नवाज शरीफ के मामले से निकला सबक, जुर्म पकड़ आ ही जाता है

संपादकीय
29 जुलाई 2017


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार मामलों में जिस तरह से कुर्सी छोडऩी पड़ी, वह पाकिस्तान में कोई नई बात नहीं है। उनसे पहले उनके सबसे बड़े विरोधी भुट्टो-जरदारी परिवार के आसिफ अली जरदारी के भ्रष्टाचार पकड़ में आए थे, और उनके खिलाफ भी अदालती फैसले हुए थे। दरअसल जहां-जहां लोकतंत्र कमजोर होता है, मीडिया और अदालत जैसे लोकतांत्रिक संस्थान कमजोर होते हैं, जहां आतंकी या फौजी हावी होते हैं, जहां पर धार्मिक कट्टरता राज करती है, वहां पर इस तरह के भ्रष्टाचार बढऩा तय रहता है। इसलिए नवाज शरीफ का हटना महज वक्त की बात थी, किसी को उनके हटने पर शक नहीं था, यह नौबत कब आएगी, सिर्फ इसका इंतजार हो रहा था। और अब दूसरा इंतजार इस बात का हो रहा है कि वे अपने परिवार के किसको अपनी कुर्सी देते हैं। कल तक उनके भाई का नाम सुर्खियों में आ रहा था, और आज सुबह ऐसी भी एक खबर है कि वे लालू की राबड़ी की तरह अपनी पत्नी को प्रधानमंत्री बना सकते हैं। उनकी जो बेटी सियासत में शामिल थी, और जिसके सामने एक अच्छा राजनीतिक भविष्य हो सकता था, वह भी नवाज के भ्रष्टाचार में शामिल मानी गई है, और उसके भी चुनाव लडऩे पर अदालती रोक लग गई है।
लेकिन भारत-पाकिस्तान जैसे देशों में भ्रष्टाचार न तो नया मुद्दा है, और न ही बड़ा मुद्दा है। भारत में भी मुख्यमंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार करने वाले ओमप्रकाश चौटाला जेल में ही हैं, और भी कई केन्द्रीय मंत्री जेल जाकर आ चुके हैं। लेकिन जिन-जिन देशों में सत्ता भ्रष्टाचार से जुड़ी रहती है, वहां पर एक वक्त ऐसा आता है जब तक ताकतवर लोगों के भ्रष्टाचार भी उजागर होते हैं, और ऐसे लोगों को नवाज शरीफ का यह मामला देखना चाहिए। उनकी बड़ी होशियार और पढ़ी-लिखी, तजुर्बेकार और दौलतमंद बेटी ने जालसाजी-धोखाधड़ी करते हुए एक ऐसा निजी दस्तावेज तैयार किया था जिसे उन्होंने पुराना कागज बताया था, लेकिन जिसका प्रिंट निकालते हुए उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट के एक ऐसे फॉंट का इस्तेमाल किया था जो कि उस पुरानी तारीख पर प्रचलन में ही नहीं था। नतीजा यह निकला कि वे कागजात अदालत में फर्जी साबित हो गए, और उसी बुनियाद पर यह केस खड़ा हो गया, सजा हो गई।
भ्रष्टाचार करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि उससे दौलत तो मिल जाती है, लेकिन जैसे कि किसी भी दूसरे जुर्म के सुबूत छूटते चलते हैं, भ्रष्टाचार के भी सुबूत कायम रहते हैं, और लालू जैसे लोग, कई दूसरे नेताओं और अफसरों जैसे लोग जेल चले जाते हैं, सजा पा जाते हैं, और उनका चुनावी भविष्य खत्म हो जाता है। यह एक अलग बात है कि भारत और पाकिस्तान की राजनीति में सजायाफ्ता नेता भी अपने कुनबे को कुर्सी पर बिठाकर बैक सीट ड्राइविंग करते चलते हैं, और उनके सजा पाने से उनकी पार्टी खत्म नहीं हो जाती। आज हम इस मुद्दे पर महज इसलिए लिख रहे हैं कि भ्रष्टाचार या इस किस्म के दूसरे जुर्म करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि साजिश और झूठे सुबूत कभी भी इतने गहरे नहीं दफनाए जा सकते कि उनको खोदकर निकाला न जा सके। कहीं न कहीं हर मुजरिम से चूक होती है, और सत्ता में ऊपर बैठे हुए लोग तो अपने अधिकतर जुर्म आसपास के सहयोगियों की मदद से ही कर पाते हैं, और दुनिया का यह इतिहास है कि ऐसे सहयोगी मुसीबत आने पर अदालत में सरकारी गवाह बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। एक वक्त था जब कम्प्यूटर और टेलीफोन नहीं थे, और जुर्म के सुबूत आसानी से पकड़ में नहीं आते थे। लेकिन अब जांच एजेंसियों के औजार अधिक बारीक हो गए हैं, इसलिए हर तरह के जुर्म पकड़ में आ ही जाते हैं। पाकिस्तान का कई बार प्रधानमंत्री रहा हुआ आदमी कम्प्यूटर के फॉंट के गलत इस्तेमाल से कुर्सी खो बैठा, और चुनावी भविष्य भी खो बैठा। यह देखते हुए भारत में भी लोगों को अपने काम के बारे में दुबारा सोचना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें