सूचना के अधिकार के बीच सिंचाई विभाग की अपना भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश

संपादकीय
31 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों से भरे हुए सिंचाई विभाग के सचिव ने अपने अफसरों को लिखा है कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो जैसी दूसरी जांच एजेंसियों या राजभवन जैसी संस्थाओं से मांगी गई जानकारी विभागीय अनुमोदन के बिना सीधे न दी जाए। इस पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने आपत्ति करते हुए इस आदेश को गैरकानूनी बताते हुए मुख्य सचिव को लिखा है कि जानकारी देने से मना करने वाले कानून के खिलाफ काम करेंगे। यह आदेश हैरान करने वाला है क्योंकि एक तरफ तो देश में सूचना का अधिकार लागू किया गया है, और उसकी गारंटी के लिए हर राज्य में संवैधानिक शर्त के रूप में सूचना आयोग बनाए गए हैं, सूचना न देने पर जुर्माने का प्रावधान भी है। दूसरी तरफ सरकार का कोई विभाग इस तरह की रोक लगाकर अपने भीतर के भ्रष्टाचार को छुपाने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा। आज सिंचाई विभाग के कई आदेश हवा में तैर रहे हैं जिसमें सिंचाई मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के परिवार की जमीन के मामलों में विभाग ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है, यह बात उजागर होने के पहले से ही विभाग को यह मामला अच्छी तरह मालूम था, और ऐसा विभाग जांच एजेंसियों से भी जानकारी छुपाने की कोशिश कर रहा है, तो राज्य शासन को इस आदेश को खारिज करना चाहिए।
दरअसल नेताओं और अफसरों को सूचना के अधिकार नहीं सुहाते। अब जनता की पहुंच कानूनी हक के साथ सरकारी फाईलों तक हो चुकी है, और आम जनता भी जिस जानकारी को सीधे मांग सकती है, उस जानकारी को भी जब अपने बड़े-बड़े अफसरों को देने से मना किया जा रहा है, तो इससे विभाग की नीयत साफ दिखती है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और सिंचाई विभाग के बीच कुछ हफ्तों से एक तनातनी चल रही थी जब सिंचाई विभाग के कुछ भ्रष्ट मामलों पर एसीबी ने जांच शुरू की। इसके खिलाफ सिंचाई मंत्री ने मुख्यमंत्री को यह लिखा कि ऐसी जांच से विभाग के निर्माण कार्य प्रभावित होंगे। यह बात जगजाहिर है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बहुत ही आम बात है। जब-जब एसीबी के छापे पड़ते हैं, तो इन विभागों के अधिकारियों से दसियों करोड़ की काली कमाई बरामद होती है, और यह जाहिर है कि विभाग के निर्माण बजट का एक चौथाई हिस्सा भ्रष्टाचार में चले जाता है। ऐसे भ्रष्ट विभाग भी जब जानकारी को छुपाकर रखना चाहते हैं तो सरकार के काम में ईमानदारी और पारदर्शिता की थोड़ी-बहुत भी संभावना खत्म हो जाती है।
सिंचाई विभाग का एसीबी से टकराव भ्रष्टाचार को छुपाने, दबाने, और जारी रखने की एक खुली कोशिश है, और कल से शुरू हो रही विधानसभा में भी इस बारे में विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। हमारा तो सुझाव यह है कि राज्य के जितने निर्माण विभाग हैं उन पर निगरानी रखने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम और काबिल एक ऐसे बड़े अफसर को इन विभागों के बाहर से लाना चाहिए जो कि समय रहते गड़बड़ी को पकड़ सके। जब एनीकट बह जा रहे हैं, बांध फूट जा रहे हैं, नहरों की गड़बड़ी पकड़ में आ रही है, तो उसके बाद फिर किसी जांच से नुकसान की भरपाई तो नहीं हो पाती। राज्य सरकार को चाहिए कि मुख्य सूचना आयुक्त का जो पद साल भर से खाली पड़ा हुआ है, उस पर किसी ईमानदार व्यक्ति को नियुक्त करे, वरना सरकारी विभाग अपने भ्रष्टाचार को दबाने और छुपाने में जितनी खुली कोशिश कर रहे हैं, वह सिंचाई विभाग की इस चि_ी से जाहिर है। मुख्यमंत्री को इस बारे में तुरंत देखना चाहिए। 

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