बीवी बेचने का फतवा देने वाले बददिमाग अफसर...

संपादकीय
24 जुलाई 2017


बिहार के एक कलेक्टर का एक वीडियो कल से टीवी चैनलों पर चल रहा है जिसमें वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच और माईक से गरीबों को लताड़ते हुए, गाली देने के अंदाज में चीखते हुए कह रहे हैं कि अगर शौचालय बनाने का पैसा न हो, तो बीवी को बेच दो, और शौचालय बनाओ। अगर इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो अक्सर अपनी कही बात को तोड़-मरोड़कर छापने या दिखाने की तोहमत लगा देता, और बच निकलता। हालांकि अभी तक राज्य सरकार ने इस अफसर पर कोई कार्रवाई नहीं की है, लेकिन ऐसी उम्मीद की जाती है कि गरीबों की ऐसी बेइज्जती करने वाले तानाशाह अफसर को तुरंत ही मैदानी कुर्सी से हटाकर पिछवाड़े के किसी दफ्तर में बिठाया जाएगा।
यह बात हर कुछ दिनों में किसी न किसी प्रदेश से सामने आती है कि किस तरह ताकत की कुर्सियों पर बैठे अफसर जनता को, या मातहत कर्मचारियों को अपना गुलाम मानकर उनके साथ सामंती सुलूक करते हैं। आमतौर पर जिला कलेक्टरों की कुर्सी पर बैठे हुए अफसरों के बीच से ऐसी बददिमागी कुछ अधिक दिखती है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण कहे जाने वाले जिले इंदौर के कलेक्टर पर बनी एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की खबर सामने आई है जिसमें उस अफसर की महानता की स्तुति भरी हुई है, और उसके गुणगान की बातों में उस अफसर और उसके परिवार से बातचीत भी शामिल है। जाहिर है कि उस अफसर की मर्जी और संभवत: उसकी पहल पर ही यह स्तुति तैयार हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हम इस तरह के बहुत से आत्ममुग्ध अफसरों को देखते हैं जो कि अपने प्रचार के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, और अपनी निजी बातों को भी सोशल मीडिया पर तस्वीरों सहित फैलाने में लगे रहते हैं। लोकतंत्र में इस तरह के प्रचार से बचकर अफसरों को अपने नाम और अपनी तस्वीरों को पीछे रखकर सरकार को आगे रखना चाहिए, लेकिन अफसर अपनी वाहवाही से बच नहीं पाते हैं, और बहुत से मामलों में तो वे सरकारी खर्च पर भी अपने और परिवार के प्रचार में लगे रहते हैं।
हमने पहले भी इसी कॉलम में यह सुझाया था कि अंग्रेजों के वक्त टैक्स कलेक्ट करने का काम होता था, और इसलिए जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अफसर को कलेक्टर कहा जाता था। अब तो सरकार जिलों से ऐसा कोई बड़ा टैक्स इकट्ठा करती नहीं है, और टैक्स इकट्ठा करने वाले विभाग अलग काम करते हैं। ऐसे में अंग्रेजों के वक्त का यह नाम खत्म करना चाहिए। लेकिन इससे परे इस कुर्सी के एक नाम और चलता है जिलाधीश, इस नाम से भी मठाधीश जैसी बू उठती है और यह नाम अफसरों में एक सामंती अहंकार पैदा कर देता है। छत्तीसगढ़ सरकार इस बात की पहल कर सकती है कि कलेक्टरों और जिलाधीशों के पदनाम बदलकर जिला जनसेवक जैसा एक नाम बनाएं ताकि अफसरों को हमेशा यह ध्यान रहे कि उनकी बुनियादी जिम्मेदारी क्या है। आज तो छत्तीसगढ़ के बहुत से अफसर अपने जिलों से अपनी ऐसी तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं जिनमें वे महंगी-निजी गाडिय़ों को किराए पर लेकर उस पर कलेक्टर या कमिश्नर के नाम की तख्ती लगाकर उसका इस्तेमाल करते हैं, और कहीं उसका किराया कोई अफसर घोषित या अघोषित रूप से देते हैं, या फिर कोई सरकारी ठेकेदार उसका भुगतान करते हैं। राज्य सरकार को अफसरों की ऐसी मनमानी को तुरंत खत्म करना चाहिए, वरना बिहार के इस कलेक्टर की तरह छत्तीसगढ़ का भी कोई अफसर गरीबों को बेटी-बहू या बीवी बेचने का फतवा इसी तरह मंच से देने लगेगा। लोकतंत्र में अफसरों की भूमिका नीति-निर्धारण करने वाले विधायकों और सांसदों, और उनमें से चुनकर मंत्री बने लोगों के मातहत ही होनी चाहिए। इसके अलावा अफसरों का अपना कोई एजेंडा नहीं होना चाहिए, सिवाय लोकतंत्र के संवैधानिक दायरे के भीतर आने वाली सत्तारूढ़ पार्टी की नीतियों पर बने सरकारी कार्यक्रमों पर अमल करने के। हर राज्य की सरकार को अपने-अपने प्रशासनिक ढांचे में तुरंत ही एक लोकतांत्रिक बर्ताव लाना चाहिए, वरना सत्तारूढ़ पार्टी को अगले चुनाव में हराने की पर्याप्त क्षमता बददिमाग अफसरों के बर्ताव में रहती है। 

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