कार्टूनिस्ट की बनाई पार्टी को व्यंग्य जरा भी बर्दाश्त नहीं !

संपादकीय
22 जुलाई 2017


मुंबई में अभी स्थानीय म्युनिसिपल की असहिष्णुता का एक दूसरा चर्चित मामला सामने आया है। कुछ महीने पहले कॉमेडियन कपिल शर्मा ने म्युनिसिपल अफसरों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था, और जवाब में म्युनिसिपल ने उनका दफ्तर नापकर अवैध निर्माण निकाल दिया, और तोडऩे का नोटिस भेज दिया। अभी दूसरा मामला सामने आया है वहां एक रेडियो जॉकी मलिश्का मेंडोंसा ने शहर की सड़कों की गड्ढों को लेकर एक बड़ा मजेदार और मजाकिया गाना गाया और उसका वीडियो पोस्ट कर दिया। यह गाना एक लोकप्रिय मराठी गाने की धुन पर बनाया गया था और मुंबई की सड़कों के कुख्यात गड्ढों को लेकर म्युनिसिपल का मजाक था। नतीजा यह निकला कि मुंबई महानगरपालिका पर राज करने वाली शिवसेना ने इस वीडियो के आते ही मलिश्का के घर की जांच की, और वहां पर डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का लार्वा मिलना बताकर उसे एक नोटिस थमा दिया। शिवसेना के सत्तारूढ़ पार्षद इस रेडियो जॉकी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे की मांग करने लगे। महाराष्ट्र की राजनीति में राज्य में एक साथ सत्तारूढ़ भाजपा और शिवसेना के बीच तनातनी चलते रहती है, और शिवसेना के इस कदम पर भाजपा ने म्युनिसिपल पर हमला भी किया है और मलिश्का पर की गई कार्रवाई को व्यक्तिगत आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला भी बताया है।
शिवसेना के इस तरह आपा खो देने को देखते हुए यह याद पड़ता है कि इसके संस्थापक बाल ठाकरे एक वक्त कार्टूनिस्ट थे, और अच्छे तेज-तर्रार कार्टूनिस्ट थे। अब एक कार्टूनिस्ट की पार्टी भी एक व्यंग्य या मजाक पर इस तरह बौखलाकर कार्रवाई करती है तो यह उस पार्टी के लिए शर्मनाक बात है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान भारत की एक बहुत प्रतिष्ठित कार्टून पत्रिका शंकर्स-वीकली को उसके संपादक और कार्टूनिस्ट शंकर ने बंद कर दिया था कि जब लोगों की सहनशक्ति खत्म हो गई है, और सेंसरशिप लागू की जा रही है, तो वे इसे चलाने के बजाय बंद कर देना बेहतर समझते हैं। अब अगर देश की कारोबारी राजधानी की सड़कों पर वहां करोड़ों लोग भुगतते हैं, तो क्या लोगों को मजाक उड़ाने का भी हक नहीं है?
अमरीकी अखबारों को देखें और वहां पर ताजा मामलों पर बने हुए कॉमेडी के कार्यक्रमों को देखें तो समझ में आता है कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या होती है। देश के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति की बातों को लेकर जिस तरह की खिल्ली उनकी उड़ाई जाती है उसका एक फीसदी भी कोई हिन्दुस्तानी नेता शायद ही बर्दाश्त करे। और उसी से समझ में आता है कि जनता के बीच लोकतांत्रिक समझ कैसे विकसित होती है, और कैसे लोगों के बीच अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पनपती है। मुंबई के इस ताजा मामले को लेकर हमारा मानना है कि वहां के हाईकोर्ट को तुरंत इस मामले में दखल देना चाहिए और महानगरपालिका को पूछना चाहिए कि इस गायिका के घर पर डेंगू का लार्वा तलाशने के लिए जाने की उन्हें कैसे सूझी थी? मुंबई में दसियों लाख मकान हैं, और आनन-फानन किसी एक घर के भीतर का लार्वा म्युनिसिपल को अपने दफ्तर बैठे दिख गया? यह सरकारी गुंडागर्दी की एक मिसाल है, और हकीकत तो यह है कि ऐसी ओछी और अलोकतांत्रिक गुंडागर्दी से मुंबई महानगरपालिका ने अपनी ही नालायकी और निकम्मेपन को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
यह पूरा सिलसिला सिर्फ एक म्युनिसिपल का मानकर चलना ठीक नहीं है। देश में जहां-जहां ऐसी अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है, उसे तुरंत कुचलना जरूरी है, और अगर मुंबई का हाईकोर्ट इस पर पहल नहीं करता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ेगा।

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