवाल जरूर करना चाहिए।

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