भारत और पड़ोसी देशों से ताजा रिश्तों की जटिलता

संपादकीय
4 जुलाई 2017


अमरीका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के चलते दुनिया के कई देशों के साथ अमरीका के संबंधों में खासा फर्क आया है। इसी तरह भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुत से देशों के साथ रिश्तों में इतनी उथल-पुथल हुई है कि जब पानी ठहरेगा तो भारत किसके साथ कैसा रहेगा, यह अंदाज लगाना कुछ मुश्किल है। इस बीच रूस के साथ भारत के पुराने और परंपरागत संबंधों पर कुछ आंच आई दिखती है, हालांकि भारत और रूस दोनों ही इस बात को उजागर करते नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ चीन को अगर देखें तो भारत के साथ उसके संबंध लगातार तनावपूर्ण होते चल रहे हैं, और सरहद पर शायद 1962 के बाद से पहली बार भारत-चीन तनाव इतना बढ़ा हुआ है।
भारत की विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ चीन के संबंध देखें, तो पाकिस्तान चीन के पाले में है, और भारत से उसके रिश्ते दुश्मनी सरीखे हैं। दूसरी तरफ नेपाल के साथ भारत के संबंध पहले सरीखे नहीं रहे, और इस नौबत में नेपाल और चीन कई मामलों में करीब भी आए हैं। बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका तक, और बर्मा से लेकर भूटान तक, इन तमाम देशों के साथ चीन ने अपने रिश्ते सुधारे हैं, और भारत के लिए यह एक फिक्र की बात है कि उसके इर्दगिर्द एक ऐसी माला तैयार हो रही है जिसका हर मोती भारत के मुकाबले चीन के अधिक करीब है।
जब तक कोई जंग न हो, तब तक तो सब ठीक है, लेकिन किसी जंग की हालत में यह बात मायने रखती है कि सरहदी देश किसके साथ हैं। यही वजह है कि अमरीका दुनिया के हर इलाके में अपने ऐसे फौजी ठिकाने, या ऐसे पि_ू देश तैयार रखता है जहां की जमीन का इस्तेमाल करके वह अपनी फौजों को कुछ घंटों में ही दुनिया के हर हिस्से पर हमले के लिए तैनात कर सके। यह तो एक अलग बात है कि मुस्लिम-आतंक के चलते ट्रंप ने दुनिया के कई देशों के साथ अपने रिश्ते कम किए हैं, और ऐसा ही कुछ अमरीका और पाकिस्तान के बीच भी हुआ है। लेकिन भारत के पक्ष में कुल मिलाकर यही एक राहत की बात पिछले दो-तीन बरस में सरहद पर दिखती है कि दुनिया की नजरों में, और अमरीका से आर्थिक मदद के मामले में पाकिस्तान नीचे गिरा है, और खुद पाकिस्तान अपनी हरकतों से कमजोर और खोखला हो गया है। लेकिन भारत के दीर्घकालीन हित में यह होगा कि सरहद के सभी देशों के साथ उसके संबंध अच्छे रहें, और इस मामले में हम पाकिस्तान को भी शामिल करके चल रहे हैं क्योंकि भारत का सबसे बड़ा फौजी खर्च पाकिस्तान के खिलाफ तैयारी पर लगता है।
नरेन्द्र मोदी दुनिया भर में दौरे करके अपनी एक मजबूत सार्वजनिक मौजूदगी से कुछ इस तरह के दिखते हैं कि भारत की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी अधिक मजबूत हो गई है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई मौका नहीं आया है कि यह लुभावनी और लोकप्रिय जनधारणा सही साबित होते दिखे। अतिसक्रियता देश के हित में भी है, ऐसा अभी साबित नहीं हुआ है। इसलिए विदेश नीति के बहुत से जानकारों का मानना है कि हिंद महासागर के इस क्षेत्र में भारत को बड़ा देश होने के नाते बड़प्पन दिखाते हुए तनाव घटाने का जिम्मा भी पूरा करना होगा। पाकिस्तान या किसी और पड़ोसी देश से टकराव और तनाव भारत के हित में नहीं है, फिर चाहे यह टकराव पाकिस्तान का ही खड़ा किया हुआ ही क्यों न हो।

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