जेएनयू में फौजी टैंक की सोच हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद

संपादकीय
25 जुलाई 2017


समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र जैसे बहुत से विषयों पर अपनी एक मौलिक और उदार सोच के साथ ऊंचे दर्जे की पढ़ाई और शोध कार्य के लिए विश्वविख्यात जेएनयू को उग्र राष्ट्रवाद का निशाना बनाया जा रहा है। एनडीए सरकार के आने के बाद वहां कुलपति बने जगदेश कुमार अब चाहते हैं कि विश्वविद्यालय कैंपस में भारतीय फौज का कोई रिटायर्ड युद्धक टैंक लाकर खड़ा किया जाए ताकि वहां के छात्रों के बीच फौज के लिए पे्रम उपज सके। जगदेश कुमार पिछले कुछ अरसे से वामपंथी रूझान वाले छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों से लगातार टकराव लिए हुए चल रहे हैं, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जेएनयू की पहचान एक वामपंथी रूझान वाले शिक्षा केंद्र के रूप में बनी हुई है। वहां के छात्र-छात्राओं को बदनाम करने के लिए दो बरस पहले छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को झूठे मामलों में झूठे वीडियो सुबूत गढ़कर फंसाया गया था, लेकिन ऐसी साजिश करने वाले दिल्ली पुलिस अदालत में खड़ी नहीं हो पाई। लेकिन तब तक पूरे देश में वामपंथ-विरोधियों ने कन्हैया कुमार और जेएनयू को देशद्रोही करार देने का अभियान छेड़ दिया था, जो कि अब तक जारी है, और विश्वविद्यालय ने फौजी टैंक खड़ा करने की सोच इस अभियान का ही एक हिस्सा है।
जेएनयू किसी भी कार्रवाई के लिए पुलिस और दूसरी एजेंसियों के सामने उतना ही खुला हुआ है जितना कि देश का कोई भी दूसरा विश्वविद्यालय। ऐसे में एक उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान को मौलिक सोच से परे करने का काम भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को भी चौपट करेगा, कर रहा है, क्योंकि देश के बाहर चाहे आईआईटी-आईआईएम के लोगों को रोजगार अधिक मिलता हो, सामाजिक विज्ञान से जुड़े तमाम पहलुओं पर देश की साख जेएनयू से ही है। अब वामपंथ-विरोधियों को यह भी सोचना चाहिए कि पूरी दुनिया में कहीं भी मौलिक सोच के लिए लोगों को वामपंथियों की ओर ही क्यों देखना पड़ता है? दक्षिणपंथियों में स्तर के विद्वान, लेखक, या प्राध्यापक क्यों नहीं पनप पाते हैं? इस आत्ममंथन से परे अगर देश के शिक्षा संस्थानों का हिंदूकरण या हिंदुत्वकरण करने, उन्हें राष्ट्रवाद के कारखाने बना देने का काम अगर किया जाएगा, तो हिंदुस्तानियों की पूरी पीढ़ी ही इसका नुकसान झेलेगी।
हम छत्तीसगढ़ में ही बनाए गए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को देखते हैं कि पिछले कई बरस से इस विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के बजाय राष्ट्रवादिता का अभियान चलते आया है, और उसी का नतीजा है कि देश के तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकारों के नाम पर बहुत ही औसत दर्जे के लोगों को बुला-बुलाकर गैरमीडिया मुद्दों पर राष्ट्रवादी कार्यक्रम करवाए गए, और यहां से मीडिया के पेशे में बहुत ही कम लोग आए पाए। नतीजा यह निकला कि इतने बरस गुजर जाने के बाद भी यह विश्वविद्यालय महज कुछ सौ छात्र-छात्राओं तक सीमित है, और राष्ट्रवादी इसे अपने रंग में रंगने के एक कारखाने की तरह चला रहे हैं जिसका मीडिया में योगदान शून्य है।
हर सत्तारूढ़ पार्टी की अपनी विचारधारा के मुताबिक बहुत से ओहदो को भरने का विशेषाधिकार रहता है। लेकिन न तो लोगों का कोई भला हो, और न ही संस्थान की साख बची रहे, ऐसे मनोनयन लोगों को पांच बरस की सहूलियत और मर्जी के लोगों को बाकी नौकरियां देने में तो काम आ सकती है, लेकिन इन संस्थानों की खोई हुई प्रतिष्ठा लंबे समय तक वापिस नहीं आ पाएगी, और बाकी की दुनिया के विद्वान लोग भारत को हिकारत की नजर से जरूर देखेंगे। जेएनयू में टैंक खड़ा करना एक हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद की सोच है, और इसमें यह देश झुलसकर रह जाएगा।

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