बिहार में अब हारा-जीता गठबंधन नीतीश की हार, भाजपा की जीत

संपादकीय
27 जुलाई 2017


बिहार में किसकी जीत हुई, और किसकी हार इसका विश्लेषण कुछ जटिल है। जीत और हार के पैमाने पर बिहार के पिछले चौबीस से कम घंटों को रखने के लिए पहले तो यह तय करना होगा कि जीत किसे मानें, और हार किसे। अलग-अलग नजरिए से अलग-अलग लोग जीते और हारे हुए दिखेंगे। सत्ता पर काबिज बने रहने के नजरिए से नीतीश जीते हुए हैं क्योंकि वे कुछ घंटों के भीतर ही मुख्यमंत्री, कार्यवाहक मुख्यमंत्री, और फिर नए मुख्यमंत्री बन गए हैं, और हिन्दुस्तान में ऐसी रफ्तार कम ही देखी गई है। दूसरी तरफ वे अगले आम चुनाव में विपक्ष के एक सर्वसम्मत या अधिकतम संभव सहमति वाले प्रधानमंत्री-प्रत्याशी बनने की संभावना हमेशा के लिए खो चुके हैं। बिहार के सत्तारूढ़ महागठबंधन के टूटने के लिए अकेले जिम्मेदार लालू यादव का कुनबा भी राजनीति और कानून में हारा हुआ है, लेकिन वह काली कमाई के मामले में जीता हुआ है। कांग्रेस पार्टी की हालत बिहार और वहां के कल तक के महागठबंधन कुछ वैसी थी जैसी कि बड़ों के खेल में शामिल किसी बच्चे को रियायत देते हुए उसे दूध-भात कह दिया जाता है, यानी उसका एक रियायती दर्जा रहता है। कांग्रेस के पास खोने-पाने को कुछ भी नहीं है, इसलिए वह आज यह लतीफा झेल रही है कि तलाक तो लालू और नीतीश में हुआ, लेकिन विधवा कांग्रेस हो गई। हम मजाक में भी महिला के लिए इस शब्द के खिलाफ हैं, लेकिन देश की आज की राजनीतिक चर्चा का एक नमूना यहां रख रहे हैं।
अब कुछ सवाल और खड़े होते हैं जिन पर लोग सोच सकते हैं। बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार भाजपा की पिछली भागीदारी से निकलकर एक नए गठबंधन में शामिल हुए थे, और उनकी इस पहल की अकेली बुनियाद भाजपा और संघ का विरोध थी। उनके इस ताजा रूख के चलते लालू-सोनिया उनके साथ थे, और बिहार में यह गठबंधन एक ऐतिहासिक बहुमत लेकर आया था, और मोदी के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को बिहार में खूंटा गाड़कर बांध दिया गया था। इसलिए आज जब अपनी उगली हुई तमाम बातों को निगलकर नीतीश कुमार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना रहे हैं, तो यह सबसे बड़ी जीत तो भाजपा की है जिसने अगले आम चुनाव के विपक्षी गठबंधन का भट्टा बैठा दिया है, और एक संभावित प्रतिद्वंद्वी को अपने 18 राज्यों में से एक राज्य तक सीमित कर दिया है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विपक्ष का यह सबसे बड़ा नुकसान है और अगले आम चुनाव में इस नुकसान से उबरने का विपक्ष के पास अब कोई रास्ता बचा नहीं दिखता है।
नीतीश और भाजपा ने एक-दूसरे के खिलाफ पिछले कुछ बरसों में जितना कुछ कहा है, उसे लोग तो याद रखेंगे, लेकिन बिहार की सत्ता पर बने रहने के लिए नीतीश और इस सत्ता पर आने के लिए भाजपा ने, अपना उगला सब निगलना तय कर लिया है। अब अमित शाह भी यह नहीं कहेंगे कि अगर नीतीश मुख्यमंत्री बनेंगे तो फटाके पाकिस्तान में फूटेंगे, और न नीतीश कुमार अब भारत को संघमुक्त करने का बीड़ा उठाएंगे। लेकिन ऐसी नौबत के बीच अब जब बिहार की नीतीश-भाजपा सरकार एक हकीकत बन चुकी है, तो भारत की राजनीति की एक दूसरी हकीकत के बारे में भी बाकी पार्टियों को सोचना चाहिए।
बिहार में महागठबंधन के टूटने के पीछे लालू-कुनबे पर भ्रष्टाचार के जो नए मामले सामने आए, उनकी बड़ी अहमियत रही। दिग्विजय सिंह जैसे लोग आज नीतीश को यह जरूर याद दिला सकते हैं कि जिस दिन गठबंधन में शामिल हुए थे, क्या उस दिन लालू कुनबे पर चल रहे मुकदमों की जानकारी नहीं थी? लेकिन यह बात अपनी जगह सच है कि गठबंधन में भागीदार लालू खुद सरकार में शामिल नहीं थे, और उनका बेटा जो कि नीतीश के साथ उपमुख्यमंत्री था, उसके खिलाफ कानून ने ताजे मामले दर्ज किए थे, और लालू कुनबे की अथाह संपत्ति का सत्ता से रिश्ता साफ होते चल रहा था। ऐसे में गठबंधन शायद बना रह सकता था, अगर भ्रष्टाचार के मामले में घिरा लालू का बेटा मंत्रिमंडल से हट जाता। लेकिन अगर लालू यादव अपने बेटे को नहीं बचा पाते, तो अपनी राजनीति भी नहीं बचा पाते, इसलिए गठबंधन चाहे न बचा हो, गठबंधन की आखिरी सांस तक लालू ने अपने बेटे की कुर्सी को बचाया, और फिर कांग्रेस के पास तो इस गठबंधन में बोलने की कोई जुबान है नहीं। बिहार में अपने दम पर उसकी कोई हस्ती नहीं है, और वह नीतीश-लालू के रहमोकरम पर सत्तारूढ़ राजनीति में बनी हुई थी।
बिहार की कल की इस ताजा सत्तापलट से देश में एनडीए की एक और बहुत बड़ी जीत हुई है, और यह बात साफ हुई है कि कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार से लदे हुए राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई नहीं लड़ सकते। कल से अब तक बिहार के इस फेरबदल पर जनादेश शब्द का बड़ा इस्तेमाल हो रहा है कि बिहार की जनता ने नीतीश-लालू-कांग्रेस गठबंधन को भाजपा के खिलाफ जनादेश दिया था, और उससे गद्दारी करके नीतीश भाजपा के साथ सरकार बना रहे हैं। इस तोहमत का जवाब देते हुए कई लोग यह भी याद दिला रहे हैं कि 1980 में हरियाणा में भजनलाल जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे, और बहुत सारे विधायकों सहित कांग्रेस में चले गए थे, और मुख्यमंत्री बने रहे थे। इसलिए जनादेश के ऐसे किसी बड़े सम्मान की भारत में कोई बड़ी गौरवशाली परंपरा रही नहीं है। नीतीश के जाने पर राहुल के यह कहने की कोई अहमियत नहीं है कि उन्होंने गठबंधन को धोखा दिया है। ऐसे ही धोखेबाज भजनलाल के लिए राहुल के कुनबे ने 1980 में लाल कालीन बिछाया था।
दूसरी तरफ बिहार की जनता के एक तबके का यह भी मानना है कि बहुत लंबे अरसे बाद केन्द्र और राज्य दोनों जगह एक गठबंधन की सरकार रहेगी, और इससे बिहार का भला होगा। यह एक और बात है कि पिछले चौबीस घंटे में नीतीश सत्ता को तो एक नए सिरे से पा गए हैं, लेकिन अपनी साख पूरी तरह खो बैठे हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें