नेहरू पर तंगदिली के साथ कोविंद की पारी शुरू

संपादकीय
26 जुलाई 2017


नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद के अपने पहले भाषण में बड़ी सावधानी से बहुत से नाम लिए जिन्हें उन्होंने महान परंपरा बनाने वाला कहा। लेकिन इस फेहरिस्त में उन्होंने नेहरू का नाम छोड़ दिया। इस पर आज सुबह संसद में कांग्रेस ने हंगामा भी किया कि भाजपा के अपने आस्था केन्द्र दीनदयाल उपाध्याय का नाम गांधी के साथ, गांधी की बराबरी से लिया गया, और नेहरू के नाम का जिक्र भी नहीं किया गया। लेकिन कांग्रेस ने तो यह बात आज उठाई, आज सुबह के अनगिनत अखबारों में स्तंभकारों और संपादकों ने इस बात को पहले ही उठा दिया था, और जाहिर है कि उन्होंने कल ही यह बात लिख दी होगी। इन दोनों बातों को अधिकतर गंभीर संपादकों ने समझा, और टिप्पणी के लायक माना।
जब कभी कोई किसी ऐतिहासिक मौके पर आजाद भारत में, या कि भारत की आजादी में योगदान देने वालों के नाम गिनाते हैं, तो कांग्रेसी-गैरकांग्रेसी किसी भी तरह की विचारधारा के लोग गांधी के तुरंत बाद नेहरू का नाम गिनाते आए हैं, और अनगिनत इतिहासकारों ने भी भारत की आजादी और भारत-निर्माण में गांधी के तुरंत बाद नेहरू को जगह दी हुई है। जब कभी बड़प्पन दिखाने का कोई मौका रहता है, तब अगर तंगदिली दिखाई जाती है, तो वह तुरंत इस तरह खटक जाती है कि मानो चावल में कंकड़ हो। अगर कंकड़ न हो तो चावल के अच्छे या बुरे होने की तरफ किसी का ध्यान भी न जाए। कल अगर नए राष्ट्रपति ने दर्जन भर नामों की लिस्ट में नेहरू का नाम भी गिना दिया होता, तो उससे न तो उस सरकार की विचारधारा पर कोई चोट पहुंचती जिसने कि उन्हें राष्ट्रपति बनाया है, और न ही राष्ट्रपति के पद की गरिमा इस तरह से कम होती कि पहले ही भाषण को लेकर कोविंद को व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ता। दरियादिली लोगों की इज्जत बढ़ाती है, और तंगदिली उनकी इज्जत उससे अधिक रफ्तार से घटा देती है। कोविंद को कम से कम यह तो याद रखना था कि कुछ महीने पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी नेहरू की तारीफ सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं, और यह कोई छुपी हुई बात तो है नहीं कि मोदी और उनकी पार्टी के मन में नेहरू के लिए कोई बहुत अधिक सम्मान है नहीं।
एक तरफ तो रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद प्रत्याशी मनोनीत होने के बाद, फिर चुनाव जीतने के बाद, और फिर शपथ ग्रहण के बाद हर बार सहमति-असहमति, एकता और अनेकता, और वैचारिक विविधता की चर्चा करते हुए अपने को दलगत राजनीति से ऊपर रखने की बात कही थी। लेकिन अपने जीवन के इतने महत्वपूर्ण इस पहले भाषण में, और खासकर लिखित भाषण में उन्होंने जिस अंदाज में नेहरू को अनदेखा किया है, वह उनके पद की गरिमा के ठीक खिलाफ गया है, और इससे उस पार्टी का सम्मान भी घटा है जिसने उन्हें राष्ट्रपति बनाया है। नेहरू से असहमति एक अलग बात हो सकती है, लेकिन इस देश को आजाद कराने में, भारत को एक नए आजाद देश के रूप में बनाने में नेहरू से बड़ा योगदान और किसका था? आगे भी पांच बरस के कार्यकाल में राष्ट्रपति के सामने ऐसे बहुत से मौके आएंगे जब उन्हें अपनी मातृ संस्था की विचारधारा से ऊपर उठकर भारत के राष्ट्रपति के रूप में कहना होगा और करना होगा, और अगर वे ऐसे सार्वजनिक मौकों पर भी कमजोर पड़ेंगे, तंगदिली दिखाएंगे, तो इतिहास तो हर राष्ट्रपति को अच्छे से दर्ज करता ही है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 18वां कारगिल विजय दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. दरियादिली लोगों की इज्जत बढ़ाती है, और तंगदिली उनकी इज्जत उससे अधिक रफ्तार से घटा देती है......!!

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